अक्तूबर 20, 2013

रातरानी सिंगाड़े खिड़की और स्वाद के बीच बचपन की याद

इधर मौसम ठंडा हुआ है। खिड़की से आती हवा अपने साथ उसकी गंध भी लेते आई है। वह दिखने में किसी भी रंग की हो पर महसूस हो रही है। शामें सुबह की तरह सर्द हैं। पीछे रिज से होते हुए वह सबसे पहले हम तक पहुँच जाती है। सूरज भी थोड़ा सुस्त सा नज़र आता है। शाम उस कुर्सी पर बैठते अब पैर ठंडे हो जाते हैं। बानियान से काम नहीं चलता। शर्ट पहनने लगा हूँ। हरारत सुर्ख़ नहीं है न फिरोज़ी है। वह बस है। मौसम के साथ दोपहर की नींद भी देह तोड़ती है। यह धीर शांत जैसी अवस्था नहीं कुछ और है। यह समाधि भी नहीं है। पर रोज़ सोने का मन होता है। सो जाता हूँ।

शाम पानी भरते अँधेरा छाने लगा है। और उसके साथ पेड़ के नीचे लगे नल से आते पानी का रंग दिखाई देना बंद होता गया है। वहाँ कोई बल्ब नहीं है। बस हल्की-सी रोशनी में सब देख लेना है। आवाज़ से पता चलता रहा है कितना भर गया। सावनी के फूल कई दिन बीते यहाँ से चले गए। मेट्रो स्टेशन के पास बचे हैं कुछ। यहाँ अगले साल आएंगे। अब रातरानी की बारी है। उस शाम लवकेश दरीबे की उस इत्र वाली दुकान पर बोला इसे ही ‘पारिजात’ कहते हैं। हम बचपन से रातरानी कहते आए हैं।

डीटीइए स्कूल की चारदीवारी के बगल से गुज़रते इसी रातरानी की ख़ुशबू खींचे ले जाती है। यह भीनी-भीनी गंध गंध न रहकर बचपन में तब्दील होती गयी। जब भी पास से गुज़रते इसे भूले रहते। वह बार बार बताती वह यहीं कहीं है। बस छिपी रही है। उसे रोज़ ऐसे ही खोजते-खोजते उस तक पहुँचते रहे। कभी नहीं जाता तो बुलाती है। उसकी याद। उसकी गंध। 

वीसीपी की कविता है शायद। बचपन सबसे तेज़ गति से उड़ जाने वाली तितली है। उसी को पकड़े रहने की ज़िद बैठने नहीं देती। भागे-भागे रहते हैं। बेचैनी बेचैन करे रहती है। और कुछ नहीं तो थोड़ा खिड़की पार उतर आने का मन होता है। पर उतर नहीं पाता। वहीं बैठे-बैठे इस खिड़की के छिन जाने की बात पर उदास होता रहा हूँ। कुछ भी करके वापस नहीं जा सकते हम सब। वहीं अटकी-सी शामें ठंडी होती जाएंगी। फ़िर ऐसे ही हरबार। के अब वैसे ही दृश्य अब कहीं नहीं हैं। किसी किताब में भी नहीं। 

इधर मौसम की पहचान अब बदली है। वह हमारे बचपन की छवियों की तरह अनबदला नहीं रह पाया। तेज़ी से भाग हमसे भी बड़ा हो गया। कभी-कभी उन रामलीलाओं की याद आती जाती हैं। वह हमारा मौसम थीं। सामने मदर डेरी वाले पार्क में सड़कपार कोई रामलीला कमेटी हारमोनियम पर ताबड़तोड़ उँगलियों से निकली बेतरतीब आवाज़ों से अपने शुरू हो जाने की ख़बर हम तक पहुंचाती। तब हम घरों से निकल छोटे-छोटे से शालों में ख़ुद को लपेटे उन सीत गिराती रातों में वहीं बैठे गरम-गरम मूँगफलियाँ खाते। उन छिलकों से अपने आसपास को भर देते। तब इसे कोई कूड़ा कह डाँटता नहीं था। कभी भुट्टे पर तीखे मसाले के बाद सीसी करते उसे खाने को कोशिश अब कितने ही साल हो गए इस मौसम में नहीं हुई। न अब वह ठंड कभी मिली न वैसा स्वाद ही कभी जीभ से उतरता दिल तक गया। उतरते तो हम गए हैं। अपने बचपन की सीढ़ियाँ। 

अभी दो दिन बाद करवाचौथ है। हमारे घर में यह सिंगाड़े आने की ख़बर की तरह ही आता। तब इतने नारीवादी कहाने वाले विचारों से दूर-दूर तक कोई भेंट मुलाक़ात न थी। हमारे लिए यह कोई ऐसा दिन था जब चाँद जानबूझकर देर करता। हरबार अख़बार में लिखे वक़्त पर आने से रहा। पर अब पता नहीं कैसे सारे स्वाद वह नहीं रहे। सिंगाड़े का स्वाद भी बदल गया। खीरे में ककड़ी उतर आई हो जैसे। उसे खाने का मन पीछे की तरफ़ लगाई एक छलांग की तरह ही अब बचा है। थोड़े उन दिनों की याद में खोये से पल इस निर्मम हो गयी दुनिया में हमारे हिस्से की सबसे कोमलतम स्मृतियों के बचे रहने की तरह है। भले हम वह नहीं रह गए। पर उन्हे वैसा ही रहने देने की कोशिश इस तरफ़ लाती रही है।

पता है वहीं कहीं फँसे रहना इस वर्तमान को ठीक से जीने नहीं देगा। पर नमालुम इन दिनों की तरफ़ खिंचा चला गया। लगातार। बेपरवाह। बेतहाशा। शायद अपने को वहीं बचाए रखा है। इस टूटफूट से लगातार जूझता अभी भी कभी-कभी वहीं पहुँच जाता हूँ। तब इन दिनों से भी ठंडी सुबहों को जल्दी उठ पार्क में गिरे रातरानी के फूलों को बटोर लेने की हसरत से भरे होते थे। उन्हे हाथों में भर सूँघते। और रात की ख़ुशबू से मिलाते। शायद पता लगाते किस फूल की गंध कल हमारे आसपास घूम रही होगी। वही हसरत उस पेड़ के जाने के साथ हमारे अंदर से कहीं चली गयी। उसी के वापस आने के इंतज़ार में इस खिसक गयी ठंड को कोस रहा हूँ।

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