सितंबर 27, 2013

कभी-कभी कुछ तस्वीरें अंदर तक पकड़े रहती हैं


पता नहीं तुम कैसे होते गए होगे। तुमने बिन कहे मना किया होगा। थोड़ा झिझके होगे। थोड़े पैर लड़खड़ाए होंगे। बिलकुल जुबान की तरह वह भी कुछ कहते-कहते रुक गए होंगे। कैसे कहूँ। यही सोचते-सोचते तुम बस खड़े रह गए। चेहरा किसी नयी नवेली दुल्हन की तरह शरमाया सा नहीं लग रहा। बस तुम्हारा वहाँ होना दिल तोड़-सा रहा है। सच कहता हूँ, तुम्हें वहाँ से भाग लेना चाहिए था। तुम्हारी एक तरफ़ झुक गयी गर्दन अभी भी मेरी आँख में आँसू की तरह माजूद है। तुमने आँसू पोंछ लिए होंगे। उसमे तुम ही नहीं, मैं भी हूँ। पता है तुम वहाँ नहीं होना चाहते थे। पर तुम्हें घेर लिया होगा। किसी भेड़ की तरह। किसी मेमने की तरह। कितना अमानुषिक हो गया होगा वह तस्वीर खींचने वाला। जो तुम्हें बिलकुल ऐसे ही उतार लेना चाहता होगा। बिलकुल ऐसी ही जैसे तुम सच में हो। जैसे कुछ-कुछ सच में मैं भी हूँ।

कमीज़ में बटन नहीं हैं। खुली हुई है। छाती दिख रही है। कमर में अँगोछा बाँधे घूम रहे हो। तुम्हारी माँ को पता था तुम आज तस्वीर खिंचवाकर आए हो? जब उसे पता चला होगा तब उसे गुस्सा नहीं आया होगा। बल्कि दौड़ कर कोने में रखे डिब्बे से सूई धागा ले आई होगी। फ़िर थोड़ी देर तुमसे चिपटकर खूब रोयी होगी। बताया नहीं होगा क्यों उसका दिल भर आया। तुम भी समझ नहीं पाये होगे। तब पता नहीं गले की माला उतार एक बार फ़िर नज़र भी उतारी हो। चूल्हे में लाल मिर्च झोंक बाहर निकल गयी हो। फ़िर निकाली होंगी सैकड़ों गालियाँ। उस कलमुंहे दाढ़ीजार को ख़ूब कोसा होगा। और इस गुस्से पीड़ा दुख को मुँह से थूक बनते बाहर निकलते तुम देख रहे होगे। सब देख रहे होंगे। बोला कोई नहीं होगा। 

तुम्हारी आँखों की तरह उसकी आँखें भी खाली होंगी। उसमे कोई सपना इंतज़ार नहीं कर रहा होगा। वह बस इंतज़ार कर रही होगी तुम्हारी उम्र के बड़े होने का। पर डरती भी होगी कि तुम भी कहीं उसे छोड़ चले न जाओ। इसलिए तुम्हें कुछ कहती नहीं है। बस रोती रहती है। वह जो तुम्हारी कमर में कमरबंद है वह उसके हिस्से की सुनहली सी सपनीली सी याद है। तुम्हारे पिता की। उसने तुम्हारी कमर पर बाँध दिया है कि कभी अपने पिता याद आए तो हमेशा वह तुम्हारे साथ रहें। तुम बार-बार उनके बारे में न पूछो। इस बहाने वह तुम्हारे छुटपन में ही तुम्हें इतना प्यार कर लेना चाहती है जिसके सहारे अपनी सारी ज़िन्दगी गुज़ार सके। जिसका कुछ हिस्सा कल याद आए तो रोये नहीं।

पता है तुम उस स्कूल में नहीं पढ़ते। तुम्हें कोई घुसने भी नहीं देता होगा। पर उस ‘ब्लॅकबोर्ड’ के सामने खड़ाकर जो विद्रुप रचने की कोशिश की है, वह भी पता नहीं कितनी सफ़ल हुई होगी। कितनों ने तुम्हें खोज निकाला होगा। चुनाव आ रहे हैं इसलिए थोड़ा डर रहा हूँ। पर यहाँ कह दूँ राजेश जोशी की तरह भावुक नहीं हूँ के तुम्हारे उस चारदीवारी, जिसे स्कूल कहते हैं, से बाहर हो जाने पर मासूम सी कविता लिखने बैठ जाऊँ। क्योंकि मुझे पता है वह तुम्हें आठवीं तक खाना खिलाएँगे और बाहर फेंक देंगे। हमने तुम्हें आगे तक पढ़ाने का क़र्ज़ नहीं लिया है, तुम्हें जाना होगा। वहीं बाहर की दुनिया में। तब तक क्या पेट तुम्हारे पेट को छोड़ कर कहीं चला जाएगा। या उसे भूख नहीं लगा करेगी। पता नहीं।

