सितंबर 24, 2013

तुम इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल हो

आज उस तस्वीर वाले ‘मैं’ को बीतते सालों में यादकर बहुत दूर बैठा हूँ। इसके बाद आगे क्या लिखूँ समझ नहीं पा रहा। इन बीतते सालों में कैसा होता गया हूँ। शायद कुछ कुछ जानता हूँ। शायद नहीं भी जानता होऊंगा। किसी का भी अपने कल से आज में आना पूरी तरह से व्यक्तिनिष्ठ है। उसके अपने तरीके हैं। कोई बना बनाया ढर्रा नहीं है। सबकी ज़िंदगियाँ, उनकी अपनी ज़िंदगियाँ हैं। जो साथ थे और जो साथ नहीं थे। सब लगातार बदलते रहे हैं। उनमे उनका नया भी है, पुराना भी। वह कैसे हो जाना चाहते हैं यह जितना उनपर है, उतना ही उनपर नहीं है। ख़ुद को लग रहा है जैसे खेल रहा हूँ। पर नहीं। बस थोड़ा थोड़ा समझने की कोशिश में हूँ।

कहाँ से शुरू करूँ। दिन से, रात से, शाम से, कहाँ से। धीरे-धीरे सब बदला है। पहले लिखते-लिखते किसी के फ़ोन का इंतज़ार नहीं रहता था। पर अब है। सवा छह होंगे और घंटी बजेगी। उधर तुम होगी। तुम्हारी आवाज़ होगी। फ़िर मैं होऊंगा और मेरी आवाज़ होगी। ढलती शाम कभी ऐसे महसूस नहीं करता था। अब करता हूँ। के थोड़ा मैं रहूँ, थोड़ी तुम रहो। धीरे-धीरे एक दूसरे में घुलते जाएँ। फ़िर धीरे से कान में कुछ कह, चुपके से मुस्कान होंठों से होते हुए, दिल में उतरती जाए। आती जाती साँसों के साथ धड़कन भी तेज़ होकर आहिस्ते से किसी कोने में छिप जाये। और चुपके-चुपके हमारी सारी बातें सुनती रहे।

सच कहूँ तब यह एहसास मेरे पास नहीं था।मेरे पास तुम नहीं थी। तुम्हारे पास मैं नहीं था। बस ऐसे ही दिनों शामों की अन बनी यादें थीं। किसी से कहता नहीं था। बस दूर से किसी के न होने पर उदास से सूरज को और उदास किए देता था। वह मुरझाया-सा डूब जाता। बिलकुल मेरे दिल की तरह। उसकी धड़कने महसूस करने वाला कोई नहीं था। कितने अकेले से पल थे। हर पल किसी के न होने की टीस आसपास मंडराती सी रहती। कितने ही पन्ने मेरी आँखों से न निकालने वाले आँसू देखते रहे हैं। उन्हे बचाकर ख़र्च करता। कि सब एकबारगी न चलें जाएँ।

मेरे अकेलेपन में मैं अकेला ही था। उसे बाँटने वाली तुम नहीं थी। फूलों की तरह मुसकुराती तुम्हारी मुस्कान नहीं थी। तुम्हें बता नहीं सकता के तुम्हारे साथ के लिए कितनी रातें बस ऐसे ही लेटे-लेटे काट दी। मेरे पास वह शब्द नहीं हैं के उन गुज़रते पलों के अकेलेपन को बिलकुल उन्ही की तरह दोहरा जाऊँ। शायद अनुवाद भी न कर पाऊँ। उन कटती रातों में बस सोचता था। कर कुछ नहीं पाता था। करवट-करवट पता नहीं कैसा होता जा रहा था।निपट अकेलाबेकारबेकामबोझिल सा। 

अभी बस तुम्हारे, तुम्हारी आवाज़ के आसपास हो जाना चाहता हूँ। के कुछ देर उस नम घास पर बैठ एक दूसरे से कुछ कहते। तुम्हें फ़िर बताता अपने वो दिन किसी के गुमशुदगी के दिन थे। मैं खो गया था, खुद से। अपनी पहचान से गायब होकर भटक रहा था। कोई ढूंढ नहीं रहा था। किसी के लिए इतना ज़रूरी नहीं था के रोक कर पूछे। कैसे हो। बस चलते-चलते अकेला होता जाता। कभी-कभी ख़ुद को भी नहीं मिलता था। सब मेरी धड़कन के साथ चुपके से दिल की कब्र में दफ्न होते चलते। उसकी आवाज़ें सुनने के लिए पास से गुज़रना ज़रूरी था। थोड़ी-सी मेरी चुप्पी सुनने का इतमीनान ज़रूरी था। ज़रूरी था मेरे साथ रुक जाना। पर इस अनुपात में औरों की नज़र में गैरज़रूरी-सा मैं किसी अनचाहे कोने में अपनी बन्द आँखों के साथ बैठा रहता। उस अकेलेपन से भागता भागता लगातार थक रहा था। थक सा गया था। हार रहा था। हार सा गया था। थोड़ा नाराज़ था। थोड़ा और नाराज़ हो गया था।

मेरे आज में तुम हो। तुम्हारे आज में मैं हूँ। हम दोनों एक दूसरे में हैं। इन पलों के लिए अंदर ही अंदर कितना  छटपटाया हूँ उन्हे बस धड़कता दिल ही कह सकता है। जो बिलकुल तुम्हारे बगल में बैठा धीरे-धीरे तुम्हारी तरफ़ खींचे रहता है। तुम्हें चुपके से पुराने दिन बताता भी होगा। के कितना इंतज़ार किया है मैंने। उन दिनों का बीतना मेरे बीतने जैसे था। अजीब तरह की उधेड़बुन में लगे रहना। चिड़चिड़ेपन से लगातार चिड़चिड़ा होते रहना। बात-बात पर गुस्सा। चेहरा चेहरा न होकर मातम होता जा रहा था। तुमने मुझे निकाला। बड़े आहिस्ते से खींचा। इतमीनान से पास बुलाया। बिठाया। साथ चलने को कहा।

आज हर बात के बाद तुम हो, हर बात से पहले तुम हो, हर बात में तुम हो। तुम्हें छोड़ कर जाने का मन नहीं होता। कहीं कान में पहनी बाली को निहारने का मन होता है। तुम्हें बिन बताए। अब जब कभी उस कल को सोचता हूँ जहाँ तुम नहीं थी तो लगता है कितना अधूरा सा था सब। मेरी सुबह, मेरी शाम, मेरी रात। कुछ-कुछ मैं भी भरा हूँ तुमसे। कुछ-कुछ तुम भी भरी होगी मुझसे। उस खालीपने की ऊब से निकल अब पेड़ की छाव में चुप से बैठे हमदोनों कभी नज़र आते हैं। उससे कुछ ही देर पहले कोई बात हाथों को छूती सीने के पास से अभी-अभी गुज़री हो जैसे। और हम चुप्पे से देख रहे हों किन-किन तरफ़ों से सब हमें देख रहे हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर लेखन ,बखूबी से बयाँ करते हुए

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  2. बहुत सुंदर लिखा है पढ़कर बहुत अच्छा लिखा
    Hindi Shayari

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