अक्तूबर 10, 2013

बस थोड़ी देर वहीं थम सा जाना चाहता हूँ

नींद आ रही है पर लेटुंगा नहीं। क्योंकि पता है लेटने पर भी वह आने वाली नहीं है। इधर वह ऐसे ही परेशान करने लगी है। करवट-करवट बस उबासी आती है नींद नहीं। और फ़िर जब यादें खुली आँखों से आस पास तैर रही हों तो सोने की क्या ज़रूरत। ऐसे ही कल हम मनाली थे। माल रोड घूम रहे थे। नाप रहे थे। आज सुबह हमें रोहतांग के लिए निकलना था। तड़के। सुबह ठंड थी और कमरे के बाहर खिड़की की दूसरी तरफ़ खड़ी अंदर आने की कोशिश में थी। अंदर नहीं आई। वहीं खड़ी रही। बाहर। हमें चेक आउट करना है। मतलब वापस होटल नहीं लौटना। रोहतांग से आगे। नीचे उतरना है। पर अभी थोड़ा वक़्त है। नाश्ते के बाद निकलेंगे। जल्द। 

रोहतांग सबसे ऊँचा दर्रा। दुनिया की सबसे ऊँचाई पर चलती सड़क। मेग्नेटिक हिल। पैरा ग्लाइडिंग। यह सब तबतक दिमाग में नहीं घुसे थे। हम सबके लिए वह घूमने लायक जगह ही थी। वही बनी रही। बस थोड़ी दूर थी। कुछ घंटो बाद हम वहाँ होंगे और कुछ नहीं। नाश्ते में आलू के पराठो के साथ दही थी। सारा दिन बस में गुज़ारना है इसलिए भूख कम ही लगी।

हम वहाँ जा रहे थे जहाँ पहले कभी नहीं गए थे। उस ऊँचाई को छूने। उसके बीच से गुजरने। डर के पास से नहीं रोमांच के साथ। वहाँ पहाड़ से आती हवा में ठंडक उसी बर्फ़ की थी जो वहाँ पिछले मौसम गिरी होगी। हमारी त्वचा को छूती। अंदर तक सिहरन से भर देने वाला एहसास। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अब होने जा रहा था। उस पर गिरती रोशनी अपने रंग बिखेर हमें बुलाती सी रही। वहाँ बादलों के बीचों बीच परछाई से हम कहीं खो गए। पता नहीं हम मणि कितने बजे के लगभग पहुँचे। पर सूरज बिलकुल सिर से होते हुए थोड़ा नीचे खिसक चुका था। और हम इतनी ऊँचाई पर थे जहाँ भुट्टे को आसानी से उस सुर्ख़ रोशनी से टकराकर आते एहसास के साथ खा सकते थे। उस ऊँचाई को महसूस कर सकते थे।

वहीं एक मंदिर है। मंदिर में छोटे-छोटे बौद्ध भिक्षु बैठे हैं और 'जेके सीमेंट' वाले शायद किसी ऍड की शूटिंग कर रहे हैं। हमारे आने से थोड़ी देर के लिए वह रुक गए। कईयों के कैमरों से फोटो उतारे जाने लगे। बाद में एक दो तस्वीरों में कहीं-कहीं मैं भी बैठा देखा पाया गया। पर आज तक वह ऍड टीवी पर टेलिकास्ट हुआ हो ऐसा जान नहीं पड़ता। उसी मंदिर के पीछे जमीन नहीं है। जमीन काफ़ी नीचे है। उस खाई जैसे दिखने वाले दृश्य में ऊपर किसी पहाड़ से पैराशूट बांधे कई-कई जम्पर दिखाई दिये। पैरा-ग्लायडिंग की तरह। हम काफ़ी देर उनको तक देखते रहे। कैसे हवा के संग वह उड़ते रहे। उनके पंख नहीं हैं पर वह अभी हवा में हैं। हम वहाँ जाने वाले हैं हमें नहीं पता। क्या वहीं हमें भी जाना है। पता नहीं। हम भी कूदेंगे तो डर लगेगा कि नहीं। हवा कितनी देर तक संभाले रहेगी। पता नहीं ऐसा क्या-क्या उन क्षणों में अंदर तक समाता गया।

ऐसे ही कई सारे दृश्य कभी कभी गाहे-बगाहे आँखों के सामने से गुज़रते रहते हैं। एक में हम रोहतांग से नीचे उतर आए हैं। और सड़क की हालत भी काफ़ी दुरुस्त लग रही है। वहीं कोक्सर में हम दोपहर के खाने के लिए रुक गए हैं। एक नदी है। सड़क किनारे। एक सड़क है। नदी किनारे। ऐसे में वह दोनों एक दूसरे के किनारे-किनारे अगल-बगल हैं। बस खड़ी है। दूर-दूर तक कहीं कोई नहीं है। सिर्फ़ हम हैं। जहाँ तक नज़रें जाती हैं वापस लौट हम तक ही आती। उसके साथ कोई और नहीं आता। उस सामूहिक एकांत में हम अपने अपने हिस्से ढूँढ रहे थे। उन्हे इतनी-इतनी बार देख लेना चाहते थे के आसानी से उन्हे पहचान सकें। यह पहचान अगली बार लौटने पर काम आएगी। शायद हम सब ऐसा ही सोच बिन बोले वहाँ रुक से गए। इसे ठिठकना नहीं कहेंगे। यह ठहरना है। उन स्मृति कोशों को भर लेना है जो खाली रह गए हैं। इन जगहों से। इनकी बुनावट बनावटों से। वहाँ थोड़ी देर बैठ इनसे बातें कर लेने जैसा। कुछ उनकी सुन लेने जैसा।

वहीं पहाड़ के बीच में बची रह गयी जगह पर एक चाय की दुकान है। हम पीछे रह गयी इनोवा के इंतज़ार में बड़ी देर से बैठे हैं। मैगी के कटोरे आगे घूम रहे हैं। चाय के कप एक हाथ से दूसरे हाथ में जा रहे हैं। हम ऐसी जगह हैं जहाँ फ़िर कब होंगे किसी को नहीं पता। उन बीतते क्षणों में आज भी हम अटके से हैं। वहीं कहीं बैठे मज़ाक में अपने किस्से को ढूँढते से। मुस्कुराहटें एक दूसरे के होंठों से गुजरती हमारे गालों तक भी आई होंगी। हम भी थोड़े शरमाये होंगे। थोड़े खिलखिलाए होंगे। थोड़े खीज कर वहीं धँसते जा रहे होंगे। पर बात कहीं अटकी नहीं होगी। वह चलती रही है। चलती रहेगी।

आगे बस थोड़ी देर वहीं थम सा जाना चाहता हूँ। थोड़ा वहीं एक बार फ़िर अपने को छू आना चाहता हूँ।

पीछे के पन्ने:  मनाली की पहली रात कुछ देर से हुई थोड़ा रुक कर आई / रोहतांग-केलोंग-बारलाचा ला से वापस /
                    सपनों की डाड़ के सहारे कुछ देर सुस्ताते मील के पत्थर

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