सितंबर 01, 2013

दो सपनों की खराब सी भूमिका..

हम सबके अपने ‘कंफ़र्ट ज़ोन’ होते हैं, जिनसे निकालना तो दूर उनके बारे में ऐसा सोचना भी नहीं हो पाता। कभी-कभी उस कमरे से निकालने का मन नहीं करता, जिसमे बैठ किसी की गोद में बैठे रहने का एहसास होता है। भले उसे ‘ऊपर वाला कमरा’ कहता आया हूँ; पर बार-बार वहीं खिंचा चला जाता हूँ। इन बीते दिनों के बीतते जाने में जब कहीं नहीं लिख रहा था, बस सोचे जा रहा था के लिखना चाहिए, तब वहीं घंटों बैठा रहता। नींद आ जाये, थोड़ी देर सो जाऊँ, तब शायद दिमाग चलने लगे इसलिए खराब-खराब किताबें पढ़ने से अच्छा था कि खराब फिल्में ही देख लूँ। कुछ देखी भी। पर उनकी बात आज नहीं। मन नहीं है। तबीयत कुछ और कह लेना चाहती है।

पहली बार है जब दोस्तों के कहने पर दिल्ली में रहते हुए ‘बुक फ़ेयर’ नहीं गया। पहले से सोच लिया था नहीं जाऊंगा। राकेश आता तब सोचता के चलते हैं। पर नहीं। उसके स्कूल ने छुट्टी नहीं दी होगी और न उसने इन इकहरे मेलों में बीते पुराने दिनों में लौटने की सोची होगी। कभी लगता है हम कभी पढ़ कर कभी लिख कर क्या इस ज़िन्दगी से भागने के चोर दरवाज़े तो नहीं ढूंढने लगते। शायद कई बार ऐसा जानबूझकर भी करते होंगे। कभी ‘हॉबी’ के नाम पर। क्योंकि हमे पता है उसे जीना उन छपे रिसालों से जायदा मुश्किल है।

बहरहाल अभी किसी भी टाइप से कोई फ़िलॉसफ़ि झाड़ने का मन नहीं है। ज़िन्दगी का अपना ढर्रा बनते-बनते बनता है। वक़्त लगता है। और जब वह मुकम्मल बन जाता है, तब उसे ‘बोर’ हो जाने की हद तक झेलते झेलते हम खुद शीशे में अपना ही चहरा पहचाने की कोशिश में लगे, पागल लगने लगते हैं। अगर इस लाइन को ‘किस्सा कोताह’ वाले राजेश जोशी पढ़ लें तो एकबारगी नाराज़ हो जाएँ। पर वो किस्सा भी अभी नहीं। फिर कभी फुर्सत से।

अभी तो कल परसो रात देखे सपने को दिखाना चाहता हूँ। कि कई महीनों बाद लगातार दो रातों से सपने देख रहा हूँ। अभी एक रात पहले वाला। पता नहीं ‘बॉम्बे टॉकीज’ में ज़ोया अख़्तर कि फिल्म ‘शीला की जवानी ’ का साइड इफ़ेक्ट है या कुछ और के मेरे सपने में कोयले की मालगाड़ी दिखायी दी। और दिखाई दिये सोनाक्षी के पिता। कालीचरन। बिलकुल उसी उम्र के शत्रुघन सिन्हा। पर तकनीक के लिहाज से भारतीय रेल ने तरक्की कर ली है और जिन पटरियों पर रेल दौड़े जा रही है वह बिजली से चलने वाला ट्रैक है। और वहाँ जो कालिख मुँह पर दिख रही है वह इंजन के गले से उगलते धुएँ से नहीं उस काले रंग के कोयले से हुए हैं। इन सबमे पता नहीं मैं कहाँ हूँ। शायद बहुत दूर। मेरा ‘वेंटेज पॉइंट’ किसी को दिख नहीं रहा। खुद मुझे भी। बस बार-बार यही री-टेक कि शत्रुघन उस कोयलागाड़ी पर चढ़ना चाहते हैं पर बार-बार उन्हे कोई रोक रहा है। पता नहीं इतना लेटेस्ट सपना है फ़िर भी इस चढ़ंतु ने ‘बेशरम’ का ट्रैलर नहीं देखा शायद। वरना एक हाथ पर पैर पड़ने से पहले ही वह हाथ वहाँ से उठा लेते और अपना बैलेंस बनाये रखते।

ख़ैर, सपना इन सबके बीच कहाँ खत्म हुआ कुछ याद नहीं। बस घड़ी देखी तो उसमे तीन बजने में अभी एक मिनट बाकी था।

दूसरा इस तड़के आज की सुबह का ही है। थोड़ा रोमेंटिक लग सकता है। इसकी ज़िम्मेदारी हमारी नहीं है। थोड़ा ‘जब वी मेट’ से कॉपी भी। यहाँ जो लड़की मेरे साथ है उसका नाम नहीं दे सकता। इसलिए नहीं दे रहा। वैसे खुद अपना कौन सा दिये दे रहा हूँ। पर इत्तेफाक से यह भी शुरू ‘रेल्वे स्टेशन’ से होता है। पता नहीं तुम इंदौर जा रही थी या सीहोर या कहीं भोपाल के आसपास। हम सब भी उसी दिन उसी रेलगाड़ी से वहीं जा रहे हैं। पर पता नहीं क्यों मैं सबको छोड़ तुम्हारे संग बैठ जाता हूँ। हमारी टिकट कंफ़र्म है या क्या है याद नहीं। हम दोनों पार्सल वाले डिब्बे में उसका बंद दरवाज़ा खोलकर बाहर पैर लटकाकर बैठे हुए हैं। अभी ट्रेन चलने में थोड़ी देर है। बिलकुल उसी क्षण पता नहीं मेरे मन में क्या आता है मैं अपने एयरटेल मोबाइल में इंटरनेट डेटा रिचार्ज करवाने उतर जाता हूँ। पीछे-पीछे तुम भी।

हम दोनों प्लेटफॉर्म से प्लेटफॉर्म छाने जा रहे हैं पर बत्तीस रुपये वाला रिचार्ज कहीं नहीं मिल रहा। तभी हमारी ट्रेन कब चल पड़ी, पता नहीं। मैं शाहरुख़ नहीं था वरना ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ वाला सीन तो दोहरा ही लेते। मेरी समझ में यह भी नहीं आ रहा है के मैं भाई को जेब में रखा फोन निकाल बता क्यों नहीं दे रहा कि ट्रेन दिल्ली में ही छूट गयी है। कहाँ मिलेंगे। कौन सी ट्रेन से पीछे आ रहे हैं। पता नहीं।

वैसे सपने कभी लिखता नहीं यहाँ पर। पर क्या करूँ। बीते दिनों यही सबसे अच्छी बात मेरे साथ घटी है कि सपने वापस आ रहे हैं। वरना नींद की तो ख़बर ही क्या। कई-कई किश्तों में टूट ती रही थी। इन्हे देखा तो पुराने दिन याद आगए। पर डायरी में लिखे उन पन्नों को यहाँ नहीं लिखुंगा। वह इससे कहीं जायदा खतरनाक हैं। उनको यहाँ होना नहीं चाहिए। जब ‘चाहिए’ कह दिया तो मतलब मेरी मुझसे यह अपेक्षा ही नहीं है। कि हाँड़-माँस का जितना भी हूँ जैसा भी दिखता हूँ उसे उस ‘वर्जित प्रदेश’ की खाद बना दूँ। उसे तोड़ूँगा नहीं। जब कभी इस तर्क को हरा दूँगा, तब शायद कुछ हो..

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