सितंबर 23, 2013

सुदीप तुम्हें ऐसे नहीं होना था..

पिछला पन्ना, दिल तोड़ देने वाली फ़िल्म..

ख़ुद को थोड़ी देर सुदीप की जगह रखकर देखने का पहला मिनट बीता नहीं कि अपने आप से कोफ़्त होने लगी। जिसके साथ ज़िन्दगी बिताने के दिन बुन रहा हूँ, उसे कह दूँ, के अपने हिस्से के सपनों को पूरा करने के लिए वह उस अमीर कंपनी के मालिक से शादी कर ले। शायद उसका बूढ़ा होना मुझे खटक रहा है या कुछ स्थापित आदर्श आड़े आ रहे हैं। पता नहीं। उसकी उमर कुछ जादा है तो क्या। क्या ऐसा होने से वह कुछ कम इंसान हो गया है। उसमे संवेदनाएं नहीं हैं। उसके पास सीने में दिल नहीं है। थोड़ा बूढ़ा ही तो है। और इत्तेफ़ाक से उसकी दिवंगत  पत्नी की शक्ल हू-ब-हू छाया से मिलती है। कर लेने दो शादी। शादी ही तो है। कितने दिन ज़िंदा रहेगा बुड्ढा।

जिन तर्कों से सुदीप छाया को समझा रहा है, उन्हे ख़ुद को नहीं समझा पाया। कैसे इतनी तरहों से अपने प्यार को छोड़ रहा है। शायद यह मामला मेरी नैतिकता में आकार फँस भी गया है। सुदीप जहाँ से सोच रहा है वहाँ कम से कम मैं नहीं हूँ। वह कह रहा है शादी के बाद भी कुछ नहीं बदलेगा। मतलब मेरे मन में कहीं-न-कहीं चल रहा है, के कुछ तो है, जो बदलेगा। यह बदलना पति-पत्नी के रूप में उन्हे स्वीकार करने के बाद से शुरू होगा। उनकी भूमिकाओं के ‘सेट’ हैं, जो उन्हे वह रहने ही नहीं देंगे। वह बस एक सपने को स्थगित कर दूसरे सपने की तरफ़ बढ़ रहा है।

मतलब यह मामला पुरुष होने का भी है। उसने सिर्फ़ ‘मोदी एंड मोदी’ के मालिक को सीढ़ी नहीं कहा। उसने छाया को भी इसी रूप में लिया। चलिये क्षण भर के लिए सुदीप के इस विचार को उन दोनों की साझा इच्छा मान भी लें, तब भी तो यह इतना एकरेखीय नहीं लगता। ‘अर्थ’ यहाँ निर्णायक भूमिका में लगता है जो अभी किसी दूसरे के पास है, उसे अपने पास लाने का कोई और विकल्प न दिखना न सूझना उस समाज में विकल्पहीनता का सूचक है या कुछ और। क्या जितना है, उस से कोई भी शुरुवात नहीं हो सकती। छाया तो छोटे से कमरे में भी साथ रहने को तय्यार है। पर सुदीप पीछे क्यों खिसक रहा है। फिर इतने सालों बाद अब जबकि आवारा पूँजी का दौर है ऐसी कहानियाँ कितनी बची रही हैं शोध का विषय है। यह पैसा अभी भी इसी रूप में विद्यमान है या कुछ बदला भी है। लगता तो है के इस समाज की तह में वह ज़िन्दा भी होंगी।

अपने इस अर्थ में सुदीप ‘उत्तरआधुनिक’ है। उसने स्त्री को ‘देह’ के रूप में ही लिया। कि अगर इसी से कुछ मिलना है तो ठीक। यह सीधा रास्ता नहीं है, पर एक रास्ता ज़रूर है। इस रूप में भी वह प्रयोजनवादी है कि संस्थागत रूप से उसकी प्रेमिका के किसी की पत्नी बन जाने के बाद भी वह उस ‘भोगी गयी देह’ को स्वीकार करने को तय्यार है। कितना विशाल हृदय है हमारे नायक का। यह ‘भोगा जाना’ लिखना मेरे उतने ही पुरुष होने का सबूत है जितना सुदीप का सोचना। हम दोनों में मूलतः अंतर क्या है समझ नहीं पा रहा। क्या कोई अंतर है भी। या मैं उससे जितनी जल्दी हो सके इससे दूर हो जाना चाहता हूँ। बहरहाल इसके पीछे गंध तो कुछ ऐसी ही आ रही है जहाँ आर्थिक रूप से सबल विधवा प्रेमिका को वह सहजता से पूर्व रूप में स्वीकार कर लेगा। बाद में करे न करे अभी कह तो यही रहा है।

यह कोई शास्त्रीय उद्दात नायक की कामना नहीं एक साधारण से निम्न मध्यमवर्गीय व्यक्ति की बड़ी छोटी सी दुनियावी इच्छा है। वह बने बनाए मानकों को तोड़ रहा है। हमारे मन पर आघात करता है। मन में स्थित आदर्श हिलने लगते हैं। यह उन सभी पिछली फिल्मों की तरह नहीं हो जाती। कि प्यार कभी हारता नहीं। नहीं। वह हारता है। यहाँ हार रहा है। और जब हारता है तब उसे ऐसा ही निर्मम हो जाना पड़ता है। सारी कोमल भावनाएं कहीं उड़ जाती हैं। यहाँ परिस्थितियाँ उनके सपने को हर चुकी हैं। साथ ही यह इसकी भी कहानी है के एक जवान लड़की किसी बूढ़े की पत्नी नहीं बन सकती। वह अपने प्यार भरे दिनों को भूल भी सकती है। उन सारी शामों को अपनी याद्दाश्त से मिटाने लगती है।

पर यह उतनी ही यथास्थिति को पोषित करने वाली भी है कि कम पैसों में ज़िन्दगी ‘पीले चेहरे वाला यथार्थ’ बन जाती है और उसे वह जीना नहीं चाहता। जो जी रहे हैं वह मर रहे हैं। उनके पास कोई चारा नहीं है। लेकिन  यह उतना ही सच है जितना सतह पर तैरता लगता है। नीचे कई संरचनाएं अपना काम कर रही हैं जो इसे बस इतना सरल नहीं रहने देती। मैं ख़ुद कितनी आसानी से अपने दिल के पास उग आए इन दोनों के प्यार के साथ को छोड़ रहा था। पर नहीं। शायद मन में खयाल फिर आ गया है के जब दोनों ने प्यार किया था तब इसे उसके मुकाम तक ले ही जाना था। मतलब यही मेरी प्यार की ‘क्लासकीय’ समझ है जो बार-बार फ़िल्म को फ़िल्म के रूप में देखने से रोकती रही और आखिर तक आते-आते बिफ़र पड़ता हूँ। फ़िर याद करता हूँ अपनी ही देखी हुई कई सारी फ़िल्में। एक एककर सोचे जा रहा हूँ जैसे।

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