सितंबर 08, 2013

सुबह की धीमी सी कमज़ोर सी शुरवात..

इतवार। सुबह के आठ बज रहे हैं। अभी नहाया नहीं हूँ। बस उठे एक घंटे से कुछ जायदा हो गए हैं। पता नहीं क्यों यह दिन और दिनों से काफ़ी बड़ा लगता रहा है। जबसे सुबह होती है पता नहीं क्या-क्या करने के इरादे बनते बिगड़ते रहते हैं। शाम ढलते उनमे से कितनों को किनारे कर पाता हूँ, वह अलग बात है। पर करने से पहले सोचना पहली सीढ़ी है। तो इस सीढ़ी पर चढ़ते ही लगा दिमाग भिड़ाने। पर रुक गया। दिमाग ठीक से काम नहीं कर पा रहा। थोड़ी देर रुक देख लेना चाहता हूँ क्या गड़बड़ है।

गड़बड़ आज की गरम सुबह में है जो इसे ठंडा नहीं रहने दे रही। कल शाम भी इसी तरह परेशान करती रही। हवा पेड़ों के ऊपर से भी नहीं गुज़री। आसमान में बादल रुके-रुके ताकते रहे। कि अब तो हम भी चल पड़ें। पर नहीं। वहाँ कोई डोर नहीं थी जो उन्हे कहीं खींचे ले जाये।

अभी बीते परसो फ़िर एक दोस्त ने कहा दिल्ली का दाना-पानी दिसम्बर तक। उसके बाद अपने घर। वापस। थोड़ा और अकेला होते जाने में ठहरा सा मैं कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हूँ। बस थोड़ा उन दिनों को याद कर लूँगा जब साथ बैठे बातों के बाद जाने का वक़्त होता था। कभी किसी किताब पर रुके से अज्ञेय और मुक्तिबोध पर बघारते। ‘शेखर: एक जीवनी’ की कितनी ही बार तुमने बात कही। पचौरी की भाषा जितनी उलझी सी है उससे कहीं अधिक उनके विचार हैं। घबराओ मत तुम्हारा नाम नहीं लिखने वाला। बस उन मुलाकातों की किश्त पर कभी लिखने की भूमिका ज़रूर बना रहा हूँ। और लिखा भी तो ‘एफ़बी इनबॉक्स’ में शेयर करूंगा। ‘वॉल’ पर नहीं।

पता नहीं हर प्रवासी के लिए अपने मूलस्थान को छोड़ कहीं भी जाना, सपनों की जगह पर पहुँच जाने जैसा ही लगता होगा। कि यहाँ के दिन कुछ अलग हैं। कुछ है जो इंतज़ार कर रहा है। हम भी हो-न-हो एक दिन वहाँ पहुँच ही जाएंगे। तब उस पेड़ की छाव में धूप से बचते डीटीसी की बस का इंतज़ार खलेगा नहीं। यहाँ हर छह महीने में कमरे का किराया निकल आया करेगा। अब सब्जी दोनों वक़्त बना ली जाएगी। दाल भी अब बन ही जाया करेगी। फ़िर इस मकान को छोड़ देंगे। पानी नहीं आता। मकान मालिक जादा चिकचिक करता है। दो दोस्त रात क्या रुक जाएँ तो आफ़त। अब और नहीं।

पर सब ठहर जाएंगे। रुक जाएंगे। इन सबको देखने वाली आँखें यहाँ से जा रही हैं।

बराबर यही सोचे जा रहा हूँ के इस तरह क्या एक एककर सभी जाते जाएंगे। उनके सपने क्या इतने कमज़ोर थे या इस शहर में उन्हे पूरा करने का दम नहीं था। जैसे ही वह अपने घर पहुँचेंगे, उन्हे घेर लेंगे यहाँ बिताए दिन। उनमे फ़िर से जान भरने की उमर अब थोड़ी पीछे जाकर थम नहीं जाएगी। वह रुक भी जाएँ तब भी नहीं। शायद उनकी भी कोई उमर होती होगी। या कि वह हम ही होते हैं जो दिन-पर-दिन बड़े होते जाते हैं और हमारे हिस्से की मोहलत कम होती जाती है।

इन सबके बीच एक मैं हूँ जो लगातार उनके यहाँ से जाने को बस देखता रहा हूँ। आज मैं कहाँ खड़ा हूँ। एक अदद नौकरी के इंतज़ार में। इस जगह आती जाती खुराफ़ातों को उतारते। क्या कर रहा हूँ कभी समझ नहीं पाता। जैसे कल दोपहर सोचता रहा के क्या करूँ कि वक़्त उड़ जाये। कहीं किसी काम में मन सा नहीं लग रहा था। एक पल लेटता लगता दूसरे क्षण उठ बैठता। डायरी भी रोक नहीं पायी। एक डेढ़ लाइन लिखने के बाद कमरे से बाहर निकाल गया। लाइट थी नहीं। पंखा चल नहीं रहा था। सोचा ‘लैपटॉप’ में जितनी बैटरी है उससे एक फिल्म तो खत्म हो ही जाएगी। पर दस मिनट बाद ‘वीएलसी प्लेयर’ ने साथ छोड़ दिया। मतलब पूरी शाम का कबाड़ा। ज़ुबिन मेहता वहाँ शालीमार बाग में ‘कश्मीर कंसर्ट’ कर रहे हैं और हम यहाँ बैठे बस बैठे ही हैं। कुछ कर नहीं रहे हैं।

पर अभी तो पूरा दिन है कई कई बातें सोच रखी हैं। कई सारी पोस्टों को एक साथ लिखने का मन है। उस डायरी के बाकी बारह पन्नों को एक दम से भर डालूँगा। थोड़ा सो भी जाऊँ तब भी शाम एक और जगह टहलकर आ सकता हूँ। नहीं चाहता कि इस दिन का स्वाद भी ‘न्यूट्रालाइट’ के मक्खन की तरह हो जाये। अभी भी बहुत कुछ है जो दोपहर में लिखने के लिए बचा लिया है। अभी जा रहा हूँ कपड़े धोने। साबुन लगाए काफी देर हो गयी। पता नहीं चला न। कब बीच में उठकर चला गया था। यही है मेरे हिस्से का जादू।

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