सितंबर 03, 2013

राकेश: जो सपनों में कहीं खो गया है

क्या जब हम सबसे जायदा कमजोर होते है तभी अपनी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत सपने देखते हैं, उन्हे बुन रहे होते हैं। उनके हसीन होने के दिनों का इंतज़ार कर रहे होते हैं। बड़ी आहिस्ता से उन्हे गढ़ने में हम किसी भी तरह कोताही नहीं बरतते। हम लगातार उन सपनों को साँसों की तरह अपना हिस्सा बनाते हैं। और तभी कहीं अंदर सबसे जादा टूट भी रहे होते हैं। जब एक-एक कर वह हमारे हाथों से फिसलते से जान पड़ते हैं। सपने बिखरते नहीं हम बिखरते हैं। उनके टूटने से कई घड़ियों पहले हम खुद को तय्यार करने की कोशिश करते हैं। पहली बार राकेश इन्ही उलझनों के बीचों बीच कहीं अटका सा फँसा सा मिला।

इन सपनीली-सी लगती पंक्तियों की तरह ही राकेश है। माने, तुम हो। बड़े दिनों से टाल रहा था लिखना। कई मर्तबा पूछने के बाद भी, फोन रख लिखता नहीं था। राकेश से पहली मुलाक़ात कब हुई कोई तारीख़ याद नहीं। बस एक दिन हो गयी। एक ही सेक्शन में होने ने इसे कई-कई बार होने के कई-कई मौके दिये। तब हमारे लिए एक ही गम था, मोहब्बत। और एक ही राहत थी, वस्ल की राहत।

डूबे-डूबे बुझे-बुझे से दिनों से दोस्ती। उमर का दूसरा नाम शायद अपने आस पास बनते दबाव भी हैं। जिन्हे चुनते तो हम ही हैं पर वह कभी हमारे मन मुताबिक आकार लेते दिखते नहीं। उस वक़्त हम एक गंभीर मुद्रा ओढ़ लेना चाहते हैं। कि उसका कोई नतीजा हमारी तरफ़ तो निकलेगा। पर एक लड़का जो दिल्ली रहते किसी ऊँचे आले दर्ज़े की नौकरी के लिए कुछ साल और माँग रहा था, उसे वह मोहलत नहीं मिलती। धीरे-धीरे उसके हिस्से के सपने फिसलते से लगते हैं। उनका लगना अंदर तक तोड़ देना है।

वह टूट रहा था। पर जुड़ भी रहा था। एक और स्थगित सपने ने उसे जीने का एक और मौका दिया। बहुत पुराना। लगभग उसी पहले वाले सपने के साथ का। पर उसमे वह अकेला नहीं था। वह दो थे। यह सवाल इससे बिलकुल जुदा है कि क्या सपनों की भी कोई उम्र होती है, उनकी भी कोई मृत्यु तिथि तय होती है। यह नियतिवादी हो जाना नहीं है। पर महत्वपूर्ण है कि सपने वक़्त के साथ-साथ अपना मूल्य खो रहे होते हैं। बिलकुल हमारी आँखों के सामने। इतनी पास होने के बावजूद हम कुछ करने की स्थिति में नहीं होते। हम उनका घटित होना स्वीकारने लगते हैं। अब दिक्कत है के वह सपना नहीं सच है।

कभी-कभी लगता है हम तुम जैसे कई लड़कों को इधर वामपंथी विचारधारा के टक्साल में इस्पात बनाने के लिए चुन लिया गया था। कुछ हम अपने अस्तित्व को बृहतर संदर्भों में तलाशते वहाँ जा पहुँचते हैं तो उन्हे भी उस युवावस्था का नकार अभीष्ट होता है। बनी बनाई किसी भी संरचना के प्रति अस्वीकार का आकर्षण खींचे लेता है। मुट्ठी भींचने से लेकर गले की नस उभर आने तक वाली गर्मी में बस चलते जाना। फ़िर लगता है इसने हमें ‘एडजस्ट’ होने में किसी भी तरह से मदद नहीं की। ख़ुद ऐसा सोचना उसी प्रचलित विमर्श का हिस्सा है, अवसरवादी हो जाना है। जहाँ आप अपने आने वाले दिनों में ‘आर्ट्स फ़ैकल्टि’ में पाये जाने वाले ‘मिश्रा जी’ होना नहीं स्वीकारते। यह उन विचारों से विचलन की तरह देखा जाता है।

