सितंबर 22, 2013

इस तस्वीर में सबसे पीछे होने की थियरी


कभी-कभी पुराने दिन आकर ठहर जाते हैं। और ठहर जाते हैं हम। उनमे हम हैं। कुछ दृश्य हैं। कुछ आवाज़ें गायब सी हो बाहर खड़ी हैं। हम भी बोल नहीं रहे हैं। बस देखे जा रहे हैं। देखना लगातार बदलता रहता है। उसमे बदलते है दिन। हम सोचते नहीं हैं। पर ख़याल ख़ुद आकर पूछते हैं। के कैसे दिन थे। उनकी याद दिल के कोने से निकल सामने आ जाती है। धीरे-धीरे उनका होना किसी किताब के पीले होते पन्नों की तरह अपने अंदर घुलने लगता है। घुलना दिखता नहीं। पर होता हमारे आस पास ही है। पता नहीं कैसे उन सड़कों को बीतती शामों के हिस्से से निकाल लाया..

इधर बराबर कई-कई सीन कट-टू-कट दिखते रहे हैं। उनका होना मेरे होने जैसा है। जैसा तब था। अब कैसा हूँ। थोड़ा बहोत कितना बदला हूँ, लगातार पैमाइश होती रही है। खोह से निकलना किताबी समझ से निकालने जैसा है। ज़िन्दगी से लेकर प्यार मोहब्बत तक पर किन्ही दूसरों के अनुभवों से ख़ुद के होने को कब तक ढोते। ऐसा ढोना बोझ लगता है और जितनी जल्दी हो सके इसे उतार फेंकना चाहिए। खेत में जोत दिये गए बैल की तरह घाम में नहीं बने रहना।

ज़िन्दगी जितना जी नहीं रहे थे उससे जादा ‘थियराइज़’ कर रहे थे। कि उस छोटे से कमरे वाले घर में कैसे शादी के बाद रहेंगे। कैसे वह नयी आने वाली काया अपने को वहाँ ‘अडजेस्ट’ करेगी। दिन कैसे भी हों, रातें कैसी होंगी। यह परेशान करने वाले सवाल थे। जिनपर सोचने का मन कभी हुआ तो हर बार उदास हो गया। उस मेज़ पर रखी किताब की तरह जिसे उठाने की जहमत कभी की ही नहीं। जब की तब उन्हे लौटाने की तारीखें पास आ जाती। और इतनी जल्दबाज़ी में कुछ भी सोच कहीं पहुँचने के बजाए वह उलझी जादा हैं। हर बार। अभी भी इतने क़ाबिल हो भी सके हैं कि इन सवालों से ख़ुद को 'रिलेट' कर सकें। कह नहीं सकता। कभी होगा तो लिख दूँगा।

पर यह बिलकुल सच है के कभी मुक्त होकर प्रेम भी नहीं कर सके। क्योंकि उन किताबों के ऊपर चढ़कर बैठ चुके थे। वही दिमाग पर चढ़ी रहती और उन्होने कभी ख़ुद से आगे बढ़ने की हिम्मत दी नहीं। या ऐसे कहूँ ख़ुद में यह हिम्मत कहीं से आ ही नहीं सकी। फ़िर यह भी याद नहीं आता कि हम इस जैसे किसी भी अनुभव से दुतरफ़ा गुज़र रहे हों। अकेले हरारत को महसूसते रहने की दरमियानियों में किसी तरह साँस ले पारहे थे, यही काफ़ी था। इस ‘फ़्लैशबैक’ ‘बैक्ग्राउण्ड’ की ‘स्कैफ़-होल्डिंग’ के साथ जीते मरते ख़ुद से ख़ुद की पहचान बढ़ाने का मौका लिए यह तस्वीर वाली जगह आई। रोहतांग के आस पास कहीं की है। साल दो हज़ार नौ। महिना अक्टूबर।

इस तस्वीर में सबसे बाएँ मैं खड़ा हूँ। मफ़लर गले में न होकर कानों को ढके हुए है। गले पर शाल है। जैकेट के अंदर ‘थर्मोकॉट’ भी पहने हुए हूँ। बर्फ़ की शक्ल में ठंड दिख भी रही है। जानता हूँ इस तरह स्मार्ट तो बिलकुल भी नहीं लग रहा। पैंट पहाड़गंज के दर्ज़ी ने मन लगाकर पैजामे की तर्ज़ पर सिल दी थी। कुछ कहते तब भी यह अमिताभ की ‘बेलबॉटम’ होने से रही। इसलिए कुछ कहे बिन अपने कपड़े वहाँ से उठा लिये थे। कपड़ों को लेकर ‘कुन फ़ाया टाइप’ विचार रणबीर की ‘रॉकस्टार’ आने से कई साल पहले ही ‘अंतर्भुक्त’ कर चुका था। इसलिए अजीबो गरीब दिखने में कोई टेंशन न थी। जिसको जो भी लगना हो लगता रहे। यह भी उसी सैद्धांतिकी का एक पक्ष था। कोई फ़र्क न पड़ने वाला।

इतनी रात गुज़र जाने के बाद जब घड़ी ढाई और तीन के बीच रुक सी गयी है ठंडी हवा बगल से गुज़रते हुए कान में कुछ कहते हुए झींगुर की आवाज़ के पास ले आई है, तब सोचता हूँ, इतना इत्मीनान कहीं नहीं था। लिखने में अजीब तरह की बेचैनी तैरती रहती, जो कहीं बैठती नहीं थी। न बैठ कुछ सोचने के क़ाबिल रखती थी। यह अकेलापन अंदर तक तोड़ता जा रहा था। इसे किसी भी तरह आज पारिभाषित करने का मन नहीं होता। बस एक ऊब सी होती थी। ऊब होती थी यह लिखने में कि हम भी हाँड़ माँस की देह को ढूँढ रहे थे। जिससे कुछ देर बोल बतला सकें। उसे अपना कह सकें। राकेश इसे कहता ‘भावनाएं अशरीरी भले होती हों परन्तु उनकी जीवन्तता और उर्जा तो शरीर ही महसूस करता है। अपनी स्थूल अभिव्यक्ति में वो शारीरिक है। तुम्हारी इस अतिवादी धारणा से मैं सहमत नहीं हूँ कि ‘प्रेम अशरीरी होता है’। मेरी समझ से इसे, छुआ जा सकता है, और नहीं छुआ जा सकता है, का द्वंद्व कहा जा सकता है’।

पता नहीं आज इन पंक्तियों को पढ़ मुझे कैसा हो जाना चाहिए। पर तब एक स्तर पर किसी विपरीतलिंगीय अनुभूति को महसूसते वक़्त देह बीच में नहीं लाता था। आकर्षण का हेतु इस तक पहुँचने का प्रयोजन कभी न बन सकी। अपने आप में यह लिखना ख़ुद को कई संभावित आरोपों से मुक्त कर लेने के लिए गढ़ ली गयी ढाल है। पर क्या करूँ ख़ुद को बचाना भी तो है। फ़िर ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अभी भी चल रही हैं। कई बातें हैं, जो रही जा रही हैं। पर रात जादा हो गयी है। सोने जा रहा हूँ। उन्हे भी कभी कह दूंगा। बस अभी तो यही सोच रहा हूँ एक तस्वीर मुझे कितना पीछे खींच ले गयी। इसने किन बातों को कहने का बहाना बनाया। किन्हे जान बूझकर रहने दिया। पर बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है जितनी लिख भर दी हैं। मेरे आज में इनकी स्थिति कैसी है यह भी मार्के का सवाल है। 

बहरहाल..वह सब फ़िर कभी..

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