सितंबर 06, 2013

सीधे जंकयार्ड से

छब्बीस अगस्त छह बजकर ग्यारह मिनट, साल मालूम नहीं 

कभी-कभी सब कुछ इतना साफ़ दिखाई नहीं देता। तभी लिखने से बचता रहा हूँ। कि कहीं कह न दूँ के तुम्हारा मन हो तब भी मुझसे बात न करना। नहीं कर पाऊँगा। लेकिन लिख देता हूँ और सोचने लग जाता हूँ, अपने ऐसे होते जाने को। जो भी यहाँ तक पहुँचेंगे सब जानना चाहेंगे किसकी बात कर रहा हूँ। तो दोस्तों कह दूँ इधर लगता है सपने में जी रहा हूँ। ख़ुद नहीं कह सकता क्या असली है क्या नकली। बस दो बंद आँखें हैं और एक जोड़ी कान। जो है वह बस इसी के इर्दगिर्द बुन रहा हूँ।

इतना कहने के बाद भी किसी को यह अधिकार नहीं दे रहा हूँ, के मुझसे पूछे, क्या बात है। जो बात है बस है। आगे कुछ नहीं।

हम इतने ‘स्टीरियोटाइप’ जीते हैं कि इसे किसी वियोग की स्थिति से जनित मान अनुमानों की प्रत्याशाओं में अपने को ले जाएँगे। और गढ़ लेंगे, एक तस्वीर। जिसमें एक मैं हूँ और एक तुम हो। ‘घनानन्द’ इस मामले में क्लासिक हैं। उनके जैसे बनने का शौक़ न चर्राया है न हमारी तशरीफ़ में इतना दम ही है। इसलिए इस विचार को आगे नहीं ले जा रहे।

दो सितम्बर, पाँच बजकर इक्यावन मिनट, फिर साल पता नहीं

यहाँ एक पल ठहर ख़ुद अपनी तरफ़ देखता हूँ, तो सोचने लग जाता हूँ उन दिनों मैं कैसा होता रहा था। एक लड़की थी जिसके कारण मेरे एमए में कम नंबर आए थे। ख़ुद उसका अब कहीं नहीं होना अंदर से किसी भी तरह से हरारत से नहीं भरता। तब के दिनों में हम ‘किशोरवय’ क्रियाकलाप में वक़्त बिता रहे थे। दोस्तों की जमात टूट-फूट के दौर से गुज़र रही थी। उन साझेदारियों ने तब साथ छोड़ा जब उमर के उस पायदान पर हम सबकी एक अदद प्रेम कहानियों ने हमारे दिलों में बेलें उगाना शुरू कर दिया था।

बहरहाल। हमारे लिए एक ही गम था, मोहब्बत। और एक ही राहत थी, वस्ल की राहत। मोहब्बत सिर्फ़ लड़की से नहीं थी अपनी पढ़ाई से भी थी। थोड़ा ‘करियरिस्ट’ होकर न भी सोचूँ तब भी लगता था हम इतने भी लदधड़ नहीं थे जो डेढ़ पेरसेंट से चूक गए। लड़की तो चलो ख़ैर सगाई के बाद अपने घर चली ही जाएगी। पर आज तक हम वहीं के वहीं रह गए। ढाक के तीन पात। किसी नतीजे के इंतज़ार में। ढपोरशंख।

इस फालतू सी लगती फुटेज खाने का मन इसलिए भी कर रहा है क्योंकि इस बैक्ग्राउण्ड सिचुएशन में मैं ख़ुद को ‘सिचुएट’ कर रहा हूँ। के आगे संदर्भों का संदर्भ समझने में दिक्कत न हो। वैसे भी आलतू फ़ालतू कामों में इधर मन सा लागने लगा है।

तो एक शाम कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर अपने दिल पर बीतती अकेले इंतज़ार करती इस कहानी के बाद जिस तरह से उसने  मुझे उबारा। जिसने ख़ूब ख़ूब सपने देखे। उनके लिए वह रात रात जागा।

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