नवंबर 03, 2013

बीच-बीच में थोड़ा बहुत पढ़ते हुए

उस दोपहर राजेश जोशी की एक कविता का नाम यादकर लौटा। घर पहुँच उसे खूब ढूँढा। नहीं मिली। कविता में एक ‘प्लेटफॉर्म’ की बात थी। बात क्या थी याद नहीं। पर उसे दोबारा पढ़ लेने का मन था। जहाँ-जहाँ मिल सकती थी, देखा। नहीं मिली। दिल थोड़ा बैठ गया। मन मान नहीं रहा था। बड़ी देर तक बैठा रहा, क्या किया पता नहीं। बस अपने मन में ऐसे ही किसी सुनसान से ‘प्लेटफॉर्म’ को सपनों में बराबर खोजता रहा हूँ। अभी तक वह कहीं नहीं मिला है। बस उस अनछूए से एहसास की तरह बचाए रखा है। वहाँ खाली बेंच को दूर से ऐसे ही देखता रहा हूँ।

फ़िर काफ़ी दिनों से कुछ अच्छा पढ़ा नहीं था। उस बार असगर वजाहत का नया कहानी संग्रह ‘डेमोक्रेसिया’ दिखा। ले आया। कुछ उम्मीदें थी। मन था। किताब शुरू की भूमिका से। लेखक क्या कह रहा है? अख़बार होती दुनिया में कहानी लिखना मुश्किल होता गया है। ख़ुद को भी अख़बार जैसा लिखने से लगातार बचाना है। उसी के बीच कहीं कुछ कहा जाएगा तो ज़रूरी नहीं कि वह बचा रहे। ब्योरे उसे दबा ले जाएँगे। यह समकालीन तथ्यों के बीच से अपने को बरत ले जाना है।

वहाँ एक कहानी थी ‘दिल की बात’। शुरू इसी अख़बार से होती है। इसी की सुर्खियों के साथ। बाढ़ आई। लोग मर रहे हैं। जगहें डूबती गईं। सरकार ने कई हज़ार करोड़ के राहत पैकेज़ की घोषणा की। कहानी का पात्र इसे उलटबाँसी की तरह पढ़ता है। लोगों ने सरकार के लिए करोड़ों रुपयों की राहत घोषित की। संकट यहीं से शुरू होता है। आप सत्ता के साथ नहीं हैं। उसके सच को नहीं मान रहे हैं तब आपका जीना मुश्किल है। आपको जीने नहीं दिया जाएगा। लगातार प्रताड़ित किए जाते रहेंगे। एक दिन ऐसा आएगा जब आपका अस्तित्व ही नहीं रहेगा। यहाँ से गायब कर दिये जाएँगे। कहीं कोई आवाज़ नहीं आएगी।

इसे उन सारी आवाज़ों के साथ जोड़कर भी पढ़ा जा सकता है जिनके नाम उन अख़बारों में कहीं नहीं चमकते। वे विरोध में हैं। उनके साथ नहीं हैं। इसलिए स्याही सूख जाती है। लोग नाम भी नहीं लेते। डर जाते हैं। यह छींकना नहीं, उसका निषेध है।

अरुण प्रकाश का कहानी संग्रह है ‘स्वप्न घर’। पहली बार उन्हे पढ़ रहा था। कभी ‘बया’ में इनका लिखा बचपन का संस्मरण दिखा था। शायद इन्हे पढ़ने के दौरान ख़ुद परेशान सा था इसलिए दुख जादा तोड़ रहा था। इनकी कहानियाँ दुख की कहानियाँ हैं। जब हम ऐसी पंक्तियाँ पढ़ रहे होते हैं तो अंदर तक टूट रहे होते हैं। सारे पात्र बड़े आम से हैं। पास के। लगा यह ताकत नहीं दे रहे, उसे अंदर से खींचे ले रही हैं। इस दुनिया को और कठोर निर्मम स्थल की तरह दिखाती चलती हैं। ‘अच्छी लड़की’ से लेकर ‘जल प्रांतर’ तक सब। यह उनका भोगा हुआ शोक है। यह उनका सामूहिक गान है। विरुदावली है। 

इधर अब जबकि नेता इतिहास को अपनी तरहों से कई परतों में मोड़ रहे हैं। उसमे से कई हिस्सों को जानबूझकर छुपा ले जा रहे हैं वहाँ अरुण प्रकाश की कहानी ‘भैया एक्सप्रेस’ याद आती है। भाई पंजाब में कहीं किसी बड़े किसान के यहाँ मुलाज़िम है। वहाँ से हर महीने मनीऑर्डर करता है। गाँव में उसकी माँ इन्ही पैसों से अपने सपनों को सींच रही है। बहू का गउना करा लाएगी तो उसका भी कुछ काम बंट जाएगा। घर थोड़ा और भरा भरा लगने लगेगा। दुख आसानी से कट जाएगा ज़िंदगी की तरह। पर अचानक भाई की चिट्ठी आना बंद हो जाती है। भाई कहीं गुम हो गया है। कहाँ गुम हुआ है पता नहीं। माँ कुछ रुपयों का जुगाड़ कर छोटे को वहाँ भेजती है जहाँ बड़कउ काम करने गया था। कहानी में धीरे धीरे खुलती है। एक-एक कर जब वह बताती है तब उस विद्रुप में माँ का चेहरा झिलमिला जाता है। भाभी जो अभी अपने मयके है उसकी हालत सोच रुलायी छूटने लगती है। कैसे इतने बड़े सच को पोटली बनाए वह पंजाब से लौटेगा। कैसे कहेगा उसका भाई अब कहीं नहीं है। मर गया। सारे सपने मर गए। वह सब मर गए। यह मरना दूर गाँवों के मरने जैसा है। दिखता नहीं। पर वह मरते ज़रूर हैं। 

कथानक कहीं भी नहीं कहता यह किस कालखंड की कहानी है। उसे कोई नकली ब्योरे की तरह अपने आपको नहीं कहना है। उसे नहीं कहना है के कर्फ़्यू क्यों लग रहा है। सड़कें क्यों वीरान हैं। क्यों दंगाई एक धर्म-विशेष के लोगों को चीन्ह उन्हे मौत के घाट उतार रहे हैं। पर इसी अपहचानी पहचान में रामदेव का भाई विशुनदेव भी मार दिया गया है। उसकी तरह कईयों को सिर्फ़ मारने के लिए मार दिया गया। दिल्ली की सड़कें भी पंजाब की सड़कों की तरह डरा रही हैं। यह सच को छिपाना नहीं है। उसे उघाड़ देना है। यह निर्मम होते जाना है। बताना है यही सच है जिसे तुम छिपा रहे हो। इस छिपे को ही बार-बार पढ़ना है। 

और उस नेता विशेष को तो यह कहानी ज़रूर पढ़नी चाहिए जिसने लगता है हमारे देश का इतिहास कभी नहीं पढ़ा ही नहीं है पर इधर की चुनावी रैलियों में बड़े भावुक ढंग से यह कहता पाया जा रहा है कि इन्होने मेरी दादी को मारा। मेरे पिता को मारा। एक दिन मुझे मार देंगे। सिर्फ़ इतना कह भर देने से हमारी कमज़ोर याद्दाश्त सब तरहों से उन सत्यों को भूल जाने के लिए कह देगी। इतना आसान तो नहीं लगता। हम उसे बराबर याद करते रहेंगे। याद दिलाते रहेंगे।

यह समय किसी भी तरह से न तो अति-राष्ट्रवादी हो जाने का है न ही भावुक होकर कुछ भूल जाने का।

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