नवंबर 08, 2013

उनके हिस्से का बहराइच..

बहराइच कभी-कभी जनसत्ता में नज़र आ जाता है। अधिकतर वहाँ संजीव श्रीवास्तव होते हैं। और ख़बरों में सागौन की लकड़ी की तस्करी से लेकर दुधवा नेशनल पार्क। कभी घाघरा नदी की बाढ़ भी बनी रहती है। कमाल खान भी इकौना जाकर रिपोर्टिंग कर आए हैं। उन्होने ही बताया था कि यहाँ से दो बार विधायक रहे भगौती परसाद जिला अस्पताल में मौत से लड़ते हुए हार गए। पर इधर हमारा बहराइच ख़बरों में कुछ जादा ही बना हुआ है। अभी जब लैपटॉप ऊपर ला रहा था तब भी इसकी ख़बर चल रही थी। आज वहाँ एक धीर-अधीर बड़े से नेता की बड़ी-सी रैली थी।

यह एक तरह की दावेदारी है। जिस पर अभी कोई और दावा नहीं कर रहा है। अभयकुमार दुबे कल टीवी पर कह रहे थे, यह ऐसी दौड़ है जिसमें उन्होने बहुत पहले से अकेले दौड़ना शुरू कर दिया है और दूर-दूर तक कोई प्रतियोगी अभी तय्यार नहीं है। जो हो सकते हैं उनकी रणनीतियाँ आगे आने वाले दिनों में स्पष्ट होंगी। बहरहाल।

हम दिल्ली में बैठे इंतज़ार में थे के यहाँ से चलने वाले चैनल हमारे बहराइच को कैसे दिखाते है। वहाँ के लोग वैसे ही दिखते हैं न जैसे आजतक हम देखते रहे हैं। यह पता नहीं कैसा भाव था जो अंदर ही अंदर बस खींच रहा था। यह भी सोचता रहा यहाँ से कौन-कौन लोग वहाँ के लिए निकले होंगे। वह उस जगह को जानते भी होंगे या ऐसे ही ‘आउटिंग’ के इरादे से चल पड़े। थोड़ी बहुत पड़ताल तो की ही होगी। कहाँ जा रहे हैं। कि वक़्त रहा तो क्या-क्या घूमेंगे। इस सबके दरमियान लगातार भूले हुए था के रैली ‘कवर’ करने आए लोगों को जगह से कोई ख़ास वास्ता नहीं होता। उनके लिए ज़रूरी है ‘कवरेज’। कैमरा पोजीशन।

वे लोग कोई डॉक्यूमेंटरी तो बनाने गए नहीं हैं। उन्हे वहाँ के घंटाघर, छावनी चौराहे, निगम पान भंडार, आनंद होटल से क्या मतलब। वहाँ का रेलवे स्टेशन भी सीधे दिल्ली को नहीं जोड़ता। एक तरफ़ मैलानी रुपईडीहा है तो दूसरी तरफ़ गोण्डा। पता नहीं उन्हे पता है या नहीं के यहीं पास में श्रावस्ती भी है। ज़रा सहट-महट ही घूम आयें। गौतम बुद्ध ने कई चौमासे यहाँ बिताए थे। दरगाह मेला भी तो नवंबर में नहीं होता। जेठ में था, खत्म हो गया। प्रेमचन्द भी कुल तीन महीने ‘महराज सिंह इंटर कॉलेज’ में रहे थे। उसे ही ‘शूट’ कर लें। थक गए हों तो छावनी के ‘लोटस’ जाकर दिल्ली वाला खाना भी खा सकते थे। और मन कर देता तो कचहरी रोड के हरीश की लस्सी पी लेते, तो सालों याद रखते, कि कहीं लस्सी पी थी।

पर कैमरा कहाँ तक पैन होता? यहाँ पटना या गोरखपुर की तरह शहर के बीचों बीच किसी गाँधी के नाम पर इतना बड़ा मैदान नहीं है। पता नहीं जब राहुल गाँधी यहाँ आए थे तब उन्होने इसपर शोक जताया था के नहीं। उन्हे तो यह भी याद नहीं आया होगा के जिन दादी की हत्या का ज़िक्र किए फ़िर रहे हैं वह गिलौला भी होती आयीं थी। फ़िर भी ट्रेन वहाँ नहीं पहुँची। न टण्डन जी ने वहाँ से बायपास ही निकलने दिया। क्या यहीं का पानी पीकर उनका पेट ख़राब हुआ था जिसके बारे में वे पीछे कह रहे थे।

ख़ैर, जिस सड़क किनारे बड़े से मैदान में यह जमावड़ा सशर्त होना तय हुआ उसपर आगे चलते-चलते हम नानपारा पहुँचेंगे। नानपारा हमारी चाची का मयका है। और बहुत पुरानी-सी याद में वहाँ एक राजा का बड़ा-सा महलनुमा घर है। जिसमे कई छोटे-बड़े पक्के तालाब हैं। नीले रंग की आभा में हरी हरी काई अभी भी कई बार दिख जाती है।  उन्ही में से एक की तरफ़ उँगली बढ़ाते हुए बीना के मामा कहते हैं, यहाँ पान भी उगाया जाता है। हम तब बहुत छोटे छोटे थे। नहीं पता था के पान वहाँ की मंडी में कलकत्ते से बड़