नवंबर 11, 2013

नवंबर नौ एक रुकी हुई शाम

हम लोग इंतज़ार कर रहे थे शायद ऐसे ही किसी दिन का । ऐसी ही मुलाक़ात का। राकेश इस बार दस दिन लिए दिल्ली आया। दिवाली के दो दिन पहले। पर बे-तक्कलुफ़ होकर उस इत्मीनान से अपने-अपने हिस्से कभी खोल ही नहीं पाये। एक दूसरे से कुछ कह नहीं पाये थे। तय हुआ सब इस शनिवार इकट्ठे हो राकेश के यहीं चले चलें। वहीं बैठेंगे। फुसरत होगी। वक़्त होगा। मौका होगा। तब धीरे-धीरे अपने अंदर उमड़ती-घुमड़ती बातें कह एक दूसरे से कह लेंगे। सुन लेंगे। कुछ बोलेंगे। कुछ नहीं कहने का मन हो तो ख़ुद को वहीं तय्यार कर लेंगे। जो है उसे वैसा ही कहेंगे। बे-लाग लपेट। 

बीच में दो बार मिले तो पर मन से बैठ बात नहीं हो पाई। कुछ था जो लगता रहा रह गया है। इतने दिनों में काफ़ी कुछ कहने के लिए हम सब इकट्ठा करते रहे। उसे जब तफ़सील से सामने रखते उससे पहले जाने कहाँ देने वाले थे।

स्टैंड पर पहुँचा ही था बस आ गयी। पंद्रह रुपये की टिकट। अरुण आशीष दोनों मेट्रो में संग थे। उमेश के बारे में अरुण से पूछा तब कुछ नहीं बोला। पर अच्छा हुआ, वह भी था। एमपी मॉल के पास। धूप आज निकली थी। पर सूरज बादलों के कभी पीछे कभी आगे होता रहा। ठंड थी। गोद में बिहू लिए वहीं राकेश मिला। वे तीनों साढ़े बारह के बाद आए। इस बार भी राकेश बिहू के लिए चॉकलेट लेना भूल गया। हम सब नीचे से फ़िर ऊपर आकर बैठ गए। कहीं हिले नहीं। मन पता नहीं क्या-क्या सोच वहाँ गया। क्या-क्या बाँधना भूल गया याद नहीं। पर लंबे इंतज़ार बाद हमारी बैठक लग रही थी। फ़िर एक बार शुरू हुए तो बस पता नहीं कहाँ कहाँ से होते हुए गुज़रते रहे। शुरू हुए आज के बोझिल से उकताए से बे-नौकरी वाले दिनों से।

इतनी उमर हो जाने के बाद भी एक अदद नौकरी का ना होना सबसे जादा तोड़ता है। जितना वह बाहर से नहीं देखता उतनी ही बारीकी से वह अंदर का रेशा-रेशा उधेड़ रहा होता है। हमे पता है, हम वहाँ नहीं होना चाहते। पर वहीं हैं। कहीं भाग नहीं सकते। कहीं जा नहीं सकते। स्थितियाँ लगातार विकट होती जा रही हैं। पर हम कुछ नहीं कर पा रहे। बस उन पुरानी बीती इमारतों को देख खीज से जाते हैं। उनका वहाँ होना किसी भी बहाने से अंदर उल्लास आह्लाद आनंद से नहीं भरता।

उनका होना हमें याद दिलाता रहा है हमारे बर्बाद होने के दिन। वह दिन जब हम किसी को कुछ नहीं समझ रहे थे। बस एक धुन थी। हम हैं। बस हम ही हैं। और कोई नहीं। नौकरी के प्रति घृणा जैसे भाव लिए विचारों को शिद्दत से महसूस करते रहे। ‘करियरिस्ट’ हो जाना गाली की तरह लगना। यह कुछ अलग हो जाना है। कुछ अलग करना है। इसने हमें खांचे-साँचे दिये। पर इसकी जकड़न सबसे जादा आज अंदर सीलन की तरह लगती है। ‘एस्टब्लीश्मेंट’ को हर तरह से तोड़ते रहने ने जैसे हमें गढ़ा उसने हमें इस दुनिया के लिए ‘मिसफिट’ साबित किया। आज हम उसी दुनिया में एक नौकरी के लिए इतना जूझ रहे हैं। इसका कारण वही लोग हैं जो इस ‘विचारधारा’ को औज़ार की तरह इस्तेमाल कर हमें बनाते-बिगाड़ते रहे। इस रूप में वह ‘ओवर-स्मार्ट’ थे। उनके पास विकल्प थे। यह विकल्प होना उनकी जुगाली करते रहने की खाद की तरह है जहाँ से यह लगातार ताकत पाते रहे हैं। एक बात यह भी निकली के इसमे ‘जेआरएफ़’ की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वे इस तरह के ‘एलीट’ थे जो कुछ भी किसी भी तरह रह सकते थे। उन्ही लोगों के जादा ‘फॉलोवर्स’ बने जो कहीं से पैसा पाने लगे और आगे चलकर उनकी नौकरियाँ हुईं। और बहुत सारे जो इसे ‘अफोर्ड’ नहीं कर सके वह वहाँ की मुंडेरों से उड़ रीवा या दिल्ली के स्कूलों में मास्टर बन उस तंत्र से बाहर धकेल दिये गए। आज भी हम ही हैं। पर अकेले हैं। पैसों की कंगाली ऐसे ही बुनती है।