तुम उधर रीवा के बोर्डिंग स्कूल में एक ऐसा स्पेस बनाए बचाए रखने की जद्दोजहद में लगातार लगे हुए हो जिसमे कोई किसी भी ‘काउंटर थॉट’ के लिए तय्यार नहीं है। उसके कम होने से हम भी नहीं रहेंगे। पता नहीं यह कैसा होते जाना है। हम शायद ऐसे ही अपने होने को मानते हैं। कभी लगता है तुम्हारे अंदर इतना नाज़ुक दिल रहता है जो तुम्हें तुम बनाए रखता है। जब भी मन होता है पन्ने पलट इस कविता को दोहरा लेता हूँ। पता नहीं ऐसी कितनी पंक्तियाँ तुमने अपनी डायरी में कभी-कभी लिखी होंगी, जो हमें कभी दिखी नहीं : 

दस बाय बारह का कमरा है
आज की ज़िन्दगी जहाँ बसी है,
एक समूची दुनिया अपने औज़ारों के साथ। 
बिखरी किताबें, फैले कपड़े, 
टूटी कुर्सी, अधमजे बर्तन 
इन सबके बीच बैठा 
एक आदमी खोजता है, ज़िन्दगी की गलियाँ।

अपनी ताकत को बटोरते, अधमरे पेट के साथ, 
वह नहीं जायेगा गाँव, 
नहीं ताकेगा आकाश, 
जहाँ तारों की गिनती मुश्किल, 
नहीं दौड़ेगा उन पगडंडियों में, जो ख़त्म नहीं होती थी। 
वह यहीं रहेगा दस बाय बारह के कमरे में, 
चार लीटर पानी और पाँच किलो आटे के साथ 

क्योंकि बड़े बनने का रास्ता 
अब नदियों के किनारे से नहीं, 
नालियों के ऊपर से जाता है। 
और गाँव में तो फ़िर सूखे की उम्मीद है।

तुम्हारा इतना बेतरतीब हो जाना कभी-कभी खटकता है। जैसे एक दोपहर तुम्हें पता था दिल्ली से आगे आने वाले कई दिनों के लिए जा रहे हो। पर बिन बताए तुम अपने को समेटते यहाँ से चल दिये। शायद उन अनदेखे दिनों के लिए ख़ुद को तय्यार कर रहे होगे। किन्ही यादों को बटोर रहे होगे। चुन रहे होगे। किनको ले चलूँ। किन्हे यहीं दोबारा आकार बुन लूँगा। कई मोड़ यहीं रहने दिये। कई बिन ख़तम हुई बातें अभी भी वहीं अटकी पड़ी हैं। कई इन बीतते सालों में लगातार जुड़ती रही हैं।

तब जब ख़ुद को निपट अकेला महसूसता रहता हूँ तब लगता है तुम्हें दिल्ली होना चाहिए था। फ़ोन पर चाह कर भी अपने दिल की बात नहीं कह पाता। तुम कहाँ तक मुझे निकालोगे। तुम्हारी समझदारी के आगे हम कहीं भी नहीं ठहरते। जहाँ हम उन्हें बस सोचते रहे वहीँ तुम उन्हें जीते रहे। यह थियरी प्रैक्टिकल जैसी किसी फाँक की तरह बराबर दिखता रहा। उन सबमे ‘कथार्सिस’ जैसी परिघटना में अब तुम नहीं हो। पर अगले क्षण सोचता हूँ जो हमें हमारी उलझनों द्वन्द्वों से इतनी आसानी से निकाल लाता है, ख़ुद क्यों नहीं अपने साथ भी ऐसा करता। कभी इतने निराश होकर बात करते हो के पूछो मत।

