सितंबर 14, 2013

हिन्दी दिवस के बहाने कुछ फुटकर विचार

सुबह से समझने की कोशिश में हूँ के आज के दिन में ऐसा क्या है कि पिल पड़ूँ। अगर बचपन से ‘हिन्दी’ ही बोल रहा हूँ तो क्या मुझे इस ‘भाषा’ से प्रेम भी करना होगा। कुछ हद तक करता भी होऊंगा। भले यह चुनना मेरी इच्छा से नहीं था। यह उस परिवेश की स्वाभाविक गति थी, जिसके इर्दगिर्द इसने मुझे गढ़ा। सवाल यह है कि अगर इस ‘भाषा’ को संस्थागत रूप में न पढ़ता, तब क्या, मेरे हिस्से यह सवाल होते भी। जिस हिन्दी में सोच रहा हूँ, लिख रहा हूँ या किताबें पढ़ रहा हूँ उस ‘हिन्दी’ के लिए मुझे ख़ुद को कैसा कर लेना चाहिए।

यहीं वह बारीक रेखा है जहाँ उदय प्रकाश ख़ुद को हिन्दी का लेखक मानने से इंकार कर देते हैं। पर इसका अंतर समझे बिना मैं ऐसा नहीं कर सकता।

थोड़ा पीछे से देखता हूँ तो नज़र आते हैं फोर्ट विलियम कॉलेज के लालू लाल, सदलमिश्र से लेकर नागरी प्रचारणी सभा और रामचंद्र शुक्ल। वे जिस भाषा को स्थापित करने में लगे थे, ‘नयी चाल में ढला’ हुआ मान, ऐसी ही रेखा को बना रहे थे, उसे इन लोगों ने ‘किताब’ की शक्ल दी।

कैफ़ी आज़मी इसी किताब को पढ़ने के लिए अस्सी के दशक में एक गाना बनाते हैं। मेहनत करने वाला भी पढ़ना लिखना सीखे। मतलब यह एक अर्जित किया जाने वाला कौशल है, जिसे सयास खुद से जोड़ना पड़ता हैं। इससे उन्हे जोड़ेगा एक तंत्र। प्रौढ़ साक्षारता। पढ़ना लिखना सीखना साक्षारता की एक परिभाषा में उन्हे अटाएगा। कि इतनी उम्र हो जाने पर भी इस जातिगत समाज ने उन लोगों को कभी भी उस चौहद्दी के अंदर नहीं आने दिया। अब सरकार उन्हे अवसर दे रही है। कितना अजीब है न जो लोग बोल लेते हैं उन्हे लिखना सीखना पड़ता है। इसका मतलब यह भी है के जिसने भी लिपि की खोज की होगी वह समाज किनही दूसरे समाजों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता होगा। वर्चस्व इस रूप में कि लिखित रूप में वह अपने लिए कुछ सलाहियत सहेज कर रख लेना चाहता है जिनपर सिर्फ़ उसका अधिकार हो। बोले हुए शब्द तो सबके लिए उतने ही सार्वजनिक हैं, जितनी निजी वह किताबें।

बहरहाल वही भाषा ‘सत्ता विमर्श’ की बासी बातों से पंक्तियाँ नहीं भरना चाहता। बस जितनी भी समझ इन बीतते सालों में बनी है वह यह कि लिपि भाषा का लिखित रूप भले हो पर इसने कई सारी आवाज़ों को अपने भीतर से बेदख़ल किया है। वह भले ही पुरातात्विक महत्व की तरह अपना स्थान बनाने में सफल हुई हो पर कहीं न कहीं बराबर दया पवार की कविता शहर  खींचे लेती हैं, भले उनकी अभिधा की लक्षणा व्यंजना आगे तक जा रही हो पर इस दिन के लिए भी इन पंक्तियों के कई-कई तर्जुमे हो सकते हैं, कई-कई पाठ निकल सकते हैं:

एक दिन किसी ने बीसवीं सदी के एक शहर को खोदा और अवलोकन किया
एक दिलचस्प शिलालेख विवरण इस प्रकार था:
"यह पानी का नलका सभी जातियों और धर्मों के लिए खुला है".
इसका क्या मतलब रहा होगा:
यही न कि यह समाज बँटा हुआ था?
उनमें से कुछ की स्थिति ऊँची थी और बाकी की नीची?
ठीक है, फिर तो यह शहर दफ़न होने लायक ही था-
तो फिर लोग इसे मशीन युग क्यों कहते हैं?
यह तो बीसवीं सदी का 'पाषण युग' प्रतीत होता है.