यह विचार की ‘विचारधारात्मक’ भूमिका है। जिसने हममें नकार का भाव तो भरा पर हमारी दृष्टि को भी उतना ही सीमित संकुचित किया। यह ऐनक की तरह हमारी नाक पर चढ़ गया। हम देख ही नहीं सके के हम कहाँ हैं। अपने साथ क्या कर रहे हैं। फ़िर मसला जितना एक-रेखीय दिखता है उसे समझना उतना ही जटिल है और सबसे पीड़ादायक इस सबके साथ जीना। 

बातें इतनी बोझिल नहीं थीं। पर थीं यही। हम सब मिलकर इस बात तक पहुँचे जहाँ मानविकी विषय हम सबको एक तरफ़ धकेल रहे होते हैं। बातों-बातों में यह भी के साहित्य में ‘वामपंथी’ होना अपनी वैधता को सत्यापित करने जैसा है। और अधिकतर लोगों ने इसी ‘फ़ैशन’ के तहत इसे ओढ़े रखा है। यह ‘फैब इंडिया’ का कुर्ता पहनने की तर्ज़ पर अपना काम करते हैं। वरना सब अपने मूल चरित्र में कितने सामंती और बुर्जुआ हैं यह उनसे अधिक और कोई नहीं जानता।

कभी-कभी लगता है जब हम बाहर के हो जाते हैं तब चीजों को जादा अच्छी तरह से देख समझ पाते हैं। वहीं हम लोग कर भी करते रहे। एक-एक कर अपने आज के कल के चीथड़े उधेड़ते रहे। एक एककर उन बारीक सीवनों को अपने भोथरे नाखूनों से खींच रहे थे, जिन्होने हमें बुना। आज तक हमें बनाए रखा। उनकी उपादेयता इतनी ही भर थी के हमें हम जैसा बनाए रखा जा सके। हम प्यार भी कर रहे थे तो उसका वर्ग चरित्र पहले निश्चित कर आगे बढ़ते। राकेश और अरुण उस दिन नई सड़क पर पूछे गए सवाल का जवाब देते रहे। सुंदर क्या है? हम किसी भी लड़की की तरफ़ आकर्षित होते हैं तबकौन-सी चीज़  काम कर रही होती हैं? हम किन मानकों को गढ़ अपने मन को तय्यार करते हैं? क्यों उसके पीछे हमारी आँखें भागने लगती हैं। पता नहीं इसका कोई और जवाब हो भी सकता है या नहीं। यहीं शादी के सवाल भी टकराए। जो ‘टु बी ग्रांटिड’ है वह ऐसा ही क्यो होता गया है। इसमे ऐसा क्या है जो ऊब पैदा करता है। यह कई सारे सामाजिक सवालों का बड़ा नैतिक सा जवाब है। पर इसमे रहते हुए घुटन क्यों महसूस करने लगते हैं। अगर इसके समानांतर स्त्री भी वही करने लगे जैसा पुरुष करते हैं तब?

जवाब स्त्री ने ही दिया। राकेश की सहचरी ने। भाभी लिख नहीं रहा क्योंकि बोल नहीं पाता। और नाम लिखना थोड़ा अजीब सा किए जा रहा है। वे कहती हैं प्रेम जितना दुतरफ़ा है शादी के बाद वह कई और दिशाओं में लगातार खुलता है। उसे इतनी सारी जिम्मेदारियाँ एक साथ उठानी पड़ती हैं के उसके हिस्से का वक़्त भी कम पड़ जाता है जहाँ वह ख़ुद के लिए कुछ क्षण निकाल ले। यहाँ उसकी कुछ अपेक्षाएँ हैं। वह अगर अपने पूर्व प्रेमी जो कि अब उसक पति भी है से थोड़ी देर के लिए साथ माँग रही है तो उस पति को क्या करना चाहिए? यह सवाल की तरह बीच में आया। जिसका जवाब आशीष दे रहा था। अरुण कुछ भी कहे पर वह भी कुछ ऐसा ही सोचता होगा। जिससे पूछा जा रहा था वह भी कुछ बोला। पर उसका जवाब पारित नहीं हुआ। उन दोनों के बीच यह जीवंत सवाल उनके रिश्तों की तरह है। भले यह सवाल जवाब उन्हे कैसे भी लगते रहे हों पर यही उसकी मजबूती का सबसे बड़ा आधार बना हुआ है। यह एक तरह की पारदर्शिता है जिससे कई दंपति बचे ही रहना चाहते हैं।

