अक्तूबर 16, 2013

अकेलापन कहीं बाहर नहीं था अंदर था

पता नहीं आलोक मेरे अंदर किस अकेलेपन की बात कर रहा है। उसने इसे कैसे मेरे अंदर देखा होगा। क्या ख़ाका उसके दिमाग में घूम रहा है। किन बिन्दुओं पर ठहर गया होगा। फ़ोन पर पूछा भी तो कहा यहाँ नहीं। कभी लिखुंगा। पीछे कहीं पढ़ रहा था शहर और ऊब पर। ऊबते शहर में ऊबते हम। यह पता नहीं कैसा है। सोचने लगा उन्हे कैसे पता यह शहरी निर्मिति है। इसके बिना शहर का कोई अस्तित्व हो नहीं सकता। यह ऊब के बिना रह नहीं सकता। इस तरह यह सह-उत्पाद नहीं यहाँ रहने की कीमत है। फ़िर मन में आया के देखता चलूँ अपना शहर कैसे बना है। उसमें ख़ुद कहाँ स्थित हूँ। हूँ भी या यह ऐसे ही कोई काल्पनिक मनःस्थिति है। है भी या नहीं।

दिल्ली। अपना शहर। बचपन से लेकर आज तक। बीच में बहुत से साल हैं। कई-कई बोरे भर-भर यादें हैं। यहाँ ढलती शामें उदास रातें और कितने तरह के किस्से। पहले कहीं लिखा था शहर कहीं बाहर नहीं हमारे अंदर होता है। धड़कनों के साथ धड़कता। दिल के पास। मुलायम एहसासों के साथ। वहाँ कुछ देर बैठना थकाता नहीं। ऊर्जा से भर देता है। यादों के दरीचे खोल देता है। याद वही है जो रह जाए। और रहते अच्छे दिन हैं। रहती उनकी गंध है। उनमे हम हैं। हमारी बातें हैं। यादें हैं।

अगर यह शहर मुझे अकेला कर रहा है बराबर तोड़ रहा है। उसमें कहीं कुछ भी मिलता-जुड़ता नहीं दिख रहा तो यह अंदर से बाहर और बाहर से अंदर घटित होती उन सारी प्रक्रियाओं को एक-एककर एक साथ देखने का आग्रह साथ लिए है जो साफ़-साफ़ सतह पर नहीं हैं। कहीं छिपी हुई हैं। उनकी तरफ़ अब जाना होगा। देखना होगा। बारीक निगाह से। आहिस्ते से।

ऐसे में अगर फ़िर पीछे मुड़कर देखूँ जहाँ आलोक मुझसे पहली बार मिला वह कोई चार साल पहले का अनाम भूला हुआ सा दिन है। उसकी कोई याद कहीं भी लिखी नहीं गयी। उसे बस ऐसे ही रहने दिया। अनलिखी तारीख़ की तरह। यही वह समय है जब राकेश से भी पहले पहल मुलाक़ात हुई। हम सब एक ही कोर्स में साथ थे। वह बाद में मेरे अकेलेपन से निकल आने का साल बना। ‘पोस्ट रोमेंटिक ट्रॉमा’ से बाहर आने का साल। इस पर तो न-मालुम कितने-कितने पन्ने भर-भर दिये। इसे याद करने का मन भी नहीं करता। लिखने का मन नहीं होता। इसलिए नहीं। कुछ नहीं।

इस विषयांतर प्रसंग से वापस अपने शहर पर लौटूँ तो पता नहीं इस शहर को लेकर तब कैसा सोचता रहा था। ठीक-ठीक याद नहीं। कि कभी ऐसे सोचा भी है या क्या। वह कैसे और कितना मेरे अंदर धड़कता रहा था इसे कभी ऐसे नहीं देखा।

पता नहीं वह कैसे अजनबी से भाव रहे होंगे जब अकेले घूमना अकेले नहीं लगता था। कोई साथ न हो फ़िर भी नहीं। कॉलेज से मेट्रो स्टेशन इतनी दूर तो था ही कि उसे सामान्य अर्थों में पैदल दूरी नहीं कहा जा सकता। पर फ़िर भी मौका लगे गाहे बगाहे कई एकल पदयात्राएं होती रही थीं। अकेले रहना अकेले रहना नहीं था। वह मुझे पूरा कर रहा था। मुझे, मेरे जितना, समझने के लिए, किसी को भी उस सब बातों से गुजरना पड़ता जिन सबसे गुज़रकर मैं वहाँ पहुँचा था। इतने भागते दौड़ते शहर में इतना एकांत और अवसर किसी के पास नहीं होता। किसे क्या गरज़ पड़ी है के उन बने बनाए ढर्रों से बाहर निकल मेरे ऐसे होने को समझे। यह शायद मैंने ख़ुद को समझा लिया था। इसीलिए किसी से किसी प्रकार की अपेक्षा रखने का कोई मतलब नहीं था। ख़ुद समझदार हो गया था। हो रहा था। 

ऐसे दिखने में भले अकेला एकांत में रहने वाला बना रहा पर ऐसा था नहीं। यह सतह पर था। भीतर कतई नहीं। दोस्त मुझे भी अच्छे लगते हैं। उनके साथ वक़्त बिताना किसी जगह पर घूमने से जादा पसंद है। बातें मैं भी कर सकता हूँ। बातों से निकलती बात अमलतास का पेड़ हो सकती हैं। हम घंटों बहस में उलझे रह सकते हैं। घड़ी वहीं रुकी रह सकती है। जो इस दरमियान पास आए वह अभी भी साथ हैं। मुलाकातें हैं। रंज-ओ-गम हैं। गिले हैं। शिकवे हैं। कई-कई बातें अभी भी अन चुकी किश्तों की तरह बकाया हैं। भले सालों उनसे बात न हो पर कई कोने उनके लिए भी बचाए रखे हैं।

ऐसे में इस शहर को देखता हूँ। वह याद नहीं आता। यह अकेलापन जितना इस शहर का बनाया दिखता रहा वह थियरी यहाँ आकार फ़ेल हो जाती है। उसके खाँचे में फ़िट नहीं बैठता। यह शहर के स्थगित होते जाने के साल थे। उसे बिन बताए गुज़र जाने के साल। उस संत्रास ऊब अकेलेपन को मैंने अपने लिए गढ़ा। अपने लिए ख़ुद में अपनी जगह बनाई। किसी और को दाख़िल नहीं होने दिया। कोशिशें थीं। फ़िर भी नहीं। उस अकेलेपन में जैसे मज़ा आता रहा। बहोत बेकार से सालों के बाद ऐसा वक़्त आया जब उस खोल से बाहर आने के इतने सारे मौके एक साथ आए। उन दरीचों से पहली बार साँस लेने बाहर निकला। लगा दम नहीं घुट रहा। तब से बाहर बने रहने की कोशिश में हूँ।

पता नहीं और कितनी ही साथ-साथ घूमने लगी हैं पर सोचता हूँ कुछ तुम्हारे लिए भी छोड़ दूँ। वरना कहोगे  गैर जमानती वारंट से बचने के लिए पहले ही ‘हलफ़नामा’ दायर किए दे रहा हूँ। इंतज़ार में हूँ कब तुम लिखते हो। भूल मत जाना।

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