नवंबर 27, 2013

हम दोनों थोड़े खोये-खोये से हैं..

कितना अच्छा होता न कि मैं यहाँ लिख रहा होता और बिलकुल इसी वक़्त तुम्हारी आँखों के सामने खुली किताब में वह दिखते जाते। एक-एक शब्द मेरी लिखाई में वहाँ छपता जाता। स्याही अभी सूखी भी न होती। इतनी तेज़ गति से वह तुम तक पहुँचते जाते। तुम उन्हे छूती तो लगता गाल छू रही हो। बड़े आहिस्ते से। वहीं तुम्हारा हाथ पकड़ लेता। कुछ देर छोड़ता नहीं। तुम कुछ कहती नहीं। बस उस स्पर्श को हृदय में सँजोती रहती। और वहीं पास होती मेरी आवाज़। वह सारे शब्द उन्ही अहसासों से भरते जैसे उन्हे लिखते हुए महसूस करते गुज़रते रहे हैं। फ़िर जैसे तुम होती जाती, वैसे ही इधर मैं भी होता जाता। जानने से भी पहले हम ऐसे होते गए हैं। 

प्यार ऐसे ही एक दूसरे के दिल की तरह होते जाना है। एक दिल में दूसरे दिल का घुलते जाना। खोये-खोये से रहते हुए भी पास रहना। इतने पास कि धड़कन भी सुनाई दे जाये। वहीं पास धीमी-सी भीनी-सी गंध होती। जो तैर जाती। कान के पास से जैसे हवा तैर जाती है कभी-कभी। कभी लगता के अभी कोई छू के गुज़रा है। छू के गुज़रना उन एहसासों से। बार-बार।

यह दूरी रोज़ ऐसे ही रचती रही है। इंतज़ार के उन पलों में जितना अकेला होता जाता हूँ, उतना ही तुम पास चली आती हो। जैसे अभी एक पल बाद जब आँखें खुलेगी, पास तुम होगी। पता नहीं कितनी दिन में ऐसा कितनी बार करता हूँ। तुम्हें बिन बताए। बिन कहे। देखता रहता हूँ तुम्हारा चुप-सा होते जाना। कुछ न कहना। इन पंक्तियों की तरह इंतज़ार करते रहना। अनमने से उठना। बैठ जाना। जैसे उस तस्वीर में जो छत पर खींची थी। यहाँ आने से पहले। तुम्हें साथ लिए नहीं चल रहे थे। बस तस्वीर जा रही थी। तुम कोहनी घुटने पर रखे, हाथ को गालों के पास लाकर बैठी हुई हो। उदास। खोयी हुई। कहीं और देखती-सी। इतनी उदास तुम्हें कभी नहीं देखा। वह अकेले हो जाने की हद तक अंदर जाकर धँस जाता है। लगातार तोड़ता है। पर इसे याद नहीं रखता।

याद रखता हूँ वह तस्वीर जिसमे हम अगल-बगल हैं। तालाब किनारे। वहाँ कछुए हैं। हम उनका इंतज़ार कर रहे हैं। इस बहाने भी साथ हैं। वह बाहर निकलेंगे, तो दिखेंगे। गर्मी का सूरज है। हवा चल रही है। तुम्हारा दुपट्टा उड़ रहा है। तुम उसे संभाल रही हो। और अचानक वह फ़ोटो खिंच जाती है। उसे संभालते वक़्त का चेहरा वह क्षण बार-बार खींचे लेते हैं। के कैसे इतनी जल्दी दिन उड़ गए। यहाँ से लेकर तो बहुत गया था। पर जल्दी से उड़ते गए। उन्हे थोड़ा और रोक लेना था। मिलकर। मिलकर कुछ और रातें साथ छत पर बैठते। उन सुनसान-सी चुप-सी उपस्थिति में गुम से होते एक दूसरे को देखते रहते। देखते रहते उन रातों का और रात होते रहना। 

कुछ हज़ार ख़्वाहिशें हैं। दम निकालती। उन्ही में हमदोनों कैसे-कैसे होते जा रहे हैं। एक ही तरह। एक ही इंतज़ार। वस्ल की राहत। इसी इंतज़ार में खोये-खोये से। बेतरतीब। बेपरवाह। उकताए से। सिलवटों जैसे। किसी को समझ नहीं आ रहे। बस ऐसे हो गए हैं। उलझे-उलझे से। अबूझ। पहेली की तरह। जिनके जवाब हम दोनों हैं। हम एक-दूसरे की तरफ़ खिंचते जा रहे हैं। बड़ी आहिस्ते-आहिस्ते। डोर से बंधे। उसकी झंकार सुनते-सुनते जा रहे हैं उन दिनों की तरफ़। जहाँ दोनों साथ होंगे। साथ होंगी अनगिन यादों बातों सपनों की पोटली। पोटलियों की तहें। तुम आ जाओ। तब देखें और क्या-क्या है उनमे ख़र्च करने लायक। 

परसो शाम आवाज़ और उदास कर गई। अंदर तक खाली होता गया। के तुम आओ तो भर लूँ अपने आप को। इस अकेलेपन में हम साथ हैं। पर साथ नहीं हैं। यह उदासी स्थायी भाव नहीं है। पर है। पता है जल्द दिन ऐसे नहीं रहेंगे। यह रातें करवटों की तरफ़ सिलवटों को बुनती रहेंगी। सुबहें उबासी की तरह नहीं खुलेंगी। लेकिन इन दिनों की होती शामें कुछ अजीब सी हैं। जब अँधेरा जल्दी होकर अपने अंदर किए लेता है, तब यह एहसास सबसे जादा दिल में घूमता कचोटता है। पास क्यों नहीं हैं। उस अँधेरे में उभरती छवियाँ जितना बुनती नहीं, उससे जादा, उस ताने बाने की सीवनों को बड़ी बेदर्दी से तोड़ती हैं। दर्द होता है। उसे सहन करना आसान नहीं। नहीं कर पाते। तब बुनते हैं सपनों की किश्त। यही तो हैं जो हरबार बचा लेते हैं। दोनों तरफ़ से उन अनकहे ख़्वाबों की ख़ुशबू दोनों को साथ महकाती रहती है। हम साथ होंगे। साथ होंगे यह सारे सपने। बोले अबोले। कहे अनकहे। उन्हे हर शाम दोहराते हुए। हर रात देखते हुए।

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