अगस्त 14, 2013

पन्द्रह अगस्त की पूर्व संध्या पर एक ग़ैर-ज़रूरी वक्तव्य

आज पंद्रह अगस्त की पूर्व संध्या पर मैं कोई प्रधानमंत्री भारत सरकार की कोई स्पीच तय्यार करने नहीं बैठा हूँ। साधारण से भी साधारण दिखने वाला अदना सा भारतीय नागरिक होने का दावा करने वाला व्यक्ति हूँ, जो थोड़ा बहुत मौका लगे तो ख़ुद से ख़ुद की बात कर लेता है। आज भी करूँगा। किसी से पूछूंगा नहीं। जो कहना है कहकर रहूँगा।

कभी-कभी सोचता हूँ मेरी यादों के साथ खेलने वाले, उन्हे छेड़कर तितर बितर करने में इस राष्ट्र राज्य की क्या भूमिका है। मेरे पास इस दिन की मद में मुट्ठी भर दिन थे जब हम छत पर चढ़े हुए पर पूरा पूरा दिन पतंगबाजी के नाम कर सकते थे। तब धूप लगते हुए भी नहीं लगती थी। पछियाव में बस हवा थी। आसमान में पतंगे। तब उस आसमान में आगे आने वाले दिन नहीं थे। उनकी आहट भी नहीं। बिलकुल चुपचाप धीरे से मेरे अंदर यह बीतते साल उतरते जा रहे हैं। जितनी गहराई तक ये सब पहुँच गए हैं वहाँ सिर्फ़ सवाल के ढेर हैं। उस झऊये में किसी का भी कोई कमज़ोर जवाब भी नहीं है।

जिस रफ़्तार से यह समय आधुनिक हुआ है उतनी ही गति से कुछ मूल्य अमूर्त होते गए हैं। यह उनके रूप (‘फॉर्म’) बदलने का, ट्रांस्फ़ोर्म होने का काल है। एक राष्ट्र राज्य के लिए यह संकटकालीन परिस्थिति है। जिसमे वह स्वयं गायब हो रहा है। उसके ‘चिह्न’ उसमे न बदल किसी और रूप में तब्दील हो रहे हैं। किसी राष्ट्रपिता के नाम पर कोई योजना उस भौगोलिक क्षेत्र में उक्त पार्टी का प्रतिनिधित्व करती है न कि राज्य राष्ट्र की। किसी खेत में किसी भी कम्पनी के मोबाइल टावर का होना उस कम्पनी का होना है न कि इस अमूर्त प्रत्यय की उपस्थिति के। सड़क किसी प्रधानमंत्री के नाम पर है न कि उसके।

उस रेल व्यवस्था को ‘भारतीय रेल’ कहने में क्या भारतीय है जो उसे भारतीय बनाता है। सिर्फ़ एक नक्शा भर ही तो है, जिसे हमने एक नाम दे दिया है। या ऐसा कहना इस राष्ट्र के बनने की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को सिरे से नजर अंदाज़ कर देना है; उन सबके बलिदान को एकबारगी नकार देना है। जिसकी कमज़ोर सी याद दिलाते यह दिन हर साल आते हैं।

हिज्जे और जटिल हो सकते हैं इसलिए अधीर आगे अपना धीरज खोने की गरज से आगे न बढ़ें।

एक अर्थ में यह महत्वपूर्ण सवाल है जिसमे उन सारे लोगों को याद करना शामिल है जिनके ‘त्याग’ ‘बलिदान’ जैसे अमूर्त होते अवयवों की वजह से आज हम आज़ाद महसूस करने लायक देश में साँस ले रहे हैं। पर क्या यह उनके द्वारा देखा गया समेकित सपना है जिसको आज हम नाम विशेष से जानते हैं। चलिये जादा मुश्किल नहीं करते हैं हमारे घोषित राष्ट्रपिता की एक छोटी सी पुस्तक नवजीवन ट्रस्ट ने ‘मेरे सपनों का भारत’ नाम से छापी है। क्या उस लायक भी हम हो सके हैं।

ख़ैर, राष्ट्र कई-कई धाराओं, विचारों, मतों को एक साथ अपने में समा कर चलता है उनमे से कभी कोई ऊपर होता है तो कोई नीचे। यह उठापटक चलती रहती है और इन्ही के बीच वह अपना रूपाकार बदलता रहा है, बदलता रहेगा।

इन्ही सबके बीच वह नागरिक भी है जो लगातार जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहा है। क्या कोई राष्ट्र उसके बिना ज़िंदा रह सकता है। अगर नहीं, तब हम एक मृत राष्ट्र में रह रहे हैं। सिद्धान्त रूप यहाँ उसके होने को सिर्फ़ विश्व बैंक के सामने ‘मानव संसाधन’ के रूप में तब्दील कर दिया है जिसके एवज़ में वह कई करोड़ डॉलर कर्ज़ आसानी से ‘वर्ल्ड ह्यूमन इंडेक्स’ में ऊपर आने के लिए ले सकता है। उसके नाम पर कई कल्याणकारी योजनाएँ खाद्य सुरक्षा विधेयक, सर्व शिक्षा अभियान, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के नाम पर बनाई जा सकती  हैं।

