नवंबर 19, 2013

दिल, दिल्ली की ठंड, शादी और सपना

दिन पता नहीं कैसे बीतते जा रहे हैं। करने को कुछ है ही नहीं जैसे। खाली से। ठंडे से। दिन अब छोटे होने लगे हैं। तीन बजने के साथ जैसे गायब से। उबासी नींद के साथ बुलाती है। पर नाम नहीं करता। रज़ाई ठंड से भी ठंडी कमरे में पड़ी रहती है। पैर भी ठंडे रहने लगे हैं। फ़िर नीचे साढ़े पाँच पानी भरते-भरते अँधेरा हो जाता है। अभी सवा छह भी ठीक से नहीं बजे हैं पर घुप्प अँधेरा छा गया। खिड़की के बाहर की दुनिया बस इस कमरे तक सिमट गयी है। सामने छत पर एक बल्ब जलता भी है तो कुछ देर बाद बंद हो जाता है। सड़क पर गुज़रती गाड़ियों का शोर इतना परेशान नहीं करता।

परेशान करता है इतने इतने दिन बाद भी कुछ न लिखना। दिमाग चलना बंद कर देता है। सोचता रहता हूँ तब लिखा जा सकता था, पर नहीं लिखा। चलो फ़िर लिख लेंगे। पर एक बार जो टला वह कभी लौट कर नहीं आता। कितना कुछ इकट्ठा हो जाता है फ़िर भी नहीं कहता। कहता हूँ तब जब खाली हो जाता हूँ। कहने को कुछ ख़ास नहीं होता। जैसे के अब।

इन सारी बातों के दरमियान दिमाग में यही चल रहा है के अभी कमरे से बाहर निकलूँ और थोड़ा घूम आऊँ। मन थोड़ी देर अकेले में बिताने को हो रहा है। जहाँ फ़िर से तरतीब से तुमसे कही सारी बातों को लगा सकूँ। के जब उन्हे डायरी में कहने को होऊँ तब वह सलीके से करीने से आती जाएँ। उनको कहीं ढूँढना न पड़े। कहीं किसी कोने में छिप न जाएँ। वह वैसी की वैसी बनी रहें। बिलकुल पास। अनछुये एहसास की तरह। घास पर चुपके से पड़ी ओस की बूँद की तरह। आहिस्ते से पैरों के बिन आवाज़ बगल में आ जाने के जैसे।

दिल्ली की ठंडीयों के साथ शादियों का मौसम भी आ गया है। उन न्योतों में कई कार्ड अपनी उमर में छोटे उन संगियों के भी हैं जिनके संग बचपन की कोई याद कभी बनी हो न बनी हों; पर उनके हवाले हमारे घर आए उनके माता-पिताओं की बातचीत में लगातार आते रहे। हम उन्हे ऐसे ही सुनते रहे। कभी उनसे मिले नहीं। मौके कभी आए भी नहीं। बस धुंधले से चहरे याद रह गये। उन्हे वैसे ही रहने दिया। ऐसा नहीं हैं के सिर्फ़ हम ही बड़े हो रहे थे। वह भी हमें अनदिखे उतने ही बड़े होते रहे। साथ-साथ। आज उनकी शादी के कार्ड आए हैं। देखकर अजीब सा भाव गुज़र जाता है। लगता है सब इतने बड़े हो गए। शादी होने वाली है। हमें पता भी नहीं चला। कभी बात भी नहीं हुई।

इसे ऐसे कभी नहीं लिखना चाहता था। पर अब बात आ गयी है तो कहता चलूँ। थोड़ा दिल तोड़ देने वाली बात है। इसलिए कभी सतह पर आने नहीं दिया। पर ख़ैर। अब यह पता नहीं कैसा है कि जिनके संग बचपन बीता, खट्टी मीठी यादों के ढेर-ढेर पुलिंदे अब भी खुल-खुल जाते हैं, उन्ही में से दो दोस्तों की शादियाँ इस बीते मई थी। दोनों दिल्ली के बाहर। एक ही हफ़्ते के भीतर। पहली सीहोर, मध्य प्रदेश में, दूसरी लखनऊ। जाना किसमे है यह बड़े दिनों तक तय नहीं कर पाया। तय करने के लिए शायद कुछ ज़िंदा साझेदारियों की ज़रूरत पड़ती है। कुछ ऐसा जो अभी भी जोड़े रहे। उस बंधन को जो बचपन से इस उमर तक आए। जब हम अपने हमसफ़र के साथ होने जा रहे हैं, तब तक। जिसके साथ ज़िन्दगी बिताने की शुरुवात कर रहे हों। पर नहीं। उसने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। कभी नहीं कहा। के चल मैं जा रहा हूँ, तुम भी पीछे से आना ज़रूर। कुछ था, जो उस दिन टूट गया। ऐसा नहीं था के जाते वक़्त सामने नहीं पड़ा था। उसकी मुश्किल आसान कर दी थी। वहीं नीचे तब पानी भर रहा था। पर नहीं। उसे तब भी कुछ नहीं कहना था। नहीं कहा। नहीं बुलाया। बस पहिये लगे बैग को घसीटता हुआ चला गया।

पर पता नहीं कैसा हूँ। उसके पापा के दिये कार्ड के बाद ट्रेन में सीटें देख रहा था। देख रहा था सीहोर भोपाल से पास पड़ेगा या होशंगाबाद से। बस से कितने घण्टे लगेंगे। खाली कोई नहीं थी। सब वेटिंग लिस्ट। न नयी दिल्ली से न निज़ामुद्दीन से। पर बड़ा कमज़ोर सा विचार था। फ़िर तो ऐसे मन हटा के चलो हटाओ। है बचपन का दोस्त तो क्या? नहीं जा रहे। जिसने बुलाया उसकी शादी में गए। लखनऊ।

यह शादियाँ ऐसे ही कर जाती हैं। इतवार आशीष की शादी की तस्वीरें कुछ नए तरह से मुझे बुनती लगीं। उनमे कहीं-कहीं आगे आने वाली भूमिकाओं को देख भर लेने का रूमान खींचे ले रहा है। उनसे बचना आसान नहीं। पता नहीं तब से क्या सब सोच लेना चाहता हूँ। उन्हे कह पाने की अपनी सीमाएं हैं। जिन्हे यहाँ कहने से पहले फ़िर से गुज़र जाने का मन होता है। के चुपके से तुम्हें देखता रहूँ। तुम्हें सब कह दूँ जो अंदर ही अंदर उन साझे दिनों की याद के बाद हममे जुड़ते गए। जुड़ गए हैं हमारे दिन और रात। शाम और सपने। करवट और नींद। और वह सब भी जो कटहल के अचार आम के गलके से तुम कहती गयी थी। जो कहते हुए भी नहीं कहती। मैं नहीं कहता। अचानक चुप्पी सी लगा कहीं किसी चाँदनी रात में कॉफी मग लिए छत तक पहुँच जाता हूँ। के इस मुलाकात के बाद कहूँगा अपने हिस्से का सपना..

{आगे की बातें..}

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