भाषा के जिस रूप को वह ‘हिन्दी’ कह रहे हैं और जिन रूपों को हम ‘हिन्दी’ कह रहे हैं उनमे भी मूलभूत अंतर बराबर बना बना है। बिलकुल वैसा ही जैसा ‘मौखिक’ और ‘लिखित’ में है। जैसा ‘बोली’ और ‘भाषा’ में है। सत्ता जिस भाषा को लेकर पखवाड़े आयोजित करती रही है, शिक्षण संस्थान जिस हिन्दी को लेकर इतने मुग्धाभाव से हिन्दी दिवस मनाती है; वहाँ किसे हिन्दी कहा जा रहा है यह रेखांकित करना चाहिए। क्या उनमे ऐसे दरीचे हैं जो बोली विशेष के शब्दों को अपने अंदर समाहित करते हैं। साँस लेने की जगह भी है। नहीं है।

फ़िर यह कैसे मान लूँ कि वह फ़िल्मों की, उसमे बजते गानों की, टीवी पर प्रसारित विज्ञापनों की, समाचार पत्रों की भाषा के लिए भी यही दिन है। जो इसे जोड़कर चौदह सितम्बर को देख रहे हैं पता नहीं किस दृष्टिदोष से ग्रस्त हैं। उन्हे बस यह छोटी सी बात समझनी चाहिए कि इस हिन्दी के बुनियादी ढाँचे को बदलने के पीछे जितने कारगर विभिन्न संस्कृतियों के बीच के अंतरावलंबन परिवर्तन हैं, उससे कहीं जादा आर्थिक हैं। बस इस बीच हुआ यह है कि यह हिन्दी उस अँग्रेजी की तरह इस समाज में निर्णायक रेखा नहीं बन सकी है जिसके नहीं आने से आपकी आर्थिक और सामाजिक गतिशीलता पर कुछ फ़र्क पड़ने वाला।

और जहाँ से शुरू हुआ था वहीं वापस आऊँ तो कई सवाल भी भी वहीं हैं। पर फ़िर यही सोचता हूँ कि अपना दिन भी यहीं है, रात भी यहीं है। अपना रोज़ाना इसी में गुज़रता है। किसी मानक को अपना मानक नहीं बनाते। जीतने भी शुद्धतावादी है वह इसे संक्रमण से बचाने की ज़िम्मेदारी कमरों में बैठें निभाएँ। क्रीओल और पिजन की प्रमेय सुलझाएँ। हमारी भाषा न मर रही है, न हम मरने देंगे। कम से कम जब तक जबकि हम इसे बोलते रहेंगे। इसमे लिखते रहेंगे।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} 15/09/2013 को ज़िन्दगी एक संघर्ष ..... - हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल - अंकः005 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें। कृपया आप भी पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | सादर ....ललित चाहार

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  2. Mujhe ye sab padkar aaj khud par bahut garv ho rha hai kyuki hamari matr bhasha hindi hai....aaj hindi divas par mere priye mitr sachinder ne jo lekh likha hai wo bahut hi shudh hai haise ki mere friend bahut hi sunder ar shudh hai . Jaise ki hindi

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    1. हिन्दी में सोचना-लिखना चाहे जैसे भी मिला हो बस इसे शुद्ध रखने वाला खयाल निकाल दो।

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  3. Why not write Hamari Boli in India's simplest nukta and shirorekha free Gujanagari script? Writing Hindi/Urdu in Romanagari will dissolve history and it will revive old Brahmi script.

    Have a Happy Hindi Day

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    1. मित्र कृपया इस 'गुजनागरी लिपि' पर थोड़ा और प्रकाश डालते तो अच्छा रहता। और यह भी बताते कि कैसे हमारा इतिहास घुल रहा है ??

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