नवंबर 24, 2013

दीक्षा: दैहिक शुचिता का स्त्री पाठ

हमारे समाज में लड़की ‘बनकर’ रहना इतना आसान नहीं। बनकर रहने में जो ध्वनि छिपी है वह चुनी नहीं जा सकती। वह इसी समाज द्वारा ‘प्रदत’ है। इसमे किसी भी तरह का विचलन स्वीकार्य नहीं। चूंकि समाज का आधार यही बनी बनाई भूमिकाएँ हैं इसलिए इन्हे कोई तोड़ने की कोशिश भी नहीं करता। सच यह समाज हमने कभी स्त्रियॉं के लिए बनाया ही नहीं। कभी उनके लिए ‘स्पेस’ नहीं रचा। यह रचना या उनके लिए बनाना पुरुष की तरफ़ से दी जा रही सहूलियत-सलाहियत की तरह ही है। जिसमे कुछ उसके अधिकार क्षेत्र में है और उस बाड़े के भीतर की कुछ जगह में इन स्त्रियों को समा जाना है। यहाँ उसकी उपस्थिती हमेशा शोषित की ही रही। वह किसी निर्णय को ख़ुद से नहीं ले पाती।

अभी पीछे बीती दिवाली अचानक डीडी भारती पर जा ठहरे। देखा यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी ‘घटश्राद्ध’ पर बनी फ़िल्म ‘दीक्षा’ आ रही है। फ़िल्म वहाँ तक पहुँच चुकी है जहाँ गुरुकुल के आचार्य अपनी बेटी को कुछ दिनों के लिए आश्रम की ज़िम्मेदारी सौंप बाहर जा चुके हैं। वह अकेली ही सारी व्यवस्थाएं संभाल रही है। सहायक कथा में उसका प्रेम प्रसंग वहीं गाँव में रहने पढ़ाने वाले मास्टर के साथ आकार ले रहा है। एक दिन पता चलता है के उसे गर्भ ठहर गया है। इस बात को अब छिपा रखना है कि वह गर्भवती है। चूंकि वह विधवा है इसलिए यह निषेध क्षेत्र में उसकी कमज़ोर-सी सेंध है। जब वहीं गुरुकुल में पढ़ने वाले शिष्यों को इस बात की भनक लगती है तो वे अवज्ञा के साथ-साथ उस लड़की का बहिष्कार तक करने लगते हैं। यह बहिष्कार एक स्त्री के पदस्खला हो जाने के बाद शुरू होता है। वे ख़ुद को पुरुषों की भूमिका में तब्दील कर लेते हैं जहाँ दैहिक सुचिता नैतिकता स्थापित करना उनके अधिकार क्षेत्र में स्वतः आता है। फ़िर वह पुरुष जिससे गर्भ ठहरा है उसके हिस्से यह अपमान कितना आता है, सिरे से गायब है। मास्टर क्यों बच गया या कहानी में वह अंश हैं के नहीं यह मूल पाठ को पढ़ने के बाद ही पता चल पाएगा। पर वह पुरुष है इसलिए ऐसे किसी भी कथित ‘लांछन’ से वह बच निकलेगा। उसका कुछ बिगड़ेगा भी नहीं। फ़िल्म आगे बताती है वह मास्टर गाँव छोड़ भाग चुका है। यह भाग कर जाना भी स्त्री के हिस्से नहीं आता। जिससे वह प्रेम करती थी उसका साथ मात्र देह प्राप्त कर अचानक गायब हो जाता है।

परंतु इस कहानी में वह किसी आलंब की इच्छा नहीं करती। वह कहती है के वह इस बच्चे को जन्म देगी। उसे विश्वास है के जिसके साथ उसने प्रेम किया है वह कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकाल लेगा। वह गर्भ में पल रहे बच्चे की धड़कन को महसूस कर रही है। पल-पल उसी बंद कमरे में आने वाले सपनों को बुन रही है, जिन्हे बुनने का अधिकार उसके विधवा होते ही छीन लिया गया है। यह स्त्री द्वारा अपेक्षित व्यवहार नहीं है। उसे ऐसी किसी कामना से बचना चाहिए। पर वह बचती नहीं है। कि वैधव्य में वह किसी पर पुरुष द्वारा गर्भ धारण करे। वह मास्टर कुछ देर के लिए उसके जीवन में आशा की किरण की तरह आते हैं पर वह जादा दूर तक नहीं बढ़ पाते। उनका निर्णय है लड़की गर्भ गिरा दे। कितना आसान होता है पुरुषों का यह निर्णय लेना। 

