नवंबर 22, 2013

स्त्री तुम केवल देह नहीं हो

कभी-कभी लगता है हम अपने आप को दोहरा रहे होते हैं। बार-बार वैसी ही बातें। उन्ही तरीकों से अपने को कहते हुए। जैसे कल। रात लिखने के दरमियान बराबर लगता रहा क्या कर रहा हूँ। जो मन में चल रहा है उसे कह क्यों नहीं पा रहा। अगर वह आ भी रहा है तो कितना। कैसे। क्या उसे ऐसे ही आना था। क्या है जो उन शब्दों के पीछे छिप गया होगा। किसे जानबूझकर नहीं कहा होगा। यह सिर्फ़ ख़ुद को बचाए रखने की चालाकियाँ हैं। जिन्हे लिखने वाले बख़ूबी जानते हैं। उन्हे पता है वह क्या कर रहे हैं। कौन से हिज़्जे कैसे बुने हैं और उनमे क्या नहीं कहते हुए भी कह दिया है। किसे कितना कहते नहीं कहा। अगर ऐसा न हो तो इसके बिना लिखना जीने की तरह नहीं लगता। सारा कुछ कहना भी कौन चाहता है। कभी हमसे भी तो आमने सामने की मुलाक़ात करो। पूछो तो क्या बात है। पर नहीं ऐसे कभी कोई नहीं मिलता।

हम बातों से बचते क्यों हैं। उन्हे कह क्यों नहीं देते। उनका कहा जाना हमें किसी अनिश्चय में क्यों डालता रहा है। हम कभी मौके ही नहीं बनाते। कभी कहने की सुनते ही नहीं। 

बड़े दिनों से सोच रहा हूँ। के कह दूंगा । कहना पूछने की तरह है। क्योंकि इसके कई सारे जवाब आज तक टकराए और लगातार टकराते रहे हैं। यह ‘आदिम इच्छा’ है जो हमें कभी कभी ‘ख़ालिस मर्द’ बनाती है। ‘मर्द’ लिखना ही ‘पुरुषसत्तात्मक विन्यास’ को पकड़ लेना है। मर्द को दर्द नहीं होता। वह अपना लिंग लिए घूमता रहता है। वह ढका रहता है। पर तना रहता है। यह किसी भी स्त्री को मात्र देह मान उसे भोगने की इच्छा है। अगर इसे ही बड़े ढके-ढके स्वर में पूछा जाता, तो शायद, वह कुछ इस तरह होता, के ‘पुरुषों का स्त्रियॉं के प्रति आकर्षित होने का कारण क्या है’? कारण बहुवचन में नहीं हैं। इसलिए उत्तर भी इस वचन में नहीं हो सकते। ऐसा पूछना ही बौद्धिक चालाकी है। आपको कोई मौका न देना है। शुरू से ही एक ही उत्तर की अपेक्षा। कहीं से भी दायें बाएँ न होने की गुंजाइश। यही अंदर उस पुरुष को खोजना है, जो उनकी पूर्वधारणा में ‘ख़ालिस’ है।

यह उत्तर आधुनिक विमर्श ही है जो इतना ‘स्पेस’ दे रहा है। उसी को खोल बनाकर यह सवाल ख़ुद से पूछता हूँ। इसे ‘टेक्स्ट’ की तरह पढ़ रहा हूँ। के इस सवाल का मेरे पास क्या जवाब है? कोई जवाब है भी या वह बनने की प्रक्रिया में है। वह जैसा है, उसे वैसा ही कह भी पाऊँगा। इतना साहस मेरे अंदर किस हद तक है। कई सवालों के जवाब कभी कभी ख़ुद को देने पड़ते हैं। जितना ईमानदार ख़ुद से कोई हो सकता है उतना शायद ही किसी से हो पाये। इसलिए जब कभी भी यह द्वंद्व की स्थिति मेरे सामने आती है तो इसका एक ही जवाब मेरे हिस्से पड़ता है। बार-बार। शायद यह पढ़-लिख जाने के चलते है या फ़िर मेरे ऐसे होते जाने का कोई कारण अभी पास नहीं देख पाता। एक परत लगातार हम ओढ़े रहते है, चादर की तरह।

