सितंबर 17, 2013

तीन साल बाद आज यह तीसरा साल

समझ नहीं पा रहा आज मुझे कैसा हो जाना चाहिए। पूरा दिन आत्ममुग्ध रहना चाहिए या आत्मालोचन वाली शैली ओढ़ लेनी चाहिए। जो भी हो इत्मीनान से रुककर कुछ देर ठहरने इतराने का मन भी करता है। फिर अगले ही पल सुस्ताने को हो आता हूँ। थोड़ा जी उन बीत गए दिनों में वापस टहलने को करता है। कैसे अजीब से दिन थे। अभी भी कुछ जादा दिन हुए नहीं हैं फ़िर भी इस ब्लॉग को बनाने के दरमियान अंदर बाहर आते जाते भावों से फ़िर गुजरना चाहता हूँ।

रुक कर देखूँ तो कभी सोचा नहीं था, कहाँ के लिए चलें हैं। बस चल दिये थे। इन बीतते सालों में कई कई दिन ऐसे भी आते जब न डायरी में कुछ लिखता न यहाँ आता। यहाँ आना बराबर अपने अंदर के खालीपने को भरने जैसा है। कुछ प्यार भरे सपने हैं जिनके पीछे भागा रहता हूँ। उनके बनने बिगड़ने में अंदर तहों तक टूटना बिखरना भी लगा रहता है। सबकी याद साथ है। कुछ पीछे कहीं सुस्ता रहे होंगे। कुछ की उमर हो गयी होगी। कुछ थक गए होंगे।

जितना अपने अकेलेपन में शिद्दत से लिखने को महसूस करता, उतना सुकून कोई और बात देती नहीं लगती। यह मेरी खुद से बातचीत ही तो है। पर फ़िर कभी लगता है यह लिखना अपने आपको दोहराने जैसा है। जिसे कहीं आने वाले कल सड़क किनारे किसी सुनसान पुलिहा से गुजरते वक़्त याद कर होंठों पर मुस्कान तैर जाए। आँखों की चमक बढ़ जाए जैसे।

इसमे कई शेड्स भी लगते हैं। और जिसे ‘स्टाइल’ कहते हैं उसके साथ जिसे ‘ढर्रा’ कहते हैं कहीं न कहीं वह भी बनता रहा है। हम इन सालों में यहाँ लिखते लिखते इतने भी पुराने नहीं हुए जो हम उस बने बनाए ‘पैटर्न’ को ही ‘रिपीट’ करते रहें। मन होता है भाग लेने जा। कुछ साल ऐसे हैं कुछ उमर ऐसी है। कभी अपनी ही पुरानी पोस्ट पर लौटता हूँ तो यक़ीन नहीं कर पाता के ऐसा भी लिख लेता था कभी। ऐसा लिखते हुए जो अंदर तक भर जाना है उसे साँसों के साथ धड़कते दिल के साथ बहते हवा के झौंकों में खिलते फूल बन जाने का मन करता है। मन करता है उड़ जाऊँ। कहीं दूर से अपने आपको लिखता देखूँ। एक दुनिया मेरे इर्दगिर्द भी घूमा करती है।

इस छोटी सी बसावट में कभी लगता है बने बनाए खाँचे साँचे अपना काम कर रहे होते हैं। उनका वहाँ होना मेरे होने को अपदस्थ करता सा है। पर उससे लड़ता हूँ। उसे तोड़ बाहर आने की छटपटाहट किसी और को महसूस होती हो, न होती हो, पर उसका ऐसा होना लगातार मुझे तोड़ता रहा है। उससे लड़ता हूँ। लड़ते-लड़ते उसे इतनी बुरी तरह पछाड़ना चाहता हूँ के वह कहीं न रहे। फ़िर ठहर कुछ देर रुक सोचता हूँ तो लगता है काफ़ी हद तक उससे जूझने के बजाए उससे बचने के रास्ते पर चल निकला हूँ। पर यह ‘एस्केप रूट’ काम करता नहीं लगता।

उस ‘सामाजिक’ को पीछे ढकेल जितना ‘व्यक्तिगत’ होता गया हूँ उतना कभी नहीं था। ‘लिखने’ का भी ‘डर’ होता है जैसा ‘विचार का डर’ होता है। हमारे लिखे से जो छवि जा रही है उसमें हमारे व्यक्तित्व का कितना प्रतिशत कितना प्रक्षेपण होगा इसका चयन कई लेखक बड़ी सावधानी से करते हैं। कई के अवचेतन इस ज़िम्मेदारी को निभा रहे होते हैं। अपन कभी ऐसा सोच नहीं पाये। बस उस स्वीकृत मानक वाली अवधारणा पर बराबर चोट ज़रूर करते रहे। किसे यहाँ जाना है किस सीमा तक शब्दों को सार्वजनिक करना है यह सब अपने आप होता रहता है।

