अक्तूबर 09, 2013

मनाली की पहली रात कुछ देर से हुई थोड़ा रुक कर आई

जगहें वही रहती हैं उनके किरदार बदल जाते हैं। हमारा कॉलेज उसी जगह था जहाँ बीते तीन महीने से उसे देखते आ रहे थे। कहीं से भी थोड़ा भी अलग नहीं लग रहा था। पर कुछ उस दिन में ही था जो उसे अंदर ही अंदर बदल रहा था। शाम धीरे धीरे वहाँ उतर रही थी। जैसे उस जगह पहले कभी उतरते नहीं देखी थी। चुपके से आहिस्ते से वह वहाँ बिखरती रही। यहाँ से वहाँ तक। वहाँ से यहाँ तक। हम इसे देखते तो रोज़ आ रहे थे पर यह दिन और इस दिन की यह शाम कुछ अजीब सी थी। सब कुछ जाना पहचाना था भी और बहुत कुछ बिलकुल नया सा भी। अगले चार दिन हम दिल्ली में नहीं रहेंगे। अभी बस आई नहीं है। अंदर ही अंदर अकुलाहट भर गयी है। इंतज़ार है।

थोड़ी देर में अँधेरा होने से पहले हम यहाँ से चल पड़ेंगे। हम सबकी एक दूसरे से जान पहचान जादा पुरानी नहीं है। मेरे तो उससे भी कम। पर नहीं। हम सब साथ जा रहे हैं। पहाड़ों को देखने का रोमांच कुछ अलग ही होता है। बरफ़ से ढके बादलों के बीचों बीच। सड़क। सड़क किनारे अंतहीन गहराई। हम डर नहीं रहे थे। कुछ सोच भी नहीं रहे थे। जो नहीं देखा उसे देखने जा रहे थे। बसें कभी डराती नहीं हैं। हमारा बचपन शुरू से इनके इर्दगिर्द घूमता सा रहा। इसलिए भी नहीं सोच रहा था रात कैसे कटेगी। सफ़र कैसा रहेगा। बस खिड़की किनारे वाली सीट पर बैठ उस रात एकटक बाहर देखता रहा। कैसे अँधेरा रात बनकर मेरे अंदर बार-बार आता। बार-बार पलकों को अपने साथ ले जाना चाहता। पर नहीं। उसे आने नहीं दिया। और सिर्फ़ मैं ही नहीं हम सब अपने अपने हिस्सों में खोये-खोये से थे। कोई कम कोई जादा।

इस वक़्त जब लिख रहा हूँ दोपहर के तीन बज रहे हैं और हम मनाली पहुँच चुके हैं। शायद खाना खाने के लिए अपने अपने कमरों से आकर नीचे डायनिंग हाल में बैठे हैं। ऊपर कमरों की खिड़कियाँ बड़ी-बड़ी हैं। तब भी उनमे बाहर खड़े ताड़ के पेड़ समा नहीं पा रहे हैं। वह न जाने कब से खड़े हैं। जैसे किसी के इंतज़ार में। उधर हम लेटे-लेटे अपनी रात की थकान के आस पास घूम रहे हैं। वह धीरे-धीरे चढ़ रही है। नदी पहाड़ सड़क सब कुछ हमारे लिए अब पहले जैसा नहीं रह गया है। वह हमेशा के लिए बदल गया है। इस नयी जगह का अपना सुरूर काम करता लग रहा था। हम ताज़ा थे। बिलकुल तरो ताज़ा। चेहरे आसानी से उन्हे छिपा ले रहे थे। आँखें अलग चमक रहीं थी। फेफड़े पहाड़ों पर आकर दुगनी साँस भरे ले रहे थे। मौसम ठंडा था पर धूप भी खिली-खिली सी थी। नए मेहमानों को देख रही थी। नए मेहमान उसे देख रहे थे।