ज़िन्दगी जैसे बड़े, भारी- भरकम शब्द को हम बस थोड़ा-थोड़ा जीने की कोशिश करते रहें, यही काफी है। उसके बनते ढर्रों में ऊब तो है पर चोर दरवाज़े भी हमी को ढूँढ निकालने होंगे। नया किसी पुराने को अपदस्थ करके ही आएगा, ऐसा सोचना पता नहीं खुद को कैसा कर लेना है। इसका कोई बना बनाया पैटर्न नहीं है। सबके अपने तरीके हैं। पता है तुम लगातार खोज भी रहे होगे। एक दिन या एक शाम या एक रात सपने में वह टकरा ही जाएगा। परेशान न हो। उसने हमारे हिस्से को अपने वजन से ढक लिया है तो क्या। उसे भी उठा लेंगे।

आगे की फ़िर कभी। जब तुम दिल्ली आओ तब। अभी तो बस इतना ही कहना चाहता हूँ के कभी लगता है तुम इतना कम क्यों लिखते हो। हम भी लगातार तुम्हारा लिखा पढ़ना चाहते हैं। तुम्हारे पास जो भाषा है उसके तो कायल हैं। उन ‘टूल्स’ को ‘पब्लिक स्फेयर’ में आने का मौका तो दो। लो चलो तुम भी क्या याद करोगे, तुम्हारा लिखा तुम्ही को पढ़ा रहा हूँ:

शादी के तीन साल। नौकरी के दो साल। सब रोजगार के बाद शादी करते हैं। शायद शादी को भार समझते हैं। हमने शादी की। रोजगारी -बेरोजगारी से इसका कोई सम्बन्ध नहीं समझा। क्यों की हमारे लिए शादी प्यार का ही उत्सव है।
कुछ पहले प्यार फिर नौकरी तब शादी। नौकरी नहीं हुई तो प्यारे -प्यारी नौकरी वाले के पास उड़ जाते हैं। इसमे माँ -बाप भी मदद करते हैं। कुछ रोजगार विहीन होकर अभी शादी विहीन बैठे हैं। कुछ पीएचडी भी हो गए हैं, साहित्यिक और फ़िल्मी लिक्खाड़ भी हो गए हैं, इस दौरान वो कई बार प्रेमी भी बने होंगे, अब सामजिक ठेकेदार बन गए हैं, कई सरकारी गैर-सरकारी नियमों के अनुसार 'ओवरऐज'  हो गए हैं , पर शादी के लिये नहीं। पूछा  सर अब क्या करोगे ? बस यार नौकरी लग जाये शादी कर लेंगे !

मेरी दोस्त हमें जब प्रेम हुआ तब रोजगार नहीं था न ही रोजगार का हिसाब -किताब रखने वाला समाज। हमारे लिए शादी प्रेम के उत्सव का सामाजिक रूप है। दोनों के दिल में पल रहे शुभ और सुन्दर भावों की सामजिक अभिव्यक्ति थी। मेरी दोस्त हमारे लिए शादी प्रेम का बंधन नहीं। एक पल के वादे का सघनतम रूप है।  जीवन संघर्ष में एक कोमल एहसास है। नैराश्य में टिमटिमाती एक लौ है। दुनिया को सुन्दर बनाने का एक प्रयास है। एक साथ दुनिया को प्यार करने की सीख है।

आओ मेरी दोस्त शादी और जन्मदिन की ख़ुशी में कैंडल जलाएं.. रोशनी फैलाएं..!!

पता नहीं क्या सब कह गया। कहना भी चाहिए था या नहीं, पता नहीं। बस लिख दिया है। तस्वीर वही ‘बुक फेयर’ वाली लगाए दे रहा हूँ। इस बार तो तुम आते-आते रह गए। तारीख शायद दो साल पहले की है। अभी ढूंढा तो पता लगी तारीख़ है तीस दिसम्बर, दो हज़ार दस। उस दिन बरसात भी थी। ठंड तो थी ही। जैकेट पहन रखी है तुमने।

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