सितंबर 02, 2013

एक दूसरे की साँस में घुलते हुए

कभी-कभी सोचता हूँ तुम्हारे बारे में लिखूँ। तुम्हें बिन बिताए। सूरज अभी ढला नहीं है। ढल रहा है। जैसे-जैसे अँधेरा होगा मैं तुम्हारे पास आता जाऊंगा। इस उजाले में आँखें इधर-उधर चली जाती हैं पर अँधेरा बना ही इसलिए है। के तुम्हें देख पाऊँ। चुपके से नहीं, सबके सामने से। कि वहाँ मैं हूँ। तुम हो। हमारी बातें हैं। मुलाकातें हैं। पर अगले ही किसी पल लगता है हम कैसे-कैसे होते जा रहे हैं। इस तरह दिनों का शामों में और शामों का रातों में तब्दील होते जाना बिलकुल भी जँचता नहीं। पर क्या करूँ। बस सोचता रहता हूँ।

सोचता रहता हूँ ऐसा क्या लिख दूँ के तुम मेरे सामने आ जाओ। कोई ऐसा जादू भी होता होगा। धीरे-धीरे सीख रहा हूँ। जिस दिन नींद नहीं आती उस दिन लगता है कहीं तुम मुझमे कुछ कम रह गयी होगी। इस तरह एक शाम होगी। ढबरी के उजाले में तुम्हारा झिलमिलाता चेहरा देख भर लेने को यहाँ से चल पडूँगा। फ़िर कोई नहीं रोक पायेगा। मैं भी नहीं। तुम भी नहीं।

एक बारगी बस ऐसे ही कालीबाड़ी से आगे बढ़ता हुआ तालकटोरा जा पहुँचा। बागीचे के किनारे से धीरे-धीरे हम दोनों सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। एक दूसरे को कनअखियों से ऐसे देख रहे थे जैसे पहली मुलाक़ात हो। थोड़ी झिझक है। थोड़ी हया है। थोड़ी शरारत है। हाथ इस वक़्त कहाँ होने चाहिए यह सवाल पहली बार उठा था इसलिए अपनी जगह बना रहा। वरना हाथ को हाथ में हाथ रखे या कंधे..नहीं नहीं कंधे पर नहीं। हथेलियों की छुअन दोबारा महसूसने का मन कर रहा था। फ़िर भी इस सवाल को जवाब में बदलता नहीं हूँ। उसे जेब के आस-पास बनाए रखता हूँ। ऐसे कि मोटर बाइक की चाभी रख रहा हूँ। या जेब में उसे ढूँढ रहा हूँ। इस सबके बीच हम करिने से आहिस्ते से बिन शोर किए बिलकुल उसी जगह पर आकर बैठ गए हैं, जहाँ कभी एक ओर दीप्ति नवल बैठी थीं; पर अभी वहाँ तुम हो। और दूसरी तरफ फ़ाहरुख शेख़ नहीं बैठे; मैं बैठा हूँ। फिर वही वैटर आता है और थोड़ी देर बाद हम बिलकुल वही ट्रूटी फ्रूटी खा रहे हैं।

यह सब लिखते-लिखते पता नहीं कहाँ पहुँच गया हूँ। शायद वहीं जहाँ आते हुए हमारी बस खराब हो गयी है और हम सब सड़क किनारे उसके ख़राब हो गए ‘क्लच प्लेट’ के ठीक होने के इंतज़ार में धूप से बचते हुए पेड़ की छाया में जा समाये हैं। फ़िर जेब से एकबार फ़िर मोबाइल निकालता हूँ और तुम्हें कहता हूँ। तुम वक़्त पर ही वहाँ मिलना, मैं कैसे भी करके पहुँच जाऊँगा। पता नहीं आज सोचता हूँ तो अंदर से भर आता हूँ। तुमसे वह जगह तीन घण्टे की दूरी पर थी और हमारी तय मुलाक़ात उससे कुछ ही देर पहले शुरू होने को थी। बाज़ार में हम कहीं बैठे नहीं थे। बस चलते रहे। एक नहीं कई-कई दुकाने। रंग मिल ही नहीं रहे थे। हरे रंग की चूड़ियाँ पक्के ताल के पास कहीं भी नहीं मिलीं। उन पीले धानी रंग के कंगनों पर अचानक नज़र पड़ गई, फ़िर जाने कैसे देते। अमीनाबाद के गड़बड़झाला बाज़ार से तो यह बहराइच की दुकान निकली।

