अक्तूबर 31, 2013

मेरा बस पुतला बचा रह गया हो जैसे..

जबरदस्ती लिखने बैठ गया हूँ। मन बिलकुल भी नहीं हो रहा। फिर भी। आसमान में बादल हैं। शाम ख़ूब हवा चल रही थी। पता नहीं किस दिशा से आती जाती रही। बार-बार फ़ोन लेकर कमरे में आता। फ़िर थोड़ी देर में बाहर निकलता। लगता आवाज़ कट रही है। ठीक से सुनायी नहीं दे रही। फ़िर बाहर रखी कुर्सी पर बैठ बात करने की आदत वहीं खींचे ले जाती। हवा के बावजूद वहीं बैठने का मन किए जाता। कल कह तो दिया था पर अभी तक स्वेटर निकाला नहीं था। तीन छींके लगातार आयीं। नाक बंद नहीं है फ़िर भी। 

मन को पता नहीं क्या होता गया है। गुमसुम सा है। खोया-खोया सा। लिखने से भी कुछ ख़ास बदल नहीं रहा। बल्कि इसे ही टालता रहा हूँ। बिलकुल भी जी नहीं करता। कुछ मौसम की गड़बड़ है। कुछ दिल का मामला है। मन कहीं लगाए नहीं लग रहा। बार बार लौटे आता हूँ। एक ही तरहों से इस ऊब को ढकता थक गया हूँ जैसे। फ़िर भी बार-बार।

उस रात आलोक से मिलकर जब लौट रहा था, रास्ते में ठंड मिली। थोड़ी साथ हो गयी। कुछ वहीं रह गयी। अंदर कुछ नहीं था सिवाये बनियान के। लगा रातें इतनी भी गरम नहीं रह गयी हैं। उनमे गला थोड़ा ख़ुश्क होता रहता है। प्यास भी उसी के इर्द गिर्द घूमती-सी रहती है। उसके लगने पर पीने का मन नहीं होता। फ़िर इसका स्वाद भी इन दिनों में बिलकुल पीछे के मौसम की तरह नहीं रहता। बदल जाता है। छूने में भी वह वैसे नहीं रहता। ख़ैर। मेट्रो स्टेशन से निकला ही था, लगा जैसे सड़क पर यही ठंड उदासी की तरह पसरी हो। कहीं से दो कुत्ते साथ चलने की गरज से निकल पड़े। पर मेरे साथ सड़क पार न कर सकने के कारण उसी किनारे रह गए। कहीं से किसी फ़ूल की गंध आती नहीं लग रही थी। बस मन थोड़ा खाली-खाली सा लग रहा था। लगा कुछ है जो छूटे जा रहा है। उसे पकड़ नहीं पा रहा। समझ आ रहा था। पर अब इंतज़ार कल का करना था। बिन बताए। बिन बोले।

दिल्ली में ठंड ऐसे ही उतरती है। हर साल। उसकी याद भी धुंधली नही होती के दूसरी छवियाँ अंदर तक भर देती हैं। यह थोड़ा 'ग्रे वैदर' है। मन बिलकुल भी नहीं होता। कुछ भी करने के लिए कई कई बार तय्यार करने के बावजूद हार हार जाता। धूप कमज़ोर हुई है। अँधेरा जल्दी हो जाता है। उसके साथ मन भी डूबता रहता है और दिल भी। कुछ भी नहीं कर पा रहा। सोचने और मुंगेरी लाल के सपने देखने से कुछ होना होता हो कबका हो जाता। हुआ नहीं है इसलिए सपने देखना जारी है। और लगातार सोना भी। सोते रहने से वक़्त चलता नहीं भागने लगता है। इसलिए दिन में पता नहीं ऐसा कितनी-कितनी बार करते रहने की कोशिश किए रहता हूँ। पर नींद हरबार तो आती नहीं। न ही उलटते-पुलटते कहीं तक पहुँचता। रात अचानक नींद टूटती है। कहती है जाग जाओ। कितनी बेरुख़ी से वह चल देती है। उसे नहीं पता कि उन उनींदी आँखों की किरकिरी कितनी चुभती रही है।

इन अँधेरी शामों में अकेला नहीं होता। पर लगता है ऐसा ही हूँ। लगातार एक कोने में बैठा। गिनता रहता हूँ बेतरतीब दिन। करने को कुछ ख़ास नहीं होता। कुछ ख़ास करता भी नहीं। बार-बार अपने तक आता हूँ और तुम तक लौट जाता हूँ। इसके अलावा कुछ नहीं। कितने खराब दिन हैं न! कुछ भी करने का मन नहीं होता। बिलकुल खाली-खाली से। अनमने से होते रहने वाले। लगातार अबूझ होते जाना। बिलकुल भी ठीक नहीं है। पर कुछ न कर सकने में ऐसे होते रहते के बीच। मनमर्जियों के बिलकुल उलट। एक भी पल सीधे नहीं। सब के सब जिम्नास्टिक किए रहते हैं। उल्टे पुल्टे। आड़े तिरछे। अरेबा परेबा के जैसे।

इधर कविताओं की तरफ़ लौटा हूँ। असद ज़ैदी की छोटी-छोटी बातों पर कही कवितायें खींचे रहती हैं। कितनी बारीकी से ज़िन्दगी को जीने की कोशिश की तरह। साँसों से डोर बाँधते। उनकी आँखें क्या कुछ देखती चलती हैं। कहती चलती हैं। फ़िर विनोद कुमार शुक्ल हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में झरने की तरह बहती भाषा निर्मल वर्मा की तरफ़ ले जाती हैं। उसका रूमान अंदर तक घुलता रहा है। ख़ुद अभी लिखने की कोशिश में नहीं हूँ। बस देख रहा हूँ। देखते कैसे हैं। लिख फ़िर कभी लेंगे। कविता को 'एस्केप रूट' की तरह लेना नहीं चाहता। इसलिए बच रहा हूँ। फ़िर ढूँढ भी तो रहा हूँ कोई ऐसी किताब जो दिल से कही हो। जो थोड़ा सुकून दे। यहाँ कुछ देर बैठे रहना चाहता हूँ। अपने अंदर के खालीपन को भर लेना चाहता हूँ। उस खोखलेपन में यहाँ तक चला आया हूँ..

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