गर्भ गिरा देने के लिए कहने वाला पुरुष उस पीड़ा को नहीं समझ सकता जो वह अजन्मे बच्चे की माता महसूस करेगी। यह उस पुरुष का कमज़ोर निर्णय है जो कहीं न कहीं उसी समाज के दायरे में वापस चला गया है। उसने भी मान लिया है कि यह अनुचित है के एक विधवा किसी बच्चे को जन्म दे। एक शाम वह लड़की को कहता है के गर्भपात के लिए उन्हे शूद्रों की बस्ती में जाना होगा। नियत दिन वह वहीं आ जाये। मास्टर उसकी वहीं प्रतीक्षा करेगा। वह इतना डरपोक है के शोर मचने पर एकदम वहाँ से भागना ही उचित समझता है। इधर यह ‘ब्राह्मण’ होने की त्रासदी भी है। कि आपको उन आदर्शों को बचाए रखना है, जिन पर समाज को चलना है। उससे विचलन किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा। क्योंकि नियामक होने के बावजूद ख़ुद ऐसा करने से यह समाज क्षण में धूल-धूसरित हो सकता है। यह स्वयं को शुद्ध बनाए रखने का आग्रह है। शुद्धता रक्त से ही प्राप्त की जा सकती है। इसलिए स्त्रियों द्वारा ऐसे प्रकरणों के लिए उचित दंड दिया जाना चाहिए। यह योनि की सुरक्षा की चिंता है। उसपर एकाधिकार का पाठ है।

पर यह कहानी उस स्त्री के पक्ष में मज़बूती से खड़ी है। के धर्म-समाज-पुरुष सब स्त्री को अपने मुताबिक ढालते रहे हैं। इस प्रक्रिया में वह इतने अमानुषिक होते गए हैं जहाँ उन्होने स्त्री को स्त्री नहीं रहने दिया। उसकी इच्छाओं का अधिकारों का कोई मूल्य नहीं। वह यहाँ उपभोग की वस्तु से जादा कुछ नहीं है। उसकी हैसियत हमारे बीच मात्र शोषित की है। प्रताड़ित की है। यह कहानी उसके दुख की है शोक की है। उसके हिस्से केवल कष्ट पीड़ा यातनाएँ उपेक्षा है। जहाँ साँस भी पूछ के लेनी पड़ती है। फ़िल्म आगे भी बहुत कुछ लिए हुए है। ख़त्म नहीं हुई है। पिता के वापस आने के बात जीवित लड़की के श्राद्ध तक। एक पुरुष पिता की भूमिका में वह, अपनी लड़की जो कि स्त्री भी है, उसका त्याग कर देता है ताकि वह समाज में सिर उठा कर चल सकें। कोई उसपर अपनी लड़की का पक्ष लेने का आरोप न लगाए। वे निष्पक्ष हैं। तटस्थ नहीं। यह उनकी व्याख्या है। जहाँ उनकी पुत्री के लिए भी जगह नहीं।

लेकिन उस वाले हिस्से को अभी छू नहीं रहा। आगे।

फ़िर बातें अभी भी बहुत हैं जो लगातार दिमाग में चल रही हैं। बेतरतीब। पर रात जादा हो गयी है। और ठंड भी। पैर में मोज़े के बाद भी वह गल रहे हैं। डेढ़ बजने वाला है। खिड़की खुली हुई है। हवा अभी नहीं है। एक और फ़िल्म याद आ रही है। दीप्ति नवल की। उसके बारे में भी कहने का मन था पर अभी नहीं। इस फ़िल्म के बारे में और ख़ुद दीप्ति की रेंज पर कम ही बात हुई है। उन्हे हमेशा शबाना आज़मी से कमतर मानने का आग्रह खटकता है। अभी नहीं, जल्द..

{दीप्ति की फ़िल्म, 'मैं ज़िंदा हूँ ' का संदर्भ..इसकी अगली कड़ी, जो जोड़ सकें उनके लिए.. }

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