अक्तूबर 07, 2013

डायरी का उदास सा पन्ना..

पता नहीं कैसे अजीब से दिन हैं। बिलकुल ठहरे से। उदास से। बेतरतीब। कहीं कोई मुस्काता बहाना भी नहीं। इतना लिखकर मन कर रहा है लैपटाप बंद कर थोड़ी देर सो जाऊँ। मन खाली-खाली सा है। पता नहीं यह कैसा भाव है। कैसा करता जा रहा है। शनिवार से भूख कम हो गयी है। खाने का मन नहीं करता। इस लाइन को लिखने के बाद रुक गया। सोचने लगा। ऐसा क्या है, जो ऐसे होते जाने का कारण है। एक-एक कर मेरे वो सारे बहाने जिनसे थोड़ी देर के लिए ही सही मन थोड़ा बहल जाता था, सब चुक से गए हैं। मुझे छोड़ मुझसे अलग खड़े देख रहे हैं। उनका ऐसा होना बिलकुल भी मन मुताबिक नहीं है। बिलकुल भी नहीं। कभी नहीं।

घूमता हूँ तो मन बाहर नहीं अंदर ही चक्कर लगा रहा होता है। लिखने से लगातार बचता रहता हूँ। डायरी चुप पड़ी रहती है। ख़ुद को समझा नहीं पाता। क्या लिख दूँ। मेरे पास एक कमज़ोर सी भाषा है जो कह भी नहीं पाती के कैसा महसूस कर रहा हूँ। जैसे दोहरा कर वहीं घूमता रहा हूँ। उसके पास एक भी शब्द लेजाता मालूम नहीं पड़ता। गाने भी कहीं नहीं लेजा पाते। उनके बोल बस बोल रह जाते हैं। कहीं दिल में उतरते नहीं लगते। बेमानी से। अंदर तक उदासी को और उतारने देते हैं।

अभी लेटा तो लगा नींद नहीं आएगी। तीन दिन से इसी के इर्दगिर्द होता गया हूँ। बस लेटा रहता हूँ। मन घूमता सा रहता है। दिल डूबा-डूबा सा है। खामोश सा। चुप सा। कुछ नहीं बता रहा। बस बैठ गया है। ऐसे दिन किसे पसंद होंगे। किसी को नहीं। मुझे भी नहीं। एक बार तुमने कहा था न जब बात नहीं होती तब ऐसे ही सब होता रहता है। उलझन भरा। परेशान करने वाला। जहाँ हम कुछ नहीं कर रहे होते हैं। बस जो बीत रहा होता है उसमें हम होते हुए भी नहीं होते। नहीं होते हुए भी होते हैं। तुम्हारी आवाज़ सुन लेने के आसपास। डूबते उतरते से दिन वैसे ही ढलती शाम में बढ़ते अँधेरे के साथ उतरते। थोड़े चुप से। थोड़े छिपे से। थोड़े गुम से।

चेहरे से किसी को पता नहीं लगने देता कैसा होता जा रहा हूँ। अंदर की उधेड़बुन सतह पर आने नहीं देता। अनमना सा होते हुए भी कल दोस्तों संग घूमता सा रहा। फ़ोटो खिंचवाने का मन नहीं था। वहाँ चेहरा गुमसुम सा है। पर पकड़ा नहीं गया। बढ़ी दाढ़ी ने अपने अंदर छिपा सा लिया। इतना कम चलने पर थकता नहीं हूँ पर कल पैर दर्द करने लगे। मन बिलकुल भाग रहा था। कहीं एक टक रुकने को तय्यार नहीं था। अजीब सी बेचैनी एक दायरे में जकड़े हुई थी। अभी भी उससे निकला नहीं हूँ। घुट रहा हूँ। रात थका चूर सा जब बिस्तर पर आया तो भी नींद आने को नहीं हुई। ठिठकी खड़ी रही।

इधर लगा इस तरह अपने अंदर पैदा हो गयी बातों भावों ऊबो सिलवटों कतरनों को कह नहीं पा रहा। लिखने को होता हूँ पर नहीं। वह उतर ही नहीं पाते। बड़े आहिस्ते से एक और ब्लॉग बनाया। रफ़ ड्राफ़्ट। बस चुपके से राकेश और संजीव सर को बताया। और किसी को नहीं। कहीं शेयर करने का मन नहीं हुआ। अपनी भाषा की गहराई में उतर कहीं और चले जाने की तयारी की तरह वहाँ बैठ गया। चुप गुमसुम। पता नहीं जब तुम्हें वहाँ जाने से मना किया तभी से अजीब सा होता गया। उस रात डेढ़ घंटे बैठा रहा। और तब पहली पंक्ति लिखी गयी। कागज़ पर नहीं। सीधे ड्राफ़्ट पर।

जब तुम अपनी आवाज़ में अपनी उदासी छिपा रही होती हो मैं बिलकुल वहीं उसी आवाज़ में कहीं बैठा उदास हो रहा होता हूँ। पता नहीं उसे आगे नहीं बढ़ा पाया था। आँखें धुँधली हो गयी थीं। कुछ साफ़ नहीं दिख रहा था। बेमन सा होता गया। बस वहीं रहने दिया। स्थायी उदासी की तरह। जैसे अभी इस पिछली लाइन के बीतते अंदर आँसू पलकों के आसपास आकार थम से गए हैं। पास पास। बिलकुल अगल बगल।

जब-जब दिन बीते तुम्हारी आवाज़ नहीं सुन पाता तब-तब अंदर से ऐसे ही होता आता हूँ। तुमसे कह रहा हूँ। किसी और से न कहना। बस आगे लिखने का मन नहीं है। कमरे में उमस बढ़ गयी है। साँस भी रुक रुक कर आ रही है। तुम्हारे वहाँ मौसम कैसा है। वहाँ शामें ठंडी हो गयी हैं..

2 टिप्‍पणियां:

  1. यूँ तो इस उदासी में कुछ भी अच्छा नहीं लगता फिर भी संगीत के कुछ टुकड़े हैं जिनके कारगर होने का स्कोप होता है. मीठी सी एक फिल्म है कैरामेल...उसका बैकग्राउंड स्कोर है कभी सुनना. अच्छा लगे शायद.
    http://www.youtube.com/watch?v=A_yMERP6828

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    1. धुन थोड़ा और उदास करती इससे पहले बंद कर और उदास हो गया। धीरे-धीरे सारी धुने चुक सी रही लगती हैं ..पता नहीं क्या है..जितना समझता हूँ उतना उलझता जाता हूँ ..

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