उस दिन की हर याद को बार-बार पीछे जाकर देख लेना चाहता हूँ। पूरा दिन। कैसे बहाना बनाकर वहाँ से भाग निकला था। दोस्त कह रहे थे भूलभुलैया देखकर चले जाना। थोड़ा हमारे साथ भी लखनऊ घूम लेते। पर कहा फ़िर कभी। आज नहीं। सोचता हूँ अगर रुक जाता तो उन यादों में यह दिन न जुड़ पाता। कैसे वो सूट की नयी दुकान का पहला सूट हमने खरीदा। अच्छा हुआ के तुम्हारी सहेली घर पर नहीं थी। तुम कैसे उस दुकान वाले से मेरी शर्ट के लिए जिरह कर रही थी। फ़िर पता नहीं कहाँ से तुम्हारे बड़े पापा ‘क्वालिटी चाट कॉर्नर’ के पास दिख गए। चलो होता है कभी-कभी। उन्होंने बाद में कुछ कहा तो नहीं।

पता है यहाँ कई ऐसी बातें हैं जिनमे तुम भी नहीं हो। सच कहूँ तो उनमे मैं भी नहीं हूँ। हम दोनों नहीं हैं। पर पूछना मत कि फ़िर ऐसे क्यों लिख रहे हो। बस तुम्हारे पास न होने को इधर ऐसे ही भर रहा होता हूँ। दिन जैसे-जैसे बीत रहे हैं उनमे हम दोनों का पास न होना किसी ढलते सूरज के साथ उदास किए देता है। उसी से ख़ुद को बचाए रखता हूँ। इस बहाने तुम झूठ ही थोड़ी देर तो सही मेरे साथ रहती हो। वहाँ लगातार एक दूसरे को बेतहाशा हर साँस में महसूस करना है। छू नही पाते तो क्या इस तरह हम एक दूसरे को एक दूसरे में बचाए रहते हैं।

जब-जब अकेला महसूस करता हूँ अपने सपनों के पिटारे को खोल हम दोनों को उड़ने देता हूँ। साथ उड़ना साथ चलने से कहीं रूमानी है। वहाँ कोई नहीं देखता कितनी देर तक हम साथ थे। इस बहाने उड़ तुम्हें देख भी लेता हूँ कि कैसे हफ़्ता हफ़्ता बात न कर अपने को कैसा कर रही होती हो। तुम भी इसकी किश्त भरने लगो, अभी आज ही रात सपने में तुम्हारे कान में बता दूंगा। फ़िर दोनों मिला करेंगे। चुपके से। अँधेरा हो जाने के बाद। आसमान में, कहीं ऊँचे से देखते हुए। एक दूसरे की साँस में घुलते हुए।

तुम आ रही हो न आज..!! वहीँ मिलेंगे। आम के पेड़ पर। सबसे ऊँची डाल पर।

4 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ दिन से गाहे बगाहे तुम्हें पढ़ रही हूँ. अभी ठीक ठीक किसी खाके में नहीं रख पा रही कि क्या अच्छा लगता है. कुछ बड़ा सीधा, सरल, सच्चा सा लगता है. बिना रुके नदी का पानी जैसा. कुछ जाना पहचाना सा. कोई जाना पहचाना सा. किसी पुराने पढ़े उपन्यास को दुबारा उठा कर पढ़ने जैसा.

    अच्छा ये भी है कि नियमित लिखते हो. ब्लॉग का लेआउट भी एकदम परफेक्ट है. बैकग्राउंड में खूबसूरत, मगर इतना नहीं कि ध्यान भटक जाए. अच्छी तस्वीर पर जैसा अच्छा फ्रेम लगाते हैं वैसा.

    अभी तक लिखे हुए पर टिप्पणी नहीं दे पा रही. थोड़ा वक़्त और लगेगा.

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    उत्तर
    1. इन बीतते सालों में बस एक-दो जगहों को ही अपना बना पाया। उनमे से एक यह ब्लॉग। दिल के कोने से लेकर उसकी गहराई तक। पैमाइश चलती रही है। थोड़ी कलम भी साफ़ कर रहा हूँ। ख़ुद कहना भी सीख रहा हूँ।

      असल में यह चिट्ठियाँ हैं, जो 'उनके’ लिए लिखता रहा हूँ। कहता रहा हूँ। मन में कोई बात उन्हे कहनी है या कभी ख़ुद वह ही आजाती हैं तो कागज़ पर ख़त नहीं लिखता। उसे पहुँचने में वक़्त भी लगता है। इसे नहीं। यह तुरंत है। सीधे एफ़बी इनबॉक्स तक स्पीड पोस्ट की तरह।

      बस कभी कोई कुछ कह देता है तो अंदर ही सिकुड़ने लगता हूँ। सिमट जाता हूँ जैसे। जैसे अभी। समझ नहीं पाता इनपर कैसे होते जाना चाहिए। कुछ न कह पाऊँ तो नाराज़ मत होना। बस अभी कुछ और नहीं..इतना ही..

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