नवंबर 21, 2013

हमारी उमर लगातार हमें तोड़ रही है

हमें ऐसा क्यों लगता है के हम गलत जगह पर हैं। क्यों लगता रहा है हम जिस क़ाबिल हैं वहाँ कभी पहुँच ही नहीं पाये। जैसे अभी। 'अभी' काल विशेष में होना है। जहाँ हमारी बढ़ती उमर लगातार हमें तोड़ रही होती है। हम जहाँ हैं वहाँ से कई साल पहले हमें नौकरी वाला हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हैं। अब हमें बहाने चाहिए। अपने 'फ़ेलियर' को 'जस्टिफ़ाय' करने के लिए। ख़ुद को टूटने से बचाने के लिए। कहीं हम पीछे छूट से गए हैं। पीछे रह गए हैं। अपने आस पास को देखते रहने के कारण अजीब सी कुंठा से भर गए हैं। ख़ुद की क़ाबिलियत पर शक करने लगने की हद तक। उस हद तक जहाँ हम अपने दिनों को पैसों में तब्दील नहीं कर पाते। पर हमारी बेरोज़गारी हमें ऐसे ही बनाती जाती है। यहाँ लिखने भर से पेट नहीं भरने वाला। कोई एक कौर रोटी के लिए भी नहीं पूछेगा। यह इन सारे दिनों का गायब हो जाना है। इनके होने का कोई मतलब ही न हो। जैसे हमारे होने का कोई मतलब नहीं है। पता है यह दुख की पंक्तियाँ हैं। पर यह भी हमारी तरह कमज़ोर हैं।

पता नहीं इन दिल्ली के चुनावों में नौकरी किन-किन पार्टियों के घोषणापत्रों छप सकेगी। उसे जगह मिल भी पाएगी या नहीं। इन फ़ालतू के सवालों से वे लोग अपने आप को चिंतित नहीं करते होंगे। जब हमारी अर्थव्यवस्था का चरित्र पूंजीवादी होता जा रहा है तब हम इन सत्ता प्रतिष्ठानों से किसी भी तरह की उम्मीद कर भी सकते हैं, कह नहीं सकता। यह उनका एजेंडा ही नहीं है। ऐसा होना प्रतिगामी होते जाना है या संशोधनवादी होते जाना। यह विचलन है या एक इच्छा। किसी भी तरह से उस तंत्र में घुसपैठ करने की आतुरता को ऐसे ही किसी पद से विश्लेषित किया जाता रहेगा। हासिल सिर्फ़ विश्लेषण होगा। नौकरी नहीं। 

हम वही लोग तो हैं जो अपनी ज़िन्दगी के उन चमकते सालों में लगातार 'मिसफिट' होते रहने के लिए ख़ुद को तय्यार करते करते रहे जबकि हमारे साथी 'करियरिस्ट' होकर नौकरी वाले। हम विचारों के तहख़ानों में ख़ुद को बंद कर दुनिया को देखते रहे। हमने ख़ुद ही इसे बाँट लिया। और मान लिया के यह दुनिया हमारे लिए नहीं है। हमारे लिए तब होगी जब हम ख़ुद इसे अपने लिए बनाएँगे। इसे अपनी मर्ज़ी से उस तरह बनाएँगे जैसा हमें लगता कि उसे हो जाना चाहिए। इसमे काम करने की गुंजाइश लगातार बनती रही है। स्थितियाँ और विकट होती गयी हैं। नव-साम्राज्यवादी अधिनायकवादी सत्ता का वर्चस्व जितना कठोर होकर जनवादी विमर्शों मूल्यों को पीछे धकेल रहा है वहाँ हम लोगों को हमेशा उसके प्रतिरोध के लिए तय्यार करते रहना चाहिए। उनके औजारों के बरक्स हमें अपने विश्लेषण को और पैना कर उन अमानुषिक प्रक्रियाओं को उघाड़ फेंकना है। यह विचारों से अपनी बात को कहना है। 