दिक्कत तब होती है जब वह इन व्यवस्थाओं के विफल हो जाने के बाद सवाल पूछता है। किसी दिखाई न देने वाली चीज़ से उसी अनुपात में दिखाई न देने वाली चीज़ की माँग करने लगता है। शोषण के खिलाफ़ अपनी कमर सीधी करने की कोशिश में उठना चाहता है। यह उठना मुट्ठी बंद कर उठना है, जिनमे कई-कई सपने साँस ले रहे होते हैं।उन्हे कैसे पूरा करना है इसका एक ही तरीका उन्होने सीखा है। इतिहास उन्हे यही सिखाता आ रहा है। जो तुम्हें उपनिवेश समझे तुम उसका प्रतिकार करो।

तब, बिलकुल इसी क्षण उन्हे लाल किले की ज़रूरत पड़ती है। वहाँ से किसी आवाज़ में किसी समझ न आने वाली भाषा में वह समझा लेना चाहता है, लोग कुछ समझते हैं, काफी कुछ नहीं समझते हैं। जो काफ़ी कुछ नहीं समझ रहे हैं उनको ठिकाने लगाने के तरीके, उन्हे बहुत अच्छे तरीके से आते हैं। राज्य सत्ता के दमनकारी औज़ार जो करते हैं वह सब देख लेते हैं। वह हिंसात्मक हैं। पर उनके पास कुछ उपकरण ऐसे हैं जो दिखाई नहीं देते। ‘देशभक्ति’ वाला मुखौटा ऐसे ही आड़े वक़्त बहुत साथ देता हैं। आड़ा वक़्त है सवालों का सामने आ जाना।

हम पंद्रह अगस्त के ‘फ़ेनॉमेना’ में अपने को खो देना चाहते हैं। यहाँ इतिहास विचारधारा के रूप में काम कर कई सारी वास्तविकताओं को छिपाने का काम करता है। इतिहास इस रूप में हमें अतीत की तरफ मोड़ तो देता है पर उसकी व्याख्याएँ समझ नहीं आती। वह हमारे पूर्वाग्रहों की तरफ़ खींचती हैं। ग्रंथियों का ऐसे ही बने रहना इस समय की राजनीति उसका समयानुरूप दोहन कर सके। वह हमें पीछे ले जाकर उस स्वतन्त्रता संग्राम की कच्ची पक्की यादों में रौंद रहा होता है और हम किसी भारत कुमार के गाने सुन-सुन अपने पकते कानों को टपकने से बचाए रहते हैं। फ़िर हर साल हम उसी विभाजन को अपने दिलों में कसक की तरह यादकर किसी राष्ट्र को सबक सिखाने के मंसूबों पर काम करने लग जाते हैं। यह नहीं सोचते कि उन्होने भी इस आज़ादी के लिए उतनी ही बड़ी कीमत हमारे साथ दी है।

फ़िर ऐसे बिन्दु पर आकार अगर मैं सोचता हूँ कि इस लोकतन्त्र में अगर मेरी कीमत सिर्फ़ एक वोट से जादा नहीं है और इस चुनी हुई सरकार में वह एक वोट भी नहीं लगा है तब मुझे उसके सुझाए ‘राष्ट्र’ के लिए ‘त्याग’ ‘बलिदान’ की सारी बातें बहाने लगती हैं, तो क्या गलत है। मैं उसके लिए अपने तरीके से काम करूंगा। किसी लाल किले से निर्देश लेकर नहीं। वह जितना उनका है, उससे जादा मेरा है। हमारा है।

{साल दो हज़ार ग्यारह,चौदह अगस्त,  दो साल पहले की एक पोस्ट। }

2 टिप्‍पणियां:

  1. rashtra aur rajya ,ie. nation and state ka relation jis process se parivartit hua ya kahe metamorphosised hua hai,usme kabi b aam logo ka kaha nai tha(pata nai ho b sakta hai kya kabhi)jiske results dekh rahe hai aapke analysis me,ye b kah sakte hai state banane ke liye hamara nation ready nai tha na hai,ye adhpake pakwan ki paresani hai.evn now we are not comfortable wid idea of nation state.(na ab hum nation rahe n state)

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  2. बिलकुल कुछ कुछ ऐसा ही के लोग जिन जिन आशाओं कल्पनाओं के साथ अपने सपनों को बुनने चले थे वह कहीं पीछे रह गया। पूरी प्रक्रिया में वह बे-दख़ल कर दिया गया। कभी हम खुद को भी इसके भीतर नहीं पाते। लगता है:

    ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर
    वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं

    ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर
    चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं

    फैज़ की तरह हम भी यही सोचते हैं। बस उसके लिए कभी मर्सिया पढ़ लेते हैं। कि सबको समेकित करने के लिए प्रयास ऐसे ही बनेंगे।

    मैंने महसूस किया कि मैं वक्त के एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूं
    अब ऐसा वक्त आ गया है जब कोई
    किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है
    अब न तो कोई किसी का खाली पेट देखता है न थरथराती हुई टांगें
    और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कंधा' देखता है
    हर आदमी सिर्फ अपना धंधा देखता है

    मैंने सोचा और संस्कार के वर्जित इलाकों में
    अपनी आदतों का शिकार होने के पहले ही बाहर चला आया
    बाहर हवा थी धूप थी घास थी
    मैंने कहा आजादी
    मुझे अच्छी तरह याद है मैंने यही कहा था

    ज़यादा कविता की बात हो गयी। ख़ैर, हम यहीं हैं देखते रहेंगे, कहते रहेंगे।

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