अक्तूबर 27, 2013

सारे रंग कहीं उड़ गए हैं

सारे रंग उड़ गए हैं। सब सफ़ेद रंग बन गए हैं। बिन लकीर के। बिन किसी छाया के। किसी पेड़ में कोई हरियाली नहीं। किसी आसमान में कोई नीलापन नहीं। चाँद भी नीली रोशनी सा नहीं। या उन सभी को एक प्लेट में घोलकर अपने ‘ब्लॉग’ की दीवार पर चिपका लिया है। पता नहीं। पर सच में अभी वह कहीं नहीं दिख रहे। यह उदासी का रंग है। यह दुख का रंग है। इसे देख दर्द होता है। पीठ से लेकर पसलियों तक। पोर पोर उँगलियों से बालों के भीतर। हल्दी का पीलापन थोड़ा स्थगित है। मेंहदी की सुर्ख़ लाली थोड़े दिन और रुककर। दिमाग में कर्फ़्यू लग गया हो जैसे। कहीं से कोई आवाज़ न आ रही हो जैसे। अजीब तरह की बेचैनी घेरे रही है। किसी सवाल का कोई जवाब नहीं। बस सवाल हैं। ढेर ढेर। झउआ भर-भर।

 सूरज भी नहीं निकल रहा न इसलिए थोड़ा और सुस्त हूँ!!

मन नहीं कर रहा लिखने का। कम से कम तो यहाँ बिलकुल नहीं। डायरी के पन्नों को पलटते वक़्त पता तो चलता है मन कैसा कैसा होता गया था। हाथ की लिखाई ऐसी ही होती है। बराबर महसूस होती रहती है। सिर्फ़ कलाई या उँगलियाँ ही नहीं दिल भी वहाँ धड़क रहा होता है। उस नीली स्याही से लिखी एक ही पंक्ति खींचे लेती है। उसकी रंगत बताती चलती है बराबर। कहाँ शब्द गहरे हैं। कहाँ स्याही फ़ीकी पड़ने पर भी दोबारा स्याही नहीं भर रहा हूँ। वहाँ नीचे लिखे वक़्त से वहीं पहुँच जाता हूँ।

कई दिनों से इन दोनों लिखे में अंतर देख रहा था। तब वहीं कहीं लिखा भी था। इसमे उतना अपनापन उतर ही नहीं पाता। इसमे सिर्फ़ मेरे शब्द झलकते हैं। मेरे बीते कल में उलझी रही बाते हैं, कहीं पीछे गली में रह गयी यादें हैं, कई छूटे अधूरे सपने हैं, कोई तस्वीर है पर मैं कहाँ हूँ। मेरी छाप थोड़ी कमज़ोर है। मेरे ‘इंप्रेशन’ कुछ कम हैं। यह उस अपनेपन का कुछ कम होना है। जो पन्नों की तरफ़ लगातार खींचता रहा है। बुलाता है। बिठा लेता है। कुछ कहता नहीं है। बस सुनता रहता है।

फ़िर लगता है यहाँ कहने को कुछ ख़ास है भी नहीं। बस अपने को दोहराए रहता हूँ। खुद से खेल रहा होता हूँ जैसे। कभी ऐसे कभी वैसे एक ही तरहों की बातों को रपटाए रहा हूँ। यहाँ एक पन्ने आधे पन्ने बाद स्याही भरने का झंझट नहीं है। उस रुमाल से निब नहीं पोंछनी पड़ती। हाथ पर किसी भी तरह नीलापन नहीं रहता। बिलकुल साफ़। फ़िर भी मन नहीं होता। यहाँ लिखना यांत्रिक होते जाना है। ऐसा लगता है यहाँ मेरी स्मृतियाँ में अजीब किस्म का बनावटीपन जादा उभरा है। वह अनुभव सहज नहीं रह पाते। उन्हे असहज करता फ़िर यहाँ लाता भी नहीं हूँ। जहाँ उन्हे लिखे जाना है वहीं लिखता हूँ। पन्नों पर।

मेरे यहाँ ‘डायरी’ मोटी-मोटी जिल्दों का नाम नहीं है वह ‘स्टेट ऑफ़ माइंड’ है। ‘स्टायल’ है। ‘शैली’ है।

अभी डायरी पलटते पंद्रह अक्टूबर का लिखा सामने से गुज़रा। लिखा है, ‘वहाँ ऐसे एक हाथ माथे पर रख नहीं लिख सकता। हाथ की स्थिति भी आँखों की तरह वही नहीं रहती। इस अंतर को बारीकी से पढ़ रहा हूँ। के यह अंतर वाली रेखा महीन है या कैसी है। जब जान जाऊंगा तब बताऊंगा। अभी यहाँ आने के बहाने दूसरे हैं वहाँ जाने के दूसरे। बस यही दिख रहा है’।

पता नहीं अभी कल ही.. नहीं नहीं परसो.. संजीव सर से बात करते-करते कह रहा था कि इधर कई महीनों से सोच रहा हूँ के ‘हंस’ और ‘कथादेश’ को ख़रीदना बंद कर दूँ। जब किसी भी वाक्य पर क्षण भर भी नहीं ठहरता। कोई वैचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं होती। कहीं विचलन महसूस नहीं होता तब इन्हे क्यों ढोया जाये। यह विचार वाला नुक्ता अब किसी रूमान से नहीं भरता। उल्टे इनसे कोफ़्त बढ़ी है। इस पर ख़ूब लिखने का मन है। कभी मौका लगे इसे निपटा लेंगे।अभी नहीं। 

क्षेपक की तरह पिछला और यह वाला पैरा इसलिए भी लिख रहा हूँ कि लगता रहा है कि इन एक जैसी स्थितियों से निकालने के लिए थोड़ा अपनी तरह से इसे मोड़ने का सही वक़्त है। विरोधाभासी बातें हैं पर व्यक्तित्व ऐसे ही छोटे-बड़े विरोधाभासों से बना है। जो नहीं मानते वह ‘लघुमानव’ नहीं होना चाहते। वे आदर्श बने रहें। किसी किताब में छप युवाओं का आवाहन करें। हम तो भई ऐसे ही हैं। थोड़ी टूटफूट तो लगातार चलती रहती है। उसे नहीं कहेंगे तो बचे कैसे रहेंगे। अपना तरीका यही है।

फ़िर ये जो हाथ से लिखना है और जो यहाँ बैठे टाइप करना है दोनों में अंतर बना रहेगा। यह अंतर बनाए रखना चाहता हूँ। ख़ुद के लिए। दोनों जगहों पर एक ही अनुभूति का होना इस ‘सभ्यता का संकट’ है। दोनों जगह लिखना एक ही अनुभव नहीं है। जो यह नहीं समझ रहे उन्हे समझना होगा। यह उस विविधता को भी बचाए रखेगा जबकि यह आग्रह, उसे समाप्त करना चाहता है, जो एकसमान अनुभवों को इकट्ठा कर टैबलेट बांटने की तरह होता गया है।

तभी लिखना बचा रहेगा। डायरी लिखना तभी बचा रहेगा। तभी कलम बची रहेगी। तभी स्याही बची रहेगी।

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