सितंबर 21, 2013

दिल तोड़ देने वाली फ़िल्म..

शायद बहुत पुरानी बात है कॉलेज से लौटते वक़्त ‘रीगल’ पर बस के धीमे होते ही उतर लिया। आहिस्ते से सड़क पार कर पालिका में एक फ़िल्म ढूंढ रहा था। कई लोगों को नाम भी लिखवाया था। कहा था अगली बार आऊँ तब तक लाकर रख लेना। इसके बाद तो कईबार गया। पर उसकी सीडी मिली न डीवीडी। हरबार पूछता। हर बार वही जवाब। अभी नाख़ुन काटते वक़्त बिलकुल यही सब दिमाग में चल रहा था। फ़िर कल दोपहर जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती जा रही थी लगा जैसे कुछ अंदर टूट रहा है।

सुदीप और छाया। दोनों एक ही दफ़्तर में टायपिस्ट हैं। छाया नयी नयी आई है। सुदीप पुराना है। दोनों के पास एक दूसरे के निकट आने के कई मौके हैं। कई गलतियों पर दोनों एक साथ हँसते हैं। कई बार दफ़्तर के बाद साथ-साथ वक़्त भी बिताते हैं। कई सपनों को साथ देखने के दिन अभी शुरू हुए हैं।

प्यार कुछ-कुछ ऐसा ही रूमानी-सा करता जाता है। यह धोखे में रखता है या सपनों के पास ले आता है तब कोई कह नहीं सकता। यह दोनों भी नहीं कह सकते थे। बस देख रहे थे एक सपना। ज़िंदगी साथ बिताने के लिए यह सपना था घर का। नौकरी है इसलिए पहला सपना नौकरी के बजाए सिर पर एक छत का है। सुदीप बंबई की किसी ‘चॉल’ में रहता है। छाया भी ऐसी ही किसी रिहाइश में रहती है। दोनों वर्गीय दृष्टि से समान हैं। पैसा उतना ही कमा पाते हैं जितने से पेट भर जाये। सपनों को भरने के लिए लड़ना होगा हिम्मत करनी होगी। यह हिम्मत ज़ुर्रत भी हो सकती है।

इधर उधर कर इस सपने की पहली किश्त सुदीप के जिम्मे आती है। पर इन दोनों का प्यार इस ज़ुर्रत की पहली किश्त अदा करके अपनी हिम्मत हार जाता है। जो पैसे सुदीप ने कहीं-कहीं से इधर-उधर जुगाड़ करके इकट्ठा किए थे, उन्हे मकान दिलाने का वादा करने वाला लाला लेकर भाग जाता है। साथ ले गया इनका बंबई जैसे शहर में अपने घर का सपना। इसी आघात से साथ रहने वाला दोस्त किसी चलती गाड़ी के चलते पहिये के नीचे अपना सिर देकर आत्महत्या कर लेता है। दोनों साथ टूट रहे होते हैं। दोनों को एक दूसरे को संभालना है। यह मुश्किल दिन हैं। दोनों साथ रहेंगे तो कट जाएंगे।

जितना मैं फ़िल्म देखते इनके साथ जुड़ रहा था उतना ही आगे बढ़ती कहानी अपना दम तोड़ती जाती है। मेरी एक नहीं सुनती। कभी तो बीच में लगता है यह किसी ऐसे व्यक्ति ने लिखी है जिसने ख़ुद कभी प्यार ही नहीं किया। मेरे लिए कहानी उसी क्षण उसी पल ख़त्म हो जाती है जब सुदीप छाया से ‘पीले चेहरे वाले यथार्थ’ पर बड़ी निर्ममता से अपने हिस्से की हारी हुई लड़ाई कहता जा रहा है। वह नहीं चाहता के छाया हाथों में पेट लिए घूमे और वह पेट पर हाथ रखकर। पर इसके लिए वह कर कुछ नहीं रहा है। वह बस किसी सीढ़ी को तलाश रहा है।

यहाँ प्यार नहीं रह पाया। सुदीप अपने हिस्से का प्यार हार रहा है। हार चुका है। उसे हारता हुआ देखता रहा। उसे ऐसा देख दुखी होता जा रहा था। मन करता है खींच के एक झापड़ दे मारूँ। पर नहीं, मैं वहाँ नहीं हूँ। मैं इस तरफ़ हूँ। प्यार को बचाए रखने के लिए दोनों लड़ते नहीं हैं। बस चुपके से हार मान लेते हैं। बड़ी बेरहमी से वह इस ‘वर्गीय व्याख्या’ में अपना दम तोड़ देता है। दो कमज़ोर लोग मिलकर एक सपना पूरा नहीं कर पाये।

शायद मेरे पास प्यार की ‘क्लासकीय समझ’ हो जिसपर इन दोनों को बराबर कसता जा रहा था। दोनों अपने साझा सपने को पूरा करने की कोई भी कोशिश नहीं करते, यही बात दिल में गाँठ की तरह उभर जाती है। पता नहीं शुरू से ही यह हारी हुई लड़ाई की तरह लगने लगती है। सोच नहीं पाता ऐसा क्यों होता जा रहा था। ख़ुद उन दोनों को कैसा लग रहा होगा। जिसके साथ आने वाले कल में शामें बुनी थी उन्हे अपने हाथों से उजाड़ते हैं। बिन बोले। बिन सुने।

वह लड़की जानी पहचानी नहीं थी पर अच्छी लग रही थी साड़ी में। पर प्यार को ऐसे मारता देख बार बार किसी बुरे सपने से गुज़र रहे होने का एहसास हो रहा था। कि सपना है, टूट जाएगा। पर टूटा मैं। लगा इस प्यार के लिए कम होती जा रहे समय में कोई तो होगा जो उसके लिए लड़ेगा। पर नहीं। फ़िर लगा जब इस प्यार को जिंदा रख पाने का बूता नहीं था तब इस सपने को दिखाया क्यों। पता नहीं बनाने वाले ने क्या सोच मोदी एंड मोदी कंपनी वाले से छाया की शादी करा दी। लगा कहानी ‘पढ़ो गीता बनो सीता’ वाले ट्रैक पर दौड़ने लगी। ‘वो सात दिन’ से कई साल पहले आई फ़िल्म..

4 टिप्‍पणियां:

  1. मैंने फिल्म देखी होती तो इस टिप्पणी का और आनंद ले पाटा, पर देखे बगैर भी इसे एन्जॉय कर पा रहा हूँ . शचीन्द्र, तुम्हारी कलम और साफ़ हुई है, जिसके चलते तुम्हारा बारीक ऑब्जरवेशन खूब खुल कर सामने आया है .

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    1. बस सर थोड़ा बहोत जो देखते हैं उसे लिखने का मन करता रहता है। आप ही से सीख रहे हैं। 'नया पथ' में आपके शहर की 'वैशाली' के बारे में पढ़ा। उसपर भी लिखने का मन था। पर..

      दरअसल फ़िल्म जहाँ ख़त्म होती है मेरे लिए उससे कहीं पहले उसे ख़त्म मान बैठ जाता हूँ। थोड़ी बातें जो जाने से रह गयी हैं अलग पोस्ट बना रहा हूँ। जल्द ही लगाऊँगा। अभी 'ड्राफ्टिंग' में है।

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    2. आज रात इस पोस्ट को दोबारा से पढ़ते लगा कैसे लिख गया। बस अभी उस अगली पोस्ट का लिंक दिये दे रहा हूँ..सुदीप तुम्हें ऐसे नहीं होना था।

      http://karnichaparkaran.blogspot.in/2013/09/blog-post_23.html

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