इन सारी बातचीत में वह सबसे चुप। एक कोने में बैठा सब सुनता रहा। कुछ-कुछ वह भी जोड़ता। पर अंदर ही अंदर काफ़ी कुछ उसके भी चलता रहा होगा। उसके पास भी कुछ सवाल रहे होंगे। थे भी। उसमे पूछे भी। अपनी कही भी। कुछ के जवाब मिले। पर उनके लिए यह जगह नहीं है। जब पूरे-पूरे जवाब मिल जाएँगे तब। उससे पूछकर। इतना तो कर ही सकता हूँ।

राकेश जितना विचारों में व्यवस्थित लगता है उतना उनको लेकर जीने में वह उतना ही अव्यवस्थित जान पड़ता है। शायद एक हद तक हम सब ऐसे ही होते होंगे। पर इस तरह होने से वह बचना चाहता है। जैसे हम। वह सुलझा हुआ है पर लगता है दूसरों के लिए जादा। फिर वही वाक्य संरचना दोहराकह रहा हूँ हम जैसे ही अपने से बाहर निकलते हैं थोड़ा सहज महसूसते हैं। के चलो यह बात हमारे लिए नहीं है। वरना हम ख़ुद कितनी तरहों से फँसे हैं हमें ही पता है। पर वैवाहिक सम्बन्धों पर जितनी संजीदगी से वह एक एक बात स्वीकारता चला जाता है ऐसा करने की हिम्मत सबमे नहीं होती। यही उसे राकेश बनती है।

इस पूरी बातचीत में आशीष दूसरा पिता था। घर के अपने अनुभवों का ख़ूब इस्तेमाल करते हुए हम सब देख रहे थे। कुछ घंटों की दोस्ती में बिहू उसे जाता देख रोने लगा। हम सबको अब चलना था साढ़े आठ बज रहे थे। ठंड का मौसम है। अँधेरा कुछ जादा घना लगता है। सीढ़ियाँ उतरते बिहू की मम्मी बोलीं अभी दोस्ती है रिश्तेदारी नहीं है। पता नहीं वह कितना मतलब समझा होगा। फ़िर भी उसका रोना बंद नहीं हुआ। रोता रहा। हम नीचे उतरते उसकी आवाज़ में फ़िर से ऊपर नहीं आ सकते थे। जाना था।

पर चुपके से उस शाम की रिकॉर्डिंग अपने साथ लिए आया हूँ। एक दस मिनट की है और एक आधे घंटे से कुछ जादा की। यहाँ अभी दस मिनट वाली। यह मेरी पहली पोस्ट भी है जो पॉडकास्ट के साथ जा रही है। और वह कहानी बाद में कि कैसे बस स्टैंड से उन तीनों को विदा कर मैं राकेश के साथ वापस चल पड़ा। शायद बहुत कुछ था जो अभी भी कहना सुनना बचा रह गया था.. पर पहले तुम सुन लो। जब तुम कहोगे तब यहाँ ‘पब्लिक स्फेयर’ में उसे लाएँगे..इसलिए बाकीयों के हिस्से थोड़ा और इंतज़ार..

यह पिछली शाम है, लिंक दिये दे रहा हूँ ऐसी ही पिछले साल की पिछली शाम  और यह रही रिकॉर्डिंग..

2 टिप्‍पणियां:

  1. अगर ऐसा है तब तो तुम्हें भी खुद लिखने को गंभीरता से लेना चाहिए।

    कुछ बात तो है जो यह ताकत देता है। लिखना लगातार हो तब कुछ रचनात्मक निकल कर आता दिखेगा। कभी लिखा भी तो था..

    'तुम्हारे संदर्भ में लगता है न लिखने का वक़्त कभी नहीं आ पायेगा, अगर तुम सिर्फ न लिखने के बहाने बनाते रहे। लिखो। वह हमारी इस ख़तम होती मानसिक उर्जा को शक्ति भी तो देता है। न भी देते हों पर भ्रम तो हो ही जाता है। बस उसे जानने की ज़रूरत है। शुरुवात करके तो देखो। मुश्किल है। पर करना तो पड़ेगा तुम्हे ही। खुद को दोबारा ऐसे ही पाया जा सकता है। और जहाँ तक असफल होने का मामला है, उसमे स्थायित्व की बात है उसपर यहाँ अभी नहीं..

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