अक्तूबर 15, 2013

ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं

ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं। बस बराबर इनसे बचने की कोशिश में घुलता जा रहा हूँ जैसे। आँखों के सामने बीतते दिन अंदर-ही-अंदर पता नहीं क्या करे जा रहे हैं। कहीं मन न लगना इसकी पहली निशानदेही थी। कई-कई महीनों पहले। अनमने रहने का मन नहीं करता। फ़िरभी इसी में बने हुए हैं। लगातार बेतरतीब। खाली-से। इन दो शब्दों के आगे चुक-सा जाता हूँ। इस दुनिया में कहाँ खड़ा हूँ। पता नहीं। बात भीड़ में पहचान की नहीं है। पहचान में पहचाने जाने की है। उमर के जिस तरफ़ खड़े यह सब देखते आ रहे हैं वहाँ और कितने दिन बिन नौकरी के रह सकते हैं कह नहीं सकते। रोज़ उबासी लेती सुबहों को उन्ही उदास होते जाते सपनों के साथ ढोते रहने का मन नहीं होता। उनकी नीम बेहोशी में हम कहीं नहीं हैं। बस खाली होते जा रहे हैं। अंदर-ही-अंदर बुनावट बिगड़ती जा रही है। अपने को भी कभी चीन्ह नहीं पाते। पहचान कमज़ोर होती जाती है। सब सामने होते हुए भी नहीं देख पाते। 

ऐसे में नए सपनों की किश्त कैसे बाँध लें। वही पीछे वाले बोझ बनते जा रहे हैं। पीठ पर रखी रुई का बोझ बढ़ने लगा है। वह भीग रही है। वैसे भी उनके इकट्ठे होते जाने से वह सच होने से रहे। वह इस सच के आगे चकनाचूर न हो जाएँ इसलिए कभी-कभी लिखने से भी बचने लगा हूँ। बचने लगा हूँ सामना करने से। कुछ भी सोचने का मन नहीं करता। बस खाली बैठे वक़्त काटते रहें के दिन हैं। कुछ करने के लिए नहीं हो जैसे। वहीं आज से जादा कल की बीती यादें खींचती हैं। घेरे रहती हैं। यह ‘एस्केप रूट’ जैसा है। पर अपना काम कर जाता है। अपने आज से भाग कहीं पीछे छिप जाता हूँ। उसकी ओट में चुपके से देखता रहता हूँ। इधर कबूतर बन गया हूँ। कहीं से किसी बिल्ली को इन सपनों पर आने नहीं देता। ख़ुद पर झपटने नहीं देता। 

कभी मन करता है, किसी ऐसी नींद में चला जाऊँ। जहाँ से उठूँ तो सब सपने सच हो कर सामने इंतज़ार में खड़े हों। भले पहुँचने में थोड़ी देर मेरी तरफ़ से ही हो जाये। पर वह मेरे इंतेज़ार में निमियक तरे बैठे रहें। वह उस कगार तक पहुँच जाएँ जहाँ छोटी-सी रात के बाद वह सब सच हो जाएँ। पर ऐसी नींद आती नहीं। मैं सोता नहीं। रात कितनी बार टूटती है कोई हिसाब नहीं। कहीं लिख नहीं लेता। वह धोखे से टूटती है। फ़िर भी उसे बताता नहीं हूँ। के उठ गया हूँ। लेटे-लेटे उसके इंतज़ार में सुबह कब होती है पता नहीं चलता। वह रोज़ रात ऐसा ही करने लगी है। इधर कुछ जादा ही। उसे समझना होगा। कुछ बहाने बनाकर मानना होगा। 

जितना मासूम हो सके उतना मासूम होकर ख़ुद को बिखरने से बचाए रहता हूँ। लेटे रहने का मन किए रहता है। लेटना ख़ुद को बचाना है। कुछ नहीं सोचता। सोचना बिखरना है। टूटना है। पर कितनी बार ऐसे हो सका हूँ। हरबार यह कोशिश कुछ कम रह जाती। दिन में कितने ही पल ऐसे बीतते हैं जब टूटकर बिखर-बिखर जाता हूँ। समेटने में हर बार कुछ-कुछ रह जाता। कुछ टुकड़े चुभ जाते हैं। दर्द होता है। इन बिखरने समेटने में दिन शामों में शामें उदास रातों में बदलती जा रही हैं। कुछ न कर सकने का भाव अंदर तक सिहरन की तरह दौड़ने लगता है। यह लगातार कमज़ोर होते जाना है। उसमें कहीं साबुत बचे रहने की कोई गुंजाइश नहीं रहती।

सब इतना निर्मम लगता है जिसे कह पाने में कर बार लौट उसी भाषा में अपने को आरामदायक जगह पर नहीं पाता। भाषा को लेकर लगने लगा है वह जितना बताती नहीं उससे जादा छिपा जाती है। वह ‘कंफ़र्ट ज़ोन’ की तरह है पर कमज़ोर परदे की तरह होती गयी है। जिसे कई बार उघाड़ने का मन किए रहता है। कभी कचोट भी होती है के जैसा अंदर तक होता गया हूँ, उसे कह क्यों नहीं पा रहा। जैसा मन में लगता रहा है, उसे किन शब्दों में ढाल हूबहू बाद वाले दिनों के लिए रख लूँ। यह बदलकर रख लेने की ज़िद भी हो सकती है जहाँ से बार-बार अपनी तफ़तीश चलती रहे। सच में इसी तरह, इसी ढर्रे से बात कहना किसी ऊब पैदा करने वाली भाषा की कमज़ोर संरचना लगता है जिसे ढोता रहा हूँ। चाह कर भी इसे बदल नहीं पा रहा। फ़िर कोशिश करनी होगी। दोबारा। बार-बार। 

फ़िर इधर जितना संवेदनशील होता गया हूँ उसे ‘हायपर सेंसिटिव’ ही कहेंगे। लगातार ख़ुद को कहीं किसी गलत जगह फँसा देखकर कचोट लगातार घेरे रहती है। फ़िर ढूँढता हूँ कोई खाली जगह। जहाँ जाकर थोड़ी देर उदास रह सकूँ। कोई चहरे पर आते जाते भाव न पढ़ सके। उन पलकों में रह गयी बूँदों को किंही भाषिक अनुवादों के सहारे समझ न सके। बोले जाने लायक कोई भी शब्द उन सबको यहाँ कह नहीं पा रहा। बस भागे जा रहा हूँ। अपने आप से। दौड़ कहाँ ख़त्म हो रही है, पता नहीं। यह पैदल चलने से भी धीरे चलना है। इतना सब करके, तरह तरह से इन भारी-भारी दिनों में अपने को समेट कुछ-कुछ बचाए रहना चाहता हूँ। बस इतनी छोटी सी तमन्ना को दिल में लिए लिए डोल रहा हूँ। घसिट रहा हूँ। भाग रहा हूँ। पता नहीं कैसे। 

कभी डायरी में लिखा था इधर नौकरी को तीतर-बटेर की तरह इस्तेमाल करने लगा हूँ। सच में। लगने लगा है। सच में यह कोई बहुत अच्छे दिन नहीं हैं। उन्हे मुहावरा बनने से पहले जग जाना है। उठ जाना है। सपनों से निकलकर लौट आना है।

{बीती डायरी का एक पन्ना:  कल आएगा साथ नौकरी लाएगा ,
फ़िर आगे के दो-तीन पन्ने और.. हमारी उमर लगातार हमें तोड़ रही है, नवंबर नौ एक रुकी हुई शाम }

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