सितंबर 16, 2013

लाद दिया गया दिन और बेचारा मास्टर

लगातार लिखना टालता रहा हूँ। इसपर लिखने का मन ही नहीं होता जैसे। किस बारे में लिख रहा हूँ। एक दिन है, बीत जाएगा। हमारे कहने लिखने से कुछ होना जाना तो है नहीं। कोई कुछ हर्फ़ पढ़ लेगा बस। या हो सकता है जो सपना इस शहर में टूटता लग रहा हो, कहीं किसी कोने में इसी के सहारे कोई अपने हिस्से के सपने बुन रहा होगा। दिन कुछ खास नहीं है ‘शिक्षक दिवस’ ही तो है। सबसे बेचारगी भरा पेशा। कोई पूछे और बोल दो क्या बनोगे- मास्टर..!! थूक जीभ से होता हुआ गले तक आता है और आती है हिकारत। वहीं कहीं किसी फंसी हुई फेंच हो जैसे। फिचकुर भी हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। 

सच कहूँ तो दिन बीतता जा रहा था और अंदर ही अंदर कहीं डूबता जा रहा था। फ़ेसबुक पर कई-कई बातें हो रही थी। मैंने किसी भी तरह से ख़ुद को किसी के सवाल जवाब के लिए तय्यार नहीं किया।

उनके सवाल भारी भरकम अपेक्षाओं से भरे हुए थे। कहीं भी किसी भी विचलन के लिए कोई गुंजाइश नहीं रख छोड़ी थी। मन में सवाल आया के जो भी यह सब पूछे जा रहे हैं, बघार रहे हैं उनके सवाल मूलतः किस शिक्षक से हैं? उनकी परिभाषा औपनिवेशिक सत्ता के बाद अस्तित्व में आए कमज़ोर से स्कूली मास्टर के ही है तो क्यों हैं? इसका छटांक भी विश्वविद्यालय के मुटाते किसी भी प्रोफ़ेसर से क्यों नहीं है। ज़िम्मेदारी को इस रूप में बताने वाले, यह सब पूछने वाले इस उत्तरदायित्व को वहन करने में असमर्थ क्यों हैं या यह उनकी कम हिम्मत का नतीजा है, जो उन्हे किसी भी कटघरे में खड़ा करने का बूता नहीं रखता। निजी विद्यालयों के शिक्षक किस तरह से इन सारे सवालों संदेहों संशयों जिज्ञासाओं से परे मान लिए गए हैं। उनकी तरफ़ उंगली उठाने से पहले ही वह टूट क्यों जाती है। क्या उनके हिस्से राष्ट्र का यह हिस्सा नहीं पड़ता।

इन सवाल पूछने वालों के साथ दिक्कत है भी है कि यह लोग आज भी किन्ही पीछे बन गए आदर्शों में पड़े बजबजाना चाहते हैं। एक स्कूली मास्टर, जिसकी औकात बात-बात पर बना बनाया अपरिवर्तनीय ढाँचा बताता रहा है; उसकी आँखों को यह किसी राष्ट्र के निर्माण का सपना देखने को अभी भी मजबूर करते रहना चाहते हैं। यह एक तरह से अतीतोन्मुखी होते जाना है। यह सब उससे अपेक्षा तो ख़ूब रखते हैं पर कभी ऐसे मौके भी तो आने चाहिए जब यही सवाल पूछने वाले इन रिरियाते अध्यापकों के पीछे खड़े नज़र आयें। चलिये एक क्षण के लिए यह भी मान लेते हैं कि इन लोगों कि आदत ही सवालिया निशान खड़ा करने की है। तब दूसरे हिस्से के सवाल कहाँ हैं जो उन्हे सत्ता से पूछने हैं। वह क्यों एक एककर अपने कदम इस ‘विशालकाय तंत्र’ से पीछे खींचती जा रही है। इसने कभी इसकी गिरती साख को बचाने के लिए क्या किया। अगर वह इसके प्रति गंभीर नहीं है तो उन्हे यह साफ़-साफ़ दिखना चाहिए कि वह इसकी विश्वसनीयता को इतना संदिग्ध बना देना चाहती है कि सिरे से वह इस पूरी व्यवस्था को निजी उपक्रम बना अपनी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहती है।

अभी जब आलोक ने इसी दिन को लेकर आज जो पोस्ट बनाई तभी से अपनी यादों में खो गया के यह दिन मेरे हिस्से कभी आया ही नहीं। हमारे हिस्से उनके फ़ोन कॉल नहीं हैं। न किसी भी तरह की शुभकामनायें उस दिन हमारा इंतज़ार कर रही थीं। वह उनके लिए सिर्फ़ सिविल ड्रेस में पुराना किला का दरवाज़ा आसानी से लाँघ जाने का दिन भर है। मेरे हिस्से अपने छात्रों से किसी भी तरह की अपेक्षा नहीं जुड़ी हुई है। बस इतना ही सोच पाता हूँ के जिस भाषा को विषय के रूप में पढ़ा रहा हूँ उसमे खुद को अभिव्यक्त करने में कभी भी हिचकिचाएँ नहीं। इस भाषा में सोचने समझने की क़ाबिलियत बढ़े। और कुछ नहीं। शायद यह भी मैं जादा सोच रहा हूँ।  वैसे भी वास्तविकता वस्तुनिष्ठ नहीं व्यक्तिनिष्ठ होती है। जो शीला दीक्षित के लिए दिल्ली मेट्रो में विकास का एक पैमाना है वही कक्षा बारह का निन्यानवे दशमलव चार प्रतिशत परीक्षा परिणाम यहाँ किसी भी शिक्षक के लिए किसी भी तरह की उपलब्धि नहीं है। उन्हे पता है हम एक बहुत बड़ी ‘सरकारी आँकड़ा सुधार योजना’ के तहत अपने ‘डेटा’ को ‘मैंटेन’ कर रहे हैं बस। हमें भी अपने ऊपर लिए क़र्ज़े की सही कीमत लगानी है। हमने शिक्षा में यथास्थितिवादी मॉडल को अपना लिया है। जो जहाँ है, वहीं बना रहे। उसका वहाँ से तनिक भी खिसकना कई-कई प्रत्याशाओं को पानी पिला सकता है।

हो सकता है यह सब लिखा किन्ही विद्वानों को अवसाद व निराशा से ग्रस्त व्यक्ति के विचार लगें जो किसी भी सकरात्मक सम्भावना को मानने से इंकार कर रहा है। बराबर हिज्जे जटिल होते गए होंगे। वाक्य संरचना इतनी सरल नहीं रह गयी होगी। उन्हे बार बार समझने के लिए पिछले वाक्य पर जाना पड़ा होगा। पर क्या करूँ तभी यह सब लिखना टालता रहा पर आज रहा नहीं गया। अभी ‘लॉगआउट’ ही हुआ था के उसके ‘होमपेज’ पर एक विदेशी कंपनी के विज्ञापन को देख ठिठक गया। सरकारी गाड़ी से आई महिला अध्यापिका विदेशी कंपनी के वीज़ा डैबिट कार्ड से इसी शिक्षा को उन सारी सखियों को यह बतला रही है के वे पढ़ लिख जाएंगी तो सखी सारे खाली कुएं भर जाएंगे। कैसे भरेंगे वह इसका 'स्वदेश' नुमा जवाब नहीं देती पर शिक्षा के जिम्मे एक और सपना लद जाता है। और मेरे कंधे थोड़े और झुक जाते हैं।

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