अक्तूबर 01, 2013

जो विज्ञापन बेच रहे हैं: जो विज्ञापन देख रहे हैं

हमारे घर में मिट्टी का घड़ा इसलिए नहीं है के हम अतीतजीवी हैं और हमने घर में जगह न होने को बहाने की तरह ओढ़ लिया है। यह विशुद्ध हमारे चयन और इच्छा का निजी मामला है। इसमे किसी भी तरह के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे। फ़िर ऐसा भी नहीं है कि हम जहाँ भी जाते हैं घड़े का पानी ही पीते हैं और जहाँ इसका पानी नहीं होता वहाँ से प्यासे ही चल देते हैं। पर इधर ‘हार्पिक’ वाले टीवी पर समझाते फ़िर रहे हैं कि घड़ा पुराने होने की निशानी है और जैसे शौचालय धोने के तरीके नए आधुनिक हो गए हैं इसी तर्ज़ पर हमें इसका त्याग कर देना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि वे अब फ़्रिज बनाने लगे हैं और अभी किस बड़ी कंपनी का अधिग्रहण करने की सोच रहे हैं। न ही किसी रूप में महिलाओं के जिम्मे ‘लैट्रिन’ धोने के एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं। वह उन्ही रूढ भूमिकाओं को पोषित कर रहे हैं जहाँ सफ़ाई का जिम्मा स्त्रियों के अधिकार क्षेत्र में बना हुआ है।

उनके अभी तक के विज्ञापनों में पुरुष के जिम्मे यह काम नहीं आया है। पर उलटबाँसी में हमसे कह गए घड़ा अब ‘ओल्ड फ़ैशन’ है जितना जल्दी हो सके इसे छोड़ हो। मतलब ‘लैट्रिन’ तो नयी ‘लेटेस्ट टेक्निक’ से धो रहे हैं पर पानी अभी भी उसी कुम्हार के हाथों से बने घड़े से पी रहे हैं। यह बात उन्हे जँचती नहीं है। उन्हे यह ‘विरूद्धों का सामंजस्य’ जैसा कुछ लग रहा होगा। जिसमे संगति नहीं है। मामला गड़बड़ है। तारतम्यता नहीं है। पर हम अपना घड़ा बाहर फेंकने नहीं जा रहे। बस ठंड वाले दिनों में उसे सहेज कर रख लेंगे। उनके कहे चलते तो कबके क्या के क्या हुए जाते। खुद समझ नहीं पाते।  

ऐसे ही इस मौसम में एक विज्ञापन अक्सर हवा में तैरता दिख जाता है। एक पत्नी अपने नेता पति के व्यस्त हो जाने वाले दिनों से पहले सुबह-सुबह उसके लिए चाय बना रही है। और कहती जा रही है के अब तो आप बहुत बिज़ी रहेंगे मंत्री जी। पर हम औरतों को भूल मत जाइएगा। हम आबादी का उनचास प्रतिशत है। महिलाओं के वोट किसी को बन भी सकते हैं तो किसी को गिरा भी सकते हैं। यह 'ध्यानाकर्षण प्रस्ताव' सतह पर तो एक अर्थ में यह ‘टाटा टी’ के इस सिरीज़ के पुराने विज्ञापनों की अगली कड़ी में जगाने जैसा ही लगता है। पर इसकी कई ध्वनियाँ और भी हैं।

दिक्कत इसमे यह है के यह देश की चाय बेचते-बेचते यहाँ के नागरिकों का अवमूल्यन सिर्फ़ एक वोट में कर देता है। एक वोट भर की हैसियत के आगे कुछ नहीं। यह इस विज्ञापन को समस्याग्रस्त नहीं बना रहा है बल्कि उन्ही पूंजीवादी व्यवस्थाओं के पोषक की तरफ़ डटा खड़ा हो गया है। कि जनता को सिर्फ़ और सिर्फ़ मतदान तक सीमित कर उसे उसके सभी अधिकारों से अपदस्थ कर अपने मन मुताबिक व्यवस्थाओं को संचालित करते रहने में उन्हे कोई परेशानी नहीं आएगी। यह पूँजी का अपना शिकंजा है जिसे लोकतन्त्र का केवल खोखला ढाँचा भर चाहिए। वह जनता के अविश्वास, सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति निराशा और  राजनीति के प्रति वितृष्णा से उपजी ऊब को सिर्फ़ वोट में तब्दील कर लेना चाहती है।

यह ऐसे अन गिन सपनों के साथ लगातार आते ही रहते हैं। इस वाले को बहुत पहले लिख लेना चाहता था। पर देर आए दुरुस्त आए। इसमें रेगिस्तान है। थोड़ी हरियाली है। बीच में सड़क है। सड़क पर जीप भागी जारही थी कि राज्य सरकार की यह गाड़ी रुक जाती है। एक महिला, जिसे वह ‘ड्राइवर’, ‘मैडम’ बोल रहा है, बता रहा है कि वह सिर पर मटकी रखे औरतें पानी लेने जा रही हैं। दिखाई साफ़-साफ़ दे रहा है और उसका ऐसे बताना कुछ खटकता भी है। पर ख़ैर। अगला दृश्य उस ड्राइवर को बड़े बाबू के रूप में स्थापित करता है और वह मास्टरनी जोधपुर, खेजरली के ‘राजकीय बालिका विद्यालय’ के बोर्ड को देखती हुई पूछती हैं लड़कियाँ कहाँ हैं। दर्शक थोड़ी देर शाहरुख़ की ‘स्वदेश’ याद कर ले इसका भी अवकाश नहीं। बड़े बाबू फ़िर वही ‘स्क्रिपटेड डायलॉग’ मारते हैं। लड़कियाँ कहाँ मैडम उन्हे तो पानी लेने के लिए दो-तीन कोस जाना पड़ता है। पर अगले सीन में ‘स्वदेश’ होने का भ्रम भी टूट जाता है और वह मास्टरनी अपने ‘वीज़ा’ डैबिट कार्ड का उपयोग कर कहती हैं वह दूर की चीज़ें पास ला रही हैं। और पीछे बजते ‘बैक्ग्राउण्ड स्कोर’ में एक स्त्री स्वर उभरता गाता है पढ़ लिख जाएगी तो सखी खाली कुआँ भर जाएगा।
 
यह होगा कैसे से पहले जो सवाल की तरह दिमाग में कूदने लगता है वह यह कि एक इज़ारेदार कंपनी की जो संगति यहाँ दिख रही है उसे क्या अपनी मौन स्वीकृति की तरह माने या कभी पूछ भी लिया करें। कि कहीं यह निजी का बढ़ता सार्वजनिक दायरा तो नहीं हैं। यहाँ निजी किसी भी स्तर पर सार्वजनिक व्यवस्था पर विश्वास नहीं कर रहा। यह उसका निजी फैसला है। फ़िर हमारे सरकारी अध्यापक इतने स्वतंत्र कब हुए। मालूम नहीं पड़ा।

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