अब तक हम अच्छी तरह से समझ चुके थे मनाली पहाड़ पर है पहाड़ पर बरफ़ है। और यह ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के साये में बैठा ऊँघता शहर तो कतई नहीं है। सैलानी ऐसे ही आते जाते रहे हैं और एक से अनुभवों के बावजूद वह सबके दिलों में कई कई सालों तक ऐसे ही ज़िंदा रह जाएँगे। जब दिन बीत जाते हैं तब बचती हैं उनकी छवियाँ। उन छवियों में शब्द नहीं होते कोई ध्वनि नहीं होती। वह दिमाग नहीं दिल का हिस्सा होता है। कोमल सा। नाज़ुक सा। किसी छेड़छाड़ के लिए कभी तय्यार नहीं। ऐसा ही इन चार सालों में हमारे दिलों साथ होता गया होगा। खाना खाने के बाद लगभग पाँच बजे हम हिडिंबा मंदिर की तरफ़ निकलने को हुए। मंदिर कभी भी घूमने के अलावा किसी काम नहीं आए। इसलिए जाने में कोई धार्मिक दिक्कत नहीं आई। कोई चार सौ साल पुराना लकड़ी का मंदिर है, वही लकड़ी देखने चल पड़े।

लौटते लौटते अँधेरा होना ही था। हो गया। हम पैदल पुराने मनाली होते हुए माल रोड पहुँचे। रंग बिरंगे लट्टू जगमगा रहे थे। लोग भी वैसे रंग बिरंगे कपड़ों में जगमगाते इतना घूम लेना चाहते थे के उनकी यादों के धुँधला हो जाने पर भी उनकी यादों का रंग बचा रहे। बाज़ारों का अपना चरित्र कुछ नहीं होता बस कुछ चीज़ें अदल बदल जाती हैं। उनको हमेशा बिकने वाला बने रहना पड़ता है। लगातार जेब टटोलने वाला। उसे खाली कर लेने वाला। हम भी कई टुकड़ों में अलग अलग सड़क नापने लगे। अपने हिस्से के रंग स्वाद ठंड को इकट्ठा कर यहाँ से समेट ले जाने के लिए। झोला भर भर। हमारी इनफेंट्री कम से कम इतने चक्कर तो लगा ही चुकी थी के शर्तिया कह सकें कि इस सड़क पर अखरोट की यादगार लकड़ी के छल्लों और ऐसे ही छल्लों पर लिखने वाले कुल चार लड़के हैं। बस अड्डा कितने कदमों पर है। हमारा होटल कितने मिनट की दूरी पर है।

यह मनाली में हमारी पहली रात थी। कुछ देर से हुई। थोड़ा रुक कर आई। अभी के लिए इतना ही। बकाया एक दो दिन में।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सफ़र भी कोई शहर सा होता है. दिल में बस जाता है. वक़्त के साथ बदलता, लोगों के आते जाते चेहरों के रंग बदलते मगर इमारतें वही...ठहरे हुए लम्हों के वैसे ही सबूत.

    बहुत अच्छा लगा संस्मरण के ये दोनों हिस्से पढ़ना. बहुत खूबसूरत है, कुछ अलग सी बुनावट वाला. परदेस में बैठे लिखे हुए पोस्टकार्ड जैसा. कम में कितना कुछ खुलता है. कितने दृश्य दिखते हैं.

    मनाली जा चुकी हूँ इसलिए ये पढ़ते हुए अपनी यादों की गंध भी साथ चलती है. धूप का टुकड़ा दिखता है, रस्ते के दोनों ओर लगे सेब के पेड़ों का बगीचा भी.

    इसे पूरा लिखना. जितना लिखने में पूरा हो जाने जैसा महसूस हो उतने तक.

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    1. कुछ पोस्टें आगे वाले दिनों की बनी भी, पर लगता रह काफ़ी कुछ रहता गया। जितना कह रहा हूँ उससे भी जादा नहीं कह रहा हूँ। शहर का सफ़र कुछ कुछ बीतते दिनों बाद रूमानी रंग में तब्दील होता गया।

      मनाली यादों के किसी बिरवे पर टंगी सुनहली पोटली है। कितना कुछ था। है। उन सबको महसूस करते रहने जैसे..

      अभी भी बचा गया हूँ कभी और कहने के लिए।

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