अगस्त 09, 2013

बेतरतीब दिन बेतरतीब बातें

30 ‎जुलाई , ‎2013, ‏‎7:05 शाम
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है। कि तुम मेरे बिलकुल पास हो। जैसे अभी शाम बाहर बारिश में मैं नहीं था, तुम नहीं थी, पर थी हमारी आवाज़ें। घुलीमिली। अगल बगल। लेटे लेटे बस खोया रहा। उठ कर गया नहीं दरवाज़े के पार। बस सुनता रहा। उन कदमों की कदमताल। कुछ आगे कुछ पीछे। बूंदों का आसमान से गिरना। उनके बीच हमारा आ जाना। हमारा चले जाना।

उस बूँद का हमारी हथेलियों के बीच से गुज़रना। कुछ देर ठहर जाना। उस नमी में, उस एहसास का होना जब उस बूँद के बहाने तुम्हारी हथेली को चुपके से पकड़ लिया था। तुम्हें बिन बताये।

रात इतना लिख रहने दिया। आगे कह ही नहीं सका।
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05 ‎अगस्त, ‎2013, ‏‎6:49 शाम
दोपहर खूब बारिश हुई। अब उमस है। बादल नहीं हैं। आसमान खाली है। कमरे में हवा के जीतने रास्ते हैं सब खुले हैं। छत पंखा कई महीने हुए खराब है। अभी तक ठीक नहीं करवाया। जो टबेल फैन है उसके डैने आवाज़ करते हैं इसलिए नहीं चला रहा। पौने सात हो रहे हैं मौसम गरम नहीं है। तुम्हें यह सब कहूँगा तो कहोगी पंखा तो चला लीजिये।

पता है कभी कभी खराब ओवरएक्टिंग करता हूँ। पकड़ा नहीं जाता, यही ख़ैर है। कल कह बैठा कि बुखार है इसलिए धूप में बैठा हूँ। पीपल के पत्तों से छनती सूरज की किरणें इलाज कर रही हैं। पर दवाई नहीं खाऊँगा। पसीना निकल कर अपने आप ही ताप कम कर देगा। पर दोपहर होते होते लगा काम चलेगा नहीं। पैरासीटामौल खाकर लेटे रहने का मन था।
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06 अगस्त, ‎2013, 08:05 शाम
यह बीतते दिन बिलकुल उस डकार के जैसे हैं जो शाम पाँच बजे दाल चावल के साथ दही खाने के वक़्त कम पानी पीने के बाद आ रही हैं। जिसपर नींद के वक़्त ने उन्हे आठ बजे तक टाले रखा।

06 ‎अगस्त, ‎2013, 08:11 शाम
तीन दिन से पादे जा रहा हूँ। पेट खराब है। तबीयत खराब है।

तिस पर एयरटेल वाले पाँच मिनट में नेट सर्फ करने के बीस रुपये काट लें तब और ठीक नहीं रह सकता। मेल का मैसेज न आया होता तो ही ठीक रहता बीस रुपये का मतलब पचास मिनट की चपत। एसटीडी कॉल पर।

06 ‎अगस्त, ‎2013, 08:18 शाम
हम पकड़े गए हैं और थर्ड डिग्री रम में रख लिए गए हैं। यहाँ से कैसे भाग निकलना है समझ नहीं आता। उसकी मार से रोज़ छलनी पीठ लिए सो जाते हैं कि कभी तो खुला आसमान होगा, साँसें होंगी। उस जहाँ में सपने उड़ सकेंगे।

पता है कितनी कमज़ोर पंक्ति है। टूटने बिखरने से खुद को बचाए रखने की जद्दोजहद लिए। झूठ से कम नहीं। छलावे की तरह। लगातार तोड़ती हुई।

06 ‎अगस्त, ‎2013, 08:25 शाम
कुछ कीड़े होते हैं जिनहे जाने अनजाने हम हाथ लगा लेते हैं, तब उनसे बदबू आने लगती है। हमारी पढ़ाई ने हमारे साथ यही सलूक नहीं किया क्या?

सवाल पूरे होशो हवास में है, दिमाग जग रहा है। आँखें खुली हुई हैं।
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