अक्तूबर 02, 2013

बस इंतज़ार सा कुछ..

सुबह से कुछ लिख लेना चाहता हूँ। कुछ बेचैन सा। बार-बार आता हूँ चला जाता हूँ। लिख नहीं पाता। समझ नहीं पाता क्या लिख लेना है। क्या है जो छूटे जा रहा है। जिसे लिखे बिना थोड़ा डिस्टर्ब सा हूँ। ऐसा नहीं है के मौसम गरम है। इधर आसमान में बादल हैं। ठंडी हवा चल रही है। दिमाग भी तभी थोड़ा-थोड़ा वैसा है। पर फिर भी अंदर जो चल रहा है उसे कह नहीं पा रहा। थोड़ा परेशान है। कल सारा दिन डायरी लिए बैठा रहा। कभी कुछ होता लिख लेता। फ़िर रख देता। थोड़ी देर बाद फ़िर उठाता। दो चार लाइन लिखता। रख देता। ऐसा पूरे दिन चलता रहा। शाम ढलती रही। थोड़ी देर बादलों को देखता रहा। आसमान में खोये से घूम रहे थे। अकेले से। बिलकुल अकेले। रात यह सोच कर सोया था के सुबह चार बजे तड़के उठ इस अफ़रातफ़री को लिख लूँगा। पर नहीं। छुट्टी थी न। नहीं उठ पाया। नही लिख पाया। पर अफ़रातफ़री अभी वहीं है। मेरे इंतज़ार में।

इस वजह से भी दिमाग अपनी जगह नहीं है। कल जब तुमसे आधी अधूरी बात के बाद फ़ोन रखा तब मन किया किसी दोस्त को फ़ोन कर लेता हूँ। पर बड़ी देर तक किसी नाम पर रुका नहीं गया। उदास होकर बैठने से अच्छा था इस कमरे से निकल कहीं पैदल घूम आऊँ। दिमाग ठिकाने लग जाएगा तब तक। वहाँ अकेले नहीं होऊंगा। जब अकेले बैठे रहो तब न जाने क्या-क्या इसमे चलता रहता। दिल भारी सा हो कहीं रुक सा जाता। कहता ठहर जाओ। पर वहाँ तक हो आया ठीक किया। पर फ़ोन रखते वक़्त तुम्हारी आवाज़ कुछ तो अलग थी। गला सूख रहा था वाला बहाना नहीं चलेगा। कुछ तो बात थी। पता नहीं क्या। 

ऐसे में जहाँ हम होते हैं वहाँ से भाग लेना चाहते हैं। उसे हम जी नहीं रहे होते। काट रहे होते हैं। उनका ऐसा होना मन मुताबिक नहीं लगता। पर वह ऐसा ही होता है। ऐसा ही करता चलता है। यह ऊब बाहर से अंदर नहीं आई है। बल्कि अंदर से बाहर की तरफ़ गयी है। जब हम ऐसे हो रहे होते हैं तब इन्ही के बीच की यादें साथ होती हैं। टूटने से लगातार बचाती। उन्हे हम सपनों की तरह बचाए रहते हैं। उन्ही के इंतज़ार में जीने लगते हैं। कि कुछ है जो स्थगित सा है। पर अपना है। उसके आ जाने पर हम पूरे हो जाएँगे।

बस इंतज़ार ही तो कर रहे हैं। और इधर यह दुनिया की सबसे खराब चीज़ लग रहा है। यह अंदर ही अंदर इकहरा बना रहा है इस ख़तरे के बावजूद कुछ और करने को नहीं रह गया हो जैसे।

लगता है बहुत कुछ और भी करना है पर कर नहीं पाता। बस अनमना-सा बेमन सा बोझिल होता रहा हूँ। इस भाषा के शब्द कभी-कभी वह सब कब भी नहीं पाते जैसा अंदर से होता जाता हूँ। जैसे रात बिस्तर पर किन ख़यालों के साथ तुम्हें ले आया था। हाथ में हाथ लिए हम ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं। उसे आने में अभी वक़्त है। इस दरमियान हम अपने पुराने दिनों की तरफ़ हो चले हैं। कैसी शामों में यह इंतज़ार बिलकुल खाली सा निपट अकेला करता जाता था। अब तुम साथ हो। पता था आँख खोलते ही तुम वापस चली जाओगी इसलिए इसी के साथ कहीं खो गया। तुम्हें साथ लेकर। हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया था।

