अक्तूबर 22, 2013

बुख़ार में इससे ख़राब और नहीं लिख सकता..

जबसे पिछली पोस्ट लिखी है नींद गायब है। उसका ऐसे गायब हो जाना समझ नहीं आ रहा। कहाँ चली गयी। पता नहीं। वह पास नहीं है। ये पता है। रात करीब साढ़े दस हो रहे होंगे जब लैपटॉप बंद किया। ऊपर आया। सीढ़ियों पर अँधेरा था। रोज़ की तरह। उन पर चप्पलों की आवाज़ आ रही थीं। रोज़ की तरह। अब उस चारदीवारी वाले कमरे में बस चादर झाड़ लेट जाना था। और सुबह उठ जाना था।

पर जिसका होना सबसे ज़रूरी था वही गायब। नदारद। 

इधर दिल भी मन की तरह होता गया है। मनमौजी। आउट ऑफ़ ऑर्डर। पॉइंट ऑफ़ स्टेट से बाहर। बेतरह। लगातार। सीढ़ियों पर चप्पल की आवाज़ अब दिमाग में बज रही थी। अभी भी वह कुछ कम नहीं हुई है। 

क्या सोच रहा हूँ। ठीक-ठीक पता नहीं। शायद कहीं अटक गया। किसी दिन किसी बीती शाम के पास। जब छुटपन के दिन रहे होंगे। सोचता रहा जैसा अभी लिख डाला है वैसा बिलकुल भी नहीं लिखना चाहता था। अभी पापा ने छुआ तो कहा बुखार तो नहीं है। उससे पहले मम्मी बोल चुकी थीं के दोपहर भसीन से दवाई क्यों नहीं ले ली। अभी भी आँखें किरकिरा रही हैं। सिर भारी लग रहा है। कल आइस कैंडी भी खा ली थी न! वो भी अपना काम कर रही होगी। गले के आस पास।

लगतार दिमाग घूम रहा था। अभी भी घूम रहा है। कहीं थिर नहीं है। मच्छर की तरह भिनभिना रहा है।

राकेश दिल्ली आ रहा है। अभी किसी को नहीं बताया है। कुछ स्थगित मुलाकातों की किश्त इस बार चुकाएंगे। कई-कई महीनों बाद। रुकी-सी बातें। वहीं ठहरी-सी। स्टिल। मोशन। साथ सपनों की पोटली होगी। यादें होंगी। भाई अभी भी वहीं है। बस ब्लॉक बदल लिया है। पर वहाँ जाने का मन नहीं है। उसे ही चाँदनी चौक बुला लेंगे। सीसीडी पर बैठे इंतज़ार करते रहेंगे। या घर पर कोई लंबी बैठक। या किसी और जगह। अभी सोचा नहीं है। उसकी भी तो कुछ प्लानिंग होगी। देखते हैं। क्या होता है। 

पता नहीं कितनी बातें फ़ोन पर कहते-कहते रुक जाता हूँ। कह नहीं पाता। उधर से वह भी रहता है। और कभी वह भी रुक जाता है। सब अपनी पारिस्थितिकी में 'फ़िट' हो जाना चाहते हैं। वह भी कोशिश कर रहा है। सपनों की बकाया किश्तों के साथ। फ़िर जो नहीं कहा है उसे कहने का फॉर्मेट भी बनाना होगा। जो उसी तरह आ पाएँ जैसी वह हैं। उनका वैसा होना मुश्किल है, पर..

फ़िर बीच में इधर कई महीनों बाद साथ फ़िल्म देखी। अभिषेक पर। बिन सिर पैर। अक्षय कुमार की 'बॉस'। कुछ बिन्दु हैं जिनपर वहाँ से निकलते वक़्त लिखने का मन बनाया था। अभी भी दिमाग में टंगी हैं। कभी मौका लगे डाक भेजता हूँ। कुछ दिन रुककर।

आज सुबह तड़के तीन बजे बाहर छत पर एक चक्कर लगा कर अंदर आया। बनियान में था। इसलिए लगता है ठंड ने पकड़ लिया। नहाने के बाद से शरीर कुछ टूटा टूटा सा लगता रहा। पर छुट्टी नहीं की। सीढ़ियाँ चढ़ते उतरते सबसे जादा ऐसा लगता रहा के थक गया हूँ। फ़िर इधर दोपहर दो दिनों से सो भी नहीं रहा। शायद इसलिए भी थकान इकट्ठी होती-होती इतनी बढ़ गयी। अभी जीभ का स्वाद नहीं गया है यही ख़ैर है। फ़िर भी रात का खाना नहीं खाया। टाल गया। कभी ऐसा भी करने का मन होता रहा है।

ऐसा नहीं है के खुशियाँ बोरा भर कहीं से चल पड़ती हैं। वह यहीं कहीं आस पास छिपी रहती हैं। बस नज़र चाहिए। वही आँख ज़रा इधर बिगड़ गयी लगता है। देख नहीं पाता। उनका होना मिर्च के कट्टों की तरह किसी खारी बावली से नहीं आने वाला। न कोई 'फ्लिपकार्ट' से होम डिलिवरी करने वाला है। यहाँ तक कि 'टाटा 407' भी कभी उसे ढोते नहीं दिखे। आज़ादपुर तो दूर की बात है।

आज बाज़ार में सिंगाड़े दिखे तो खरीदने का मन हुआ। पर खरीदे नहीं। कभी आगे के लिए बचा रखे हैं। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. कभी-कभी दिल किया तो लिख लेते हैं..
      अक्सर वह नासाज़ रहता है तो इन साजिन्दों के पास आ जाता हूँ..!!

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