ऐसा नहीं है के आज इनकी ज़रूरत नहीं है या समय कुछ बदलकर सकारात्मक हुआ है। यह विचलन ही कहलाएगा। के हम अपने इस प्रस्थान बिन्दु से थोड़ा पीछे खिसक कर दो कदम पीछे हुए हैं। ताकि लंबी छलांग लगा सकें। हम समझ नहीं पाये थे के किन वैचारिक प्रक्रियाओं के तहत हम इन विचारों तक पहुंचे? यह विचार हमें किसी सहज विमर्श के चलते नहीं मिले थे। यह बने बनाए खाँचे थे जिनमे हमने खुद को जमाना शुरू किया। उन साँचों को परखने का वक़्त नहीं था। उस वक़्त बस वह थे। उनका रोमान था। अगर आज यह हमें हमारी सबसे बड़ी गलती लग रही है। और हम अपने कल को न बदल पाने की कसक लिए घूम रहे हैं तो इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उन लोगों पर आती है जो हम तक इन विचारों को लेकर आए। वे सुविधा सम्पन्न लोग थे। जिनका पीछा किसी भी हालत में आगे आने वाले सालों में कोई आर्थिक सवाल नहीं करने वाले थे। हम जिन परिवारों से आए थे उनमे हमें इसलिए पढ़ाया लिखाया जारहा था के कल हम एक अदद नौकरी वाले हो जाएँगे। पर हमें नहीं पता था के यह विचार मिलकर हममे ऊब की तरह भरते जा रहे हैं जिसके बाद हम इस दुनिया को एक अलग तरह से समझ तो पाएंगे पर किसी क़ाबिल नहीं रह पाएंगे।

हम सब इन विचारों के रूमान में इसलिए भी फँसते जाते हैं क्योंकि हमें अपने अस्तित्व को साबित करना सबसे ज़रूरी लगता है। लगता है हम भी अगर सभी की तरह होते गए तब हमारी पहचान कैसे विशिष्ट रह पाएगी। यह भीड़ में अलग दिखने का आग्रह है। आग्रह है अपने जैसों से अलग दिखने का। यह जाति धर्म जैसी संज्ञाओं के विपरीत ख़ुद को स्थापित करना है। जहाँ विचारधारा  उन सबको एक जैसा बना रही होती है। पर यह समरूपता उसे खलती नहीं है बल्कि वह सोचता है वह इसी के लिए तो चला था। यह भी एक तरह का समूह बनता है, जिसमे रहने के लाभ किसी न किसी रूप में उन्हे मिलते रहते हैं। उनके विरोध में उनके पक्ष में एक बना बनाया संगठन काम करता रहता है। यह सलाहियत उनके लिए बराबर बनी रहती है। हम जिस दिल्ली विश्व विद्यालय में पढ़ रहे थे वहाँ विचारधारा के रूप में सबसे जादा फ़ैशन में 'वामपंथ' अभी भी अपना काम कर रहा है। साहित्य अपने आप में 'जन' के बिना एक कदम भी नहीं चल पाता। जिसे अपनी प्रामाणिकता सत्यापित करनी होती है वही इसका कुर्ता पहन निकाल पड़ता है। वरना कम से कम उस समय कोई भी निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल नहीं होना चाहता। सब पाश की कविता पढ़ते हैं। मुक्तिबोध की तरह अग्रसेन की बावड़ी में ब्रह्म राक्षस को ढूँढते पाये जाते हैं। निराला हो जान चाहते हैं।

हो सकता है विचार का आग्रह किन्ही वैचारिक पाठकों को हताश निराशावादी युवक का प्रलाप लगे व वे इसे व्यक्तिवादी इच्छाओं का अश्लील एकालाप कह सीधे सिरे से ख़ारिज कर आगे बढ़ जाएँ। पर यह किसी भी तरह का पलायन नहीं है। सवाल उठाने अपनी आलोचना करना हमने भी उन्ही विचारों के पास से सीखा है, जिसका झण्डा आप बुलंद किए हुये हैं। अगर नहीं सुन सकते तो यह संवाद को नकारने के सिवा कुछ नहीं कह सकते। व्यवस्था बदलने के आग्रह में वह स्वयं कितने निरंकुश होते गए हैं, यह उन्हे दिखना होगा। किसी प्रति विचार को बिन विचारे नकार देना उनकी ख़राब आदत है। सपने सिर्फ़ उन्होने ही नहीं देखे, हमारी आँखों ने भी देखें हैं। अगर कह रहा हूँ के मुझे भी नौकरी चाहिए तब क्या यह माँग बिन सुने अनदेखी करने लायक है? यह पुराना सवाल मुझे किससे पूछना चाहिए? कितने साल और इंतज़ार करने के बाद मेरे हिस्से की तनख़्वाह मुझे मिलेगी? मेरे कुंद होते कौशलों की भरपाई कैसे होगी? इतने सुनहरे साल जो आँखों के सामने बीत रहे हैं उनकी कीमत कितनी ज़िंदगियाँ चुकाएंगी? पता है इन सारे सवालिया निशानों को सिरे से खत्म होने में और कितने साल लगने वाले हैं यह कोई नहीं बता सकता। कोई नहीं। बस यह ऐसे ही बने रहेंगे।

{ऐसे ही कभी कभी मन उदास हो जाता है: ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं } ; 

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