नवंबर 14, 2013

बिन यादों बिन सपनों वाला दिल

जीशान। उसका नाम जीशान है। कभी नाम का मतलब नहीं पूछा। शायद उसे मालुम भी न हो। क्लास में पढ़ने वाले और भी बच्चे हैं पर पता नहीं क्यों इस पर आकर ठहर जाता हूँ। शक्ल से बिलकुल मासूम सा। पढ़ने से जी न चुराने वाला। रोज़ स्कूल आता। पर सितम्बर के बाद इसका आना एकदम से कम हो गया। और पता नहीं क्यों उसका चेहरा उदास लगने लगा। कुछ-कुछ खोया-खोया सा। पढ़ रहा होता तो देखता उसकी आँखें कुछ ढूँढ रही हैं। वह वहाँ नहीं होता। उसका वहाँ होना वहाँ नहीं होने लगा। उसने बोलना लगभग बंद कर दिया। अपने आप में गुमसुम सा। बिलकुल चुप। शांत। अकेला। बातों को न कहने वाला। अंदर ही अंदर सब ऐसे चलता जो उसे परेशान करता लगता। लगता मेरी पकड़ से दूर जा रहा है।

कई बार बहाने से पूछा। उसके दोस्तों से जानना चाहा। पर कुछ नहीं। हरबार कह देता सर कुछ भी तो नहीं है। फ़िर पूछता तो कोई ऐसा ही गोलमोल जवाब देता के आगे कुछ कहना ठीक नहीं लगता। हरबार लगता कुछ छिपा रहा है। बताने का मन नहीं है। 

फ़िर सोचा किसी बच्चे से लड़ लिया होगा। ठीक हो जाएगा। पर नहीं। बात इतनी ही होती तो ठीक रहता। इस बहाने दोस्ती मज़बूत होती। बात बनती। पर समझ नहीं आया कि इतने छोटे बच्चे इतने समझदार कैसे हो जाते हैं। वह अपने आप ही अपने स्तर पर उन्हे संभाल लेना चाहते हैं। जीशान मुझे नहीं बताना चाहता था। नहीं बताया। पर लगातार सोचता रहा क्या है जो इसे ऐसे अकेला करते जा रहा है। किसी से घुलमिल क्यों नहीं रहा। किसी से कुछ कहता क्यों नहीं। चुप क्यों रहता है। बोलने में ऐसा क्या बोल जाएगा जो हम समझ नहीं सकेंगे। एक सुबह ऐसे ही रजिस्टर देख रह था। फ़ौरी निगाह इसके नाम पर जाकर थम गई। हफ़्ते में दो बार ही स्कूल आया। जिसमें से एकबार आधे दिन बाद ही भाग गया। यह ऐसे स्कूल छोड़कर जाने वाला बच्चा तो नहीं है। अगर कोई बात थी, तबियत ख़राब थी तो कहकर जाना था। पर कुछ नहीं। वह चला गया। बिन बताए।

अगली सुबह वह फ़िर नहीं आया। लगा मामला कुछ गड़बड़ है। कुछ हो तो नहीं गया। बच्चों से पूछा। पहले तो कोई नहीं बोला। थोड़ी देर बाद नोमान खड़ा हुआ। बोला, ‘वो तो अपने अब्बा के साथ फलों की रेहड़ी लगता है, पता नहीं अब आएगा के नहीं’!

कितनी आसानी से वह कह गया। अगर इतना ही आसान इसे सुन लेना होता तो कितना अच्छा होता। पता नहीं इस तस्वीर को जब भी देखता हूँ तो लगता है अभी कुछ कहेगा। कहेगा उसे स्कूल आना है। उसे भी पढ़ना है। खेलना है। झगड़ना है। ख़ूब-ख़ूब बातें करनी हैं। किताबों के पन्ने पलटने हैं। सोचता हूँ कभी मन करे तो थोड़ा रो दे। दिल हल्का हो जाएगा। जब भी देखता हूँ तो उसकी आँखें खींच लेती हैं। लगने लगता है कितनी मुश्किल से वह वहाँ आया होगा। कैसे उसके घर वाले रोज़ भेजने से पहले सोचते होंगे। उसका वहाँ रुके रहना आगे आने वाले दिनों में और विकट होता जाएगा। उम्र जैसे-जैसे बढ़ेगी वह ख़ुद उन लाद दी गयी जिम्मेदारियों को उठाना चाहेगा। फ़िर एक दिन ऐसा आएगा, वह कभी स्कूल नहीं आ पाएगा। मन होगा फ़िर भी नहीं।

उसके हिस्से कौन-कौन से सपने हैं। कोई नहीं कह सकता। उन्हे वह सच भी करना चाहता होगा, पता नहीं। चाहकर भी नहीं कर पाता होगा। कितनी छटपटाहट लिए वह दूसरे बच्चों को देखता होगा। वह कभी टीवी पर किसी विज्ञापन में नहीं आने वाला। उसके हिस्से का बचपन ऐसा ही है। निर्मम कठोर संताप से भरा हुआ। किसी त्रासदी की तरह। यह सपनों की दुनिया में आने से पहले ही उनका चकनाचूर हो जाना है। बचपन के दिन अभी से कहीं उड़ से गए। यह सारे रंगों का बेरंग हो जाना है। आवाज़ों का एकदम से चुप हो उसके शोक में बदल जाना है। बच्चे शोर नहीं मचाते तो अजीब लगता है। वह भी शोर नहीं मचाता। चुप-चुप रहता है। किसी दोस्त से कुछ नहीं कहता। उमर से जादा बड़ा हो गया है। कुछ इसे जादा समझदार होना कहेंगे पर उसका ऐसे होते जाना कचोटता है। यह बचपन से बचपन के दिनों का गायब हो जाना है। यह ऐसे गुमशुदगी के दिन नहीं हैं। उनमे डूब जाने के मौके हैं।

स्कूल की दुनिया सपनों को सच न भी करती हो पर यह बचपन को साँस लेने का मौका ज़रूर देती है। वह पढ़ लिखकर भले कोई नौकरी न करे पर यह दिन उसके दिन हैं। दिन कभी रात की तरफ़ वापस नहीं लौटते। यहाँ लौटना नहीं है। कोई रिवाईंड  का बटन नहीं है। जो जीना है जैसे जीना है वह यही है। अब बीते तो कभी वापस नहीं आएंगे। यह दोस्तियाँ फ़िर कभी नहीं मिलने वाली। इनकी नोकझोंक लौटकर उससे कुछ नहीं पूछेंगी। कभी कोई खट्टी-सी याद भी उसके दिल से नहीं गुज़रेगी। दिल बिलकुल खाली याद के कैसे धड़कता होगा पता नहीं। कभी उससे पूछूंगा। शायद कभी नहीं।

अभी भी तस्वीर में उसे देख रहा हूँ। कहीं खो गया है। इसे वापस लाना है। कैसे। पता नहीं। पर लाऊँगा ज़रूर।

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