नवंबर 20, 2013

दो चार रह गयी गैर-ज़रूरी बातें..

 1.
मन रुका नहीं। थोड़ी देर में ही बाहर निकला। थोड़ा चल भी लेना चाहिए। शाम ढले दुनिया थोड़ा बदलती भी है। पूरे रास्ते सोचता रहा काफी कुछ रहने दिया या छूटता गया। उसे चाहकर भी कह न पाया। सब कुछ कहना वैसे भी कहाँ अभीष्ट है? कौन चाहता है सब कह दिया जाये। पर अभी बैठा हूँ तो दिमाग भागे जा रहा है। ठहर नहीं रहा। कई सारी बातें टकरा रही हैं। 

चीज़ें वही नहीं रह जाती। लगातार बदलती जाती हैं। सब बदल रहे हैं। पल-पल। डीटीइए स्कूल की दीवार के बगल से गुज़रते वक़्त उस जगह से रात रानी की गंध गायब है। पता नहीं जुखाम नहीं है। नाक भी ठीक है, फ़िर भी वह वहाँ क्यों नहीं थी। इतनी जल्दी तो जाती नहीं थी। इस बार क्या हुआ? ठंड तो अभी और बढ़ेगी। उसके बिन कुछ कम सी शाम लगती है। पर वो मेट्रो स्टेशन के पास सावनी के दो चार फ़ूल धुए से जूझते अभी भी वहाँ लगे हैं। इस साल के अगले साल में बदल जाने से वह भी चले जाएँगे। उनका ऐसे बने रहना अंदर तक भर जाना है। 

पता नहीं इतवार माली को क्या सूझी उसने फ़िरंगी पानी की सबसे मोटी डाँड काट डाली। अभी तो उसपर फ़ूल आते। इतराते। ख़ुद बुलाते। कहते देख लो। हम फ़िर आ गए। इस बार तुम उसे दे ही देना। हमारी ख़ुशबू के साथ। किताब में रख कर नहीं बिलकुल ताज़े। सुगंध के साथ। 

2.
पता है अभी भी बच रहा हूँ। जो कहने के लिए आया हूँ, उसे कह नहीं रहा। टाल रहा हूँ। सोचता हूँ जब सीधे उसे नहीं कही तब यहाँ लिखने का कोई मतलब नहीं। पर दूसरे पल मन करता है कह दूँ। शादी के कुछ ही दिन बाद वह पत्नी संग दिल्ली लौट आया। ऐसे ही एक रात दोनों नीचे रात के खाने के बाद वाली सैर कर रहे थे। मैं गेट की तरफ़ से आ रहा था। मुझे देख थोड़ा शरमाया या असहज हुआ। पर सामने था इसलिए बात करना ज़रूरी लगा। ज़रूरी लगा कुछ कहना। सिर्फ़ कहने के लिए कहना। पता है उस बचपन के साझीदार उस दोस्त ने उस रात क्या कहा? वह कहता है, यह शचीन्द्र है। हमारे पड़ोसी। मैं भी कुछ बोला। कुछ और पूछना चाहा। पर चुप रहा। 

यह हमारी पहली और आखिरी औपचारिक मुलाक़ात थी जिसमे वे दोनों साथ थे। अकेले कभी न उसने देख रुकना मुनासिब समझा। न कभी मैंने ज़रूरत समझी। हम कुछ दूजे क़िस्म के पड़ोसी हैं। बात कम करता करते हैं। पहले माले वाले दूसरे माले के पड़ोसी के ऐसे ही पड़ोसी हो सकते हैं। यह शहर ही कुछ ऐसा है। दोस्तों के पड़ोसी हो जाने वाली बात पता नहीं क्यों दिल में कहीं धँस-सी गयी। मैं किसी ऐसी 'संज्ञा' में तब्दील हो चुका था जहाँ मेरी पुरानी पहचान मिटायी जा चुकी थी। मैं मैं नहीं रह गया था। कुछ और होता गया। 

यह कोई अचानक घट गयी परिघटना तो बिलकुल भी नहीं होगी। बस अचानक हमारे सामने आ गयी होगी। हम इससे बच रहे होंगे। के उघड न जाये। कहीं से कोई फाँक दिख न जाये। हम समान रूप से अपनी बढ़ती समझदारियों में दूर होते गए होंगे। जहाँ किसी के पीछे छूट जाने का एहसास भी नहीं होता। बस हम छूटते जाते हैं। बिन बताए। बिन बोले। आँखों के सामने।