सारे सवाल उस कमीज़ के बाहर झाँकते पेट से शुरू होकर उसी पेट तक जाते हैं। तुम उसे ढक नहीं पाये। तुमसे जानबूझकर किसी ने कहा भी नहीं होगा। तुम्हारे खाली पेट को देख कर ही हम और पैसा उठा सकेंगे। इंतज़ार करो तुम्हारे नाम पर भी कोई योजना जल्द घोषित होने वाली होगी। तब तक अपना मरना टाल सको तो बड़ा अच्छा होगा। तब तुम जान पाओगे जिस बीमारी ने तुम्हारे पिता को ज़िंदा मार दिया उसके लिए भी हम कुछ न कुछ करने की सोच रहे हैं। तब तुम्हें पता चलेगा हम कितने संवेदनशील समाज में जी रहे हैं। तुम्हारी माँ को आंगनबाड़ी में नहीं लगाया या एएनएम बहनजी न बनाया तो नाम बदल देना। जहाँ तुम रोज़ मरने से बचने की लड़ाई लड़ रहे हो। वहाँ हम तुम्हारे बारे में कितना सोच रहे हैं। अंतर इतना है कि खाली पेट कभी भरता नहीं। काश इन बातों से भर जाता।

सच कह रहा हूँ तुम कभी इन सरकारी स्कूलों में पढ़ने मत आना। तुम्हें हजम कर जाएंगे। पता है जिस विशेषांक के मुखपृष्ठ पर तुम्हारी यह सकुचायी-सी तस्वीर लगी है, वह यही बता रहा है कि इस पढ़ाई ने तुम जैसे बच्चों को आँकड़ों में तब्दील कर गायब कर दिया है। वह अब कहीं नहीं हैं। वह विश्व बैंक की ‘स्टेटस रिपोर्ट’ की गिनती भर रह गए हैं। पता नहीं तुम पढ़ना जानते भी हो या नहीं। यह सब लिखा है तुम तक कभी पहुँचेगा भी कि नहीं। पर कई दिन से टाले जा रहा था। बिल्कुल उस दिन से जबसे प्रमोद सिंह ने अपनी नोटबुक में लिखा। अभी भी कह रहा हूँ इन सबसे दूर ही रहना। पढ़ना लिखना सीख गए तो बर्बाद हो जाओगे। क्योंकि तुम पढ़ना लिखना सिर्फ़ कागज़ पर सीख रहे होगे, असल में तुम्हें चारे में तब्दील कर लिया जाएगा। जिससे किसी की थाली भर रही होगी।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपने लिखा....हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} 29/09/2013 को पीछे कुछ भी नहीं -- हिन्दी ब्लागर्स चौपाल चर्चा : अंक-012 पर लिंक की गयी है। कृपया आप भी पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें। सादर ....ललित चाहार

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    उत्तर
    1. इतनी औपचारिकता से थोड़ा अपच है। इसलिए दोस्त, जितना हो सके बचने का प्रयास किया करें। और जहाँ तक 'पधारने की क्रिया' की बात है, वह वक़्त निकलते शायद पिछले साल ही कर चुका हूँ।

      उधर लिंक लगाने से नीचे दो-चार कॉमेंट भी देख पा रहा हूँ, इसलिए तुम्हारा आभार..:)

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  2. उत्तर
    1. इन सूत्र वाक्यों से इतर भी कभी कुछ कह दिया कीजिये, तो कुछ हमारी समझ में आ जाया करेगा..:)

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  3. उत्तर
    1. जी चित्र भी और शब्द भी..!!

      और कुछ कहने का कष्ट करते, तो देख पाते, कहाँ तक हम सक्षम हुए हैं।

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  4. उत्तर
    1. बिलकुल सही।

      नयी कड़ियाँ ऐसे ही जुड़ती रहें, लोग लिखते रहें।

      हटाएं

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