के मेरे यहाँ आकर्षण कभी देह को लेकर नहीं हुआ। सच में। कभी ख़ुद से झूठ नहीं बोलता। पता नहीं ऐसा कब से हूँ। शायद जब से किसी लड़की को देख अनदिखी हरारत से भर जाने की शुरुवात हुई हो, तब से..पता है मैं क्या चाहता था? किसी लड़की का साथ। साथ सिर्फ़ हमबिस्तर होने तक नहीं, ज़िन्दगी भर तक। ऐसा नहीं है के मेरे यहाँ प्रेम ‘अशरीरी’ ही रहा, पर वह दिखता ही ऐसा है। उसे दूसरों ने ऐसे ही पाया। छूने न छूने के द्वंद्व कभी दिलो दिमाग में नहीं चले। शायद एकांत के अभाव में उन अनहुई मुलाकातों के बाद यह विचार मेरे पास आया हो..पर कभी ऐसा सोचा नहीं। यह शायद मेरी ख़ुद से ख़ुद की नैतिकता है। यह कुछ कुछ लिजलिजा सा भी है। कमज़ोर-सा। तोड़ता-सा। मैं इंतज़ार कर रहा था किसी ऐसे का जो करीब हो। जो मेरी बात सुने। हम दोनों आने वाले कल को बड़े आहिस्ते से एक-दूसरे में बुनते रहें। कहीं कोई धागा न चिटक जाये, इतनी सावधानी के साथ। चुपके से एक-दूसरे को जानते हुए। एक-दूसरे के हिस्सों को अपने में शामिल करते जाएँ। जितना अपने में हम हों उतने ही वह साथ चलने वाला। किसी भी राज़दारी के लिए वहाँ कोई जगह नहीं। बस हों ढेर-ढेर अनगिन सपने।

कभी कहता नहीं। पर अब कह दूँ। के किसी ज़माने यह देह बीच में आ गयी थी। कई साल हुए। उसे याद करने का मन भी नहीं करता। बस हवाला दिये देता हूँ। कोई नाम नहीं है। बस एक ख़याल। शायद सपना छिपा रहा हूँ। एक दिन अचानक ऐसे ही मन में आया। जिस लड़की की तरफ़ में खिंचा चला जा रहा हूँ उसके लिए सच में प्रेम करता हूँ भी या ऐसे ही। यह कितना जैविक है और कितना शारीरिक। कहीं मैं भी उन्ही लड़कों की तरह उसके साथ कुछ दैहिक क्रियाओं के बाद अलग हो जाने वाला हूँ। पता नहीं इस बात ने मुझे कैसे गढ़ा। शायद अजीब तरह की ग्रंथि से भर दिया। यह ऐसे लड़के की तरह बड़े होना था जिसकी पढ़ाई लड़कों वाले स्कूल में हुई थी। वह उन अहसासों से भाग लेना था। जो किसी लड़की के लिए महसूस होना उतना ही स्वाभाविक था जितना कि सांस लेना। पर समझ नहीं सका। एक झटके से लड़कियों के लिए किन विचारों से भर गया था। क्या यह उन अजनबी स्पंदनों का निषेध था। ख़ुद को खोह में समेट लेना। जिसने मुझे सहज नहीं रहने दिया। मैं लगातार बचने लगा। लगता कहीं इस या उस लड़की की तरफ़ जो महसूस कर रहा हूँ, वह उसकी देह का आकर्षण तो नहीं। जहाँ पहुँचकर प्रेम अपने आप मर जाएगा।..

राकेश आज इस पढ़ते हुए इसी तरह कहेगा, ‘तुम हमेशा से अतिवादी ही रहे’! कभी खुले नहीं। तुमने जितना प्रेम नहीं किया उससे जादा उस पर विचार किया। किसी लड़की से बात करना उससे दैहिक प्रस्ताव करना थोड़े है। बात दोस्त समझकर ही हो सकती है। यही सबसे बड़ी गलती रही के यह कभी नहीं सोच पाया। जो मुझमे उस आत्मविश्वास को लगातार कम करती रही जिसके बल किसी लड़की से बात भी करता। उन बातों के दरमियान बड़ा सचेत रहता के कहीं उसकी देह, कहीं खींच न ले। इसने जितना बनाया नहीं उससे जादा बिगाड़ा। मैं किसी लड़की से बात करने लायक ही नहीं रहा। अपने में ही उलझा उलझा सा। किन्ही उधेड़ बुनों में अरझा सा। इससे निकलते निकलते आज यहाँ पहुँचा हूँ जहाँ मेरे हिस्से दो-तीन ऐसी दोस्त हैं जिनसे कुछ भी कह सकता हूँ। बोल सकता हूँ। सीमाओं के अंदर सीमाओं के बाहर।

पता नहीं शाम क्या लिखने बैठा था क्या लिखता चला गया। फ़िर तो जो जैसा आता गया उसे रोका नहीं। रोकना चाहिए भी नहीं। किसी का डर होता तो कभी एक पंक्ति भी नहीं लिख पाता। जो कह दिया है उसे संपादित करने का मन भी नहीं है। जो जैसा आया वैसा ही रहने दिया है। बस अभी जा रहा हूँ। पानी भरना है। साढ़े पाँच हो रहे हैं। जो सोचकर लिखने बैठा था उसे फ़िर कभी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी शैली का मुरीद रहा हूँ, बाकी जैसे अभी कितना कुछ लिखा जाना बाकी हो।

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    1. कुछ कहने की हिम्मत बनी रहे और शब्द आते रहें, यही सोच कर लिखता रहता हूँ, फ़िर भी अभी आज इसके हिस्सों को पढ़कर लगा जो बच रहा है या नया जुड़ा है, इन दो सालों बाद उसे भी आना चाहिए।..

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