तो आज भी कई ऐसे विषय हैं कई ऐसी बातें हैं जिन्हे वह आग्रह पूर्वाग्रह आने से रोकते रहे हैं। कई कई चीज़ें लगातार दिमाग में तो चलती रहती हैं पर यहाँ उतर नहीं पाती। जैसे किसी नयी जगह को घूम कर आने के बाद लिखने का मन तो होता है पर वही उनही साँचों में ढलकर वह सब पुरानी आकृतियों में तब्दील होते जाते हैं। यह चुक जाने जैसे भाव के करीब है, पर ऐसा है नहीं। यह सबसे बड़ी हार जैसा तो है पर कुछ नए की गुंजाइश ही मुझे बचाए हुए है।

जैसा आज लिख रहा हूँ पता नहीं कैसा है। उसका मूल्यांकन करने के लिए मेरे पास फ़िलहाल एक ही विधि है आत्मसंतुष्टि। कुछ दोस्त भी हैं जो कभी कभी बताते रहे हैं। कुछ कुछ कहते रहे हैं। भले वह हमेशा सामने नहीं आते हों पर बने हुए हैं। पता नहीं वह मुझे पढ़कर कैसा सोचते होंगे। कभी लगता है उनके लिए लिखता भी नहीं हूँ। यहाँ बस ‘मैं’ हूँ। यह ऐसे होते-होते मेरा ‘क्ंफ़र्ट ज़ोन’ है, उनका कितना होगा मालूम नहीं। उन्हे यहाँ आकार कैसा लगता होगा कह नहीं सकता।

कई बार इसे इसकी बनी बनाई सीमा के पार ले जाने की कोशिश ज़रूर करता हूँ। लोग पहले चिट्ठियाँ लिखा करते थे। अब मन में कोई बात तुम्हें कहनी है या कभी ख़ुद तुम ही आजाती हो तो ख़त नहीं लिखता। सीधे तुम्हारे इनबॉक्स में लिंक डाल देता हूँ। कि चिट्ठी आई है। पढ़ लेना। पता नहीं यह कैसा होते जाना है। इस तरह का मिलना भी अजीब किए देता है। तुम भी यहाँ पढ़ कैसी होती जाती होगी। पता नहीं। पर कुछ है जो जोड़े हुए है। बेतार।

बस आज भी सहज हो जाने की कोशिश लगातार करना चाहता हूँ। आज भी सहज हो जाना चाहता हूँ। भाषा के स्तर पर ही नहीं व्यक्ति के स्तर पर भी। सबसे सरल होकर मिल सकूँ। पता नहीं जितना ऐसा सोचता हूँ, उसमे कितना कहाँ तक पहुँच पाता हूँ। देखते हैं। यह तीसरी सालगिरह बस सारा दिन यही सब सोचते बीनते बुनते निकाल गयी। कई सपने हैं। कई ख़्वाब हैं। उन्ही के सहारे चल रहा हूँ। उनमे से एक यह भी है। हमारा तीन साल का ब्लॉग।

*** 
बीती दो जमा दो, पाँच सालगिरहें। पहला सालदूसरा सालसाल चौथापाँचवा साल

2 टिप्‍पणियां:

  1. सालगिरह अकेले मनाने की चीज़ नहीं तो हमने सोचा एक टिप्पणी की कैंडल जला दें. लगातार लिखना. लगातार अच्छा लिखना. खुद को सहेजे जाना कैसी तो चीज़ होती है. तुम्हारा ब्लॉग पढ़ा किसी की पर्सनल डायरी पढना जैसा. मगर कुछ ऐसे कि लिखे हुए को जज नहीं करना बल्कि सफ़र में साथ चलना जैसा कुछ.

    इतना तो इस ब्लॉग को पढ़ के समझ आता है कि लेखन स्वांत: सुखाय है. मुझे इस कैटेगरी का लिखा हुआ अक्सर बहुत पसंद आता है.
    बहरहाल. सालगिरह मुबारक हो. उम्मीद है अगली सालगिरह में यहाँ ढेर सारे लोग होंगे अपने अपने हिस्से का केक मांगते हुए.

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    1. यही सोच बस लिखने की कोशिश रहती है..लिखना ख़ुद के लिए साँस लेने की तरह है। सेफ़्टी वॉल्व की तरह। कुछ जो अंदर चलता रहता है उसे कहता रहता हूँ। पहले थोड़ा लगता था कोई पढ़ रहा है या नहीं। अब नहीं सोचता। पता नहीं क्यों ..

      बहरहाल शुक्रिया ..

      और कुछ और साथी होंगे तो और बात होगी ..:)

      हटाएं

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