अभी भी बस सोचे जा रहा हूँ। कर कुछ नहीं पा रहा। शायद इसे बहाना बना ओढ़ लिया हो। पर तुम उघाड़ मत देना। ऐसे ही रहने दो। ख़ुद को इसी में बचाए रहता हूँ। म्यूजिक प्लेयर पर बेतहाशा गाने बजे जा रहे हैं पर दिल तक कोई नहीं पहुँच पा रहा। कोई है जो उन्हे रोक रहा है। आवाज़ धीमी कर दी है। कान में लगने लगी थी। बाहर से आती आवाज़ें भी बढ़ गयी हैं। जादा देर और अकेला नहीं बैठ सकता। यहाँ से उठना होगा। जहाँ चुपके से तुमसे बात कर सकूँ। कि जहाँ सिर्फ़ तुम मेरी, मैं तुम्हारी बात सुन सकूँ। इसलिए कई बातें जो लगातार चलती रहीं हैं उन्हे आगे कभी कहेंगे।

बस अभी लगता है कुछ सोचने समझने के काबिल नहीं रह गया। कभी लगता भी है के अपने आस पास को लेकर उदासीन सा होता जा रहा हूँ। उन डिटेल्स को पकड़ नहीं पा रहा। एक अजीब तरह की उलझन घेरे रहती है। ठहरा सा ठिठका सा रह गया हूँ। किसी आ जाने वाले खटके के इंतज़ार में। कभी कई सारे काम एक साथ कर लेने का मन हो जाता है। पर कर कुछ भी नहीं पाता। अपने अंदर सिमटता सा कछुआ होता जा रहा हूँ। जो समुद्र के किनारे किसी बड़ी लहर के आने के इंतज़ार में है। तभी अपने हाथ पांव खोल उसमे समा जाएगा। अपनी मंज़िल की तरफ़। लग रहा है लहर आ रही है। कोई खटका आने ही वाला है। जल्द। बहुत पास। उस क़दम के पास। 

6 टिप्‍पणियां:

  1. अक्सर ऐसी हालत में खुद को पाती हूँ मैं भी. कुछ छटपटाहट होती रहती है...इतनी ज्यादा कि चैन से रह नहीं पर पाती पर जितने में लिख सकूँ उससे थोड़ी कम. शब्द होते हैं मगर बेतरतीब से. नींद नहीं आने पर बेसबब करवटें बदलने जैसा.

    अधिकतर ऐसे में बाईक लेकर बाहर निकल जाती हूँ...तेज़ रफ़्तार चलाने से अच्छा लगता है...मोड़ों पर तीखा कट मारते हुए ध्यान सारा कहीं और रहता है तो शब्द थोड़ी तमीज में आते हैं. इसके अलावा कभी कभी टहलने भी निकलती हूँ. वैसे में चश्मा उतार कर पॉकेट में रख लेती हूँ...धुंधला होने से सब कुछ अलग अलग सा दिखता है. आसमान के बादलों जैसा सब्जेक्टिव, उसमे अपनी मर्जी के आकार खोज सकती हूँ.

    लिखना ऐसे में बस उस अकुलाहट को कम करने के लिए होता है. कोई फांस सी चुभी रहती है. ऐसे में ये देखा है कि एक पोस्ट ऐवें ही लिख जाती हूँ, रफ जैसा कुछ...उसके बाद जा कर वो लिख पाती हूँ जो लिखने के बाद सुकून आता है.

    एक कहानी पढ़ी थी. एक राजा ने अपने मंत्री से कहा उसे कोई ऐसी चीज़ चाहिए जिसे देख कर वो जब खुश हो तो दुखी हो जाए और जब दुखी हो तो खुश हो जाए. मंत्री होशियार था. उसने एक अंगूठी बनवाई जिसपर पर खुदा हुआ था 'this too shall pass' :) ये मेरा सबसे फेवरिट है. सोच रही हूँ ऐसी ही एक अंगूठी बनवा लू. फेज है गुज़र जाएगा लिखा हुआ.

    खैर. तुम्हारी पोस्ट्स पढ़ कर बहुत सारा कुछ लिखने का मूड हो जाता है कभी कभी. अच्छा लिखते हो. अब तो इधर अक्सर टहल लगती रहती है.

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    1. बेचैनी पता नहीं क्या है। कभी-कभी अजीब अजीब सा होता है। अभी शनिवार से भूख गायब सी है। और भी पता नहीं क्या क्या आज वाली पोस्ट में लिखा है।

      अच्छा है के लिखने का मन होता रहता है। टहलन बनी रहे ..

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  2. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी यह रचना आज हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल(http://hindibloggerscaupala.blogspot.in/) की बुधवारीय चर्चा में शामिल की गयी है। कृपया पधारें और अपने विचारों से हमें भी अवगत करायें।

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  3. यह बुधवारीय नहीं सोमवारीय है, त्रुटी के लिए क्षमा प्रार्थी।

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  4. ऐसा होता है कई बार मन कुछ कहना चाहता है लेकिन कह नहीं पाता , बैचेनी को बखूबी उभारा आपने

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    1. कभी कभी कुछ कुछ चलता रहता है वही उतार लेते हैं..और कभी नहीं भी लिखते हैं..तब उससे जूझ रहे होते हैं।

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