3.
आज पूरा दिन सोचता रहा वह जीशान वाला पुर्ज़ा स्कूल मैगज़ीन के लिए देना ठीक रहेगा के नहीं। खन्ना ने कहा के हमें भी कुछ देना है। तभी से अटक गया हूँ। क्या दूँ? अजय से पूछा। पर बात अटक गयी नाम पर। वह छोटा सा बच्चा इसके छप जाने पर कैसा महसूस करेगा। सारे विद्यालय के सामने उसकी क्या छवि जाएगी। वह कैसा-कैसा सा होकर अपने को छिपा लेना चाहेगा। कहीं गुम सा उन सबकी आँखों में खो जाएगा। इसके आने के बाद वह और गुमसुम न हो जाये। और अंदर तक इतना सिकुड़ जाये के कभी बाहर निकालने की सोचे भी न।

नहीं। यह ठीक नहीं है। यह मेरी और उसकी बात है। हमारे बीच की। यहाँ चलता है। वह इसे नहीं पढ़ेगा। स्कूल वाले यहाँ तक नहीं पहुँच पाएंगे। उसकी पहचान उसके नाम की तरह ही छिपी रहेगी। उससे कोई नहीं पूछेगा। किसी सवाल का जवाब नहीं देना होगा। पर उस पत्रिका में आने के बाद उसके ऐसे उसे सबके सामने लाने में खतरे हैं। सोच लिया यह नहीं दूंगा।

4.
स्वाति हॉस्टल के बगल बारात घर में आज शादी है। अभी पिछले हफ़्ते हिन्दू महासभा भवन में एक शादी थी। आज लौटते वक़्त ध्यान दिया तो उस रात के वही दो लड़के नकली भाले लिए उसी पोशाक में नीचे दरवाज़े पर खड़े हैं। टेंट भी वही है। सजावट भी। यह शायद उनका परमानेंट जुगाड़ है। जैसे शुक्रवार बिरला मन्दिर के उस लॉंन की तरफ़ जाते रास्ते पर बिलकुल वैसी ही सजावट थी जैसी की आज। कभी इसी पार्क में राम किंकर हफ़्ता दस दिन रामकथा कहते थे। शायद नवरात्रों के आसपास। हम छोटे-छोटे हुआ करते थे। फ़िर सुनने में आया है के इस उत्तर आधुनिक 'प्रेम' ने इस वाटिका के हिस्सों पर प्रवेश निषेध के बैरिकेड लगवा दिये हैं। कैमरों में प्रेमी युगलों का अभद्र शारीरिक व्यवहार गाहे-बगाहे नीचे दफ़्तर में लगे एलसीडी पर दिखने लगा था। अब ऊपर उस दक्षिण शैली में बने स्थापत्य की तरफ़ हम चाहकर भी नहीं जा सकते। गुफाएँ तो जमाना हुआ ताला बंद की जा चुकी थीं। 

बहरहाल।    

इधर मोहर्रम या उसके पहले पड़ी ईद से हमारी तरफ़ नमाज़ की अज़ान सुनाई देने लगी है। सुनाई देना इसलिए भी थोड़ा विस्मित करता है कि यह कैसे संभव हुआ के 'दिल्ली एक' में कोई मस्जिद कहीं से चल कर आगई हो। याद करता हूँ तो आस पास एक मस्जिद मिंटो रोड चौराहे पर दिखती है। जिसके मीनार रातों रात खड़े किए थे। हमारे ग्रेजुएशन के सालों तक वहाँ चारों तरफ़ मीनार नहीं थी। एक रात वह अचानक उग आई थीं। उसके स्पीकर की आवाज़ कुछ जादा दूर तक नहीं आ रही क्या? 

फ़िर ध्यान आया रेल्वे स्टेशन पर लाइन बदलते इंजनों की सीटियों की आवाज़ें भी इस मौसम में ख़ूब सुनाई दे रही हैं। क्या बात है। कहीं मौसम के साथ आती हवाएँ पूरब से आ रही हैं इसलिए। आ तो चुनाव भी रहे हैं।

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