अक्तूबर 11, 2013

उस रात हम कहीं खो गए थे

धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ रहा है। ठंड भी नीचे उतर आई है। सूरज ढले कई पहर बीत गए हो जैसे। या ऐसी कोई चीज़ उस जगह ने कभी देखी ही नहीं है। पता नहीं यह क्या था। बस अँधेरे की तरह दिख रहा है। हमें जल्द ही वहाँ से चल पड़ना होगा। ताकि आगे कोई होटल मिल सके। पर दिक्कत है अभी तक पीछे छूटी रह गयी ‘इनोवा’। उसकी कोई खोज खबर नहीं। आखिरी बात हुए चार घंटे होने जा रहे थे और अभी तक वह हमसे मिल नहीं पाये। इधर एक एककर मोबाइल बैटरी भी ‘डिस्चार्ज़’ होती जा रही थीं। बिलकुल हमारी तरह। ठंड में वैसे ही उनकी ‘लाइफ’ कम रहती है। बार-बार आते-जाते सिग्नल पकड़ने में जादा ख़त्म हो रही है। हमें आगे केयलोंग तक जाना है। स्पीति घाटी।

रास्ता अँधेरे में इतना आसान नहीं होता। इसलिए थोड़ी ही देर में यह तय कर लेना था के आगे चल पड़ें या यहाँ और कितनी देर रुके रहेंगे। ठंड बढ़ चुकी थी। हम सब बस में बैठे इंतज़ार कर रहे हैं। इस इंतज़ार ने जैसे धीरे-धीरे हमारे सारे दृश्यों को अँधेरे में छिपा लिया। शायद उसने ऐसा करके अच्छा ही किया। जो हमारी याद में जैसा रह गया उसने उसे वैसे ही रहने दिया। बिन छेड़े हम दीवान को भरते रहे। हमारी बस अभी भी सड़क किनारे खड़ी है। सड़क अभी भी खाली है। न कोई आ रहा है। न कोई जा रहा है। नदी भी अभी बह रही है। उसमे पड़े पत्थरों से टकराते पानी की आवाज़ भी लगातार आ रही है। यह शाम हमारे सामने बदली। हम तब से वहीं हैं। यह डर नहीं है पर ऐसा ही कुछ है। यह उस वक़्त आहिस्ते से हमारी बस में भी था। हम सब शांत हैं। बात हो भी रही है पर धीरे-धीरे। आहिस्ते से। हम बस अब चल लेना चाहते हैं। यह रुके रहना अब जच नहीं रहा। यह ऊब के आसपास घिरता सा है। ऊर्जा का स्तर भी अब सुबह वाला नहीं रह गया। चुपके से थके धीरे धीरे हम छोटी-छोटी नींदों में चले गए। नींद सारे दिन को तरतीब से लगा लेगी।

उस घुप्प अँधेरे में सब और रुके रहना नहीं चाहते। जितनी जल्दी हो सके यहाँ से चल पड़ें। पर कब। पता नहीं। कहीं दूर से एक रौशनी हमारी तरफ़ आती दिखती। वह हमारी तरफ़ आती जाती। लगता वह हम तक आकार रुक गयी है। पर नहीं। पता नहीं हमारी गाड़ी कहाँ से चली है। कहाँ मिलेगी। यह हम सबका इस किस्म का पहला इंतज़ार बन रहा था। हर रोशनी हम तक आती लगती। पर आती नहीं। काफ़ी देर बाद किसी कार के हॉर्न से हम जागे। इस दरमियान जो आठ दस संगी नीचे खड़े इस इंतज़ार को कम करने की गरज से खड़े थे अब भारी पैरों से ऊपर चढ़ रहे हैं। आते ही आकर अपनी सीटों पर धँस गए। पता नहीं उनका इंतज़ार हमारे इंतज़ार से कैसे अलग था।

थोड़ी देर बाद बस घरघरा कर चल पड़ी। केयलोंग। जादा दूर नहीं है। यही हम सब भी सोच रहे हैं। पर उस आँख में चुभती हैडलाइट में रास्ता ढूँढने का मन नहीं है। मन कहीं रुक गया है। कहीं पीछे बीते दो दिनों में। उन शामों में। उनकी जमा हो गयी यादों में। इनोवा आगे-आगे थी। हम पीछे-पीछे थे। जेस्पा में कभी ठहरे होटल की ख़ोज जारी है। वह कहीं खिसक गया है। पता नहीं। पर वह मिल नहीं रहा है। जहाँ उसे होना था वहाँ नहीं है। पता नहीं कहाँ है। बस सड़क है। रोशनी है। चुप्पी है। और तीस सिटर बस है। हम आकुल व्याकुल नहीं हो रहे हैं। ऐसा होने के लिए जितनी जानकारी होनी चाहिए वह हमारे पास उस अनुपात में नहीं है। हम बस बैठे रह सकते हैं। बस बैठे हुए हैं। बार-बार घड़ी देखने से तो वहाँ पहुँचने से रहे। इसलिए एक सीमा पर वह भी देखना बंद। हमें एहसास नहीं था के हम खो गए हैं। अँधेरे में गुम हो गए हैं। सड़क जैसे जिधर मुड़ रही है उसी दिशा में हम भी लगातार होते जा रहे हैं। उस अंतहीन सफ़र वाली सड़क पर भागते जा रहे हैं।

थोड़ी देर बाद लगा हमारी दिशा बदल गयी है। अब हम उल्टी तरफ़ भागे जा रहे हैं। मतलब जिस तरफ़ नहीं जाना था उस तरफ़ काफ़ी आगे तक आ गए थे। अब लौट रहे हैं। इस पर हमें खीजना नहीं था। हम नहीं खीजे। बस बैठे रहे। बैठे रहे। सड़क के किनारे रिहाइश थी नहीं। वह थीं भी तो बहुत छोटी-छोटी। जहाँ भी कहीं बल्ब जलते दिखते हम और सुस्त हो जाते। कि चलो अब पहुँच गए। यह पहुँचना कई घंटों से स्थगित सा था। हम सब कहीं भी पहुँचना चाहते थे। पर पहुँच नहीं पा रहे थे। बीच में कहीं फँसे से रह गए हैं। वह स्थिति कैसी होगी जब हम कह सकेंगे हम पहुँच गए। किसी को नहीं पता। ऐसे में धीरे-धीरे थकान अब नींद में नहीं ‘होम सिकनेस’ में बदलती रही।

यह कल की रात है। दस अक्टूबर। दो हज़ार नौ। स्पीति घाटी, होटल ‘ताशी-द-लेक’ पहुँचने से पहले। अभी अगली सुबह आएगी। हम बारालाचा ला छूकर आएंगे।

पिछली रातें: मनाली की पहली रात कुछ देर से हुई थोड़ा रुक कर आई/ बस थोड़ी देर वहीं थम सा जाना चाहता हूँ/                              रोहतांग-केलोंग-बारलाचा ला से वापस/ सपनों की डाड़ के सहारे कुछ देर सुस्ताते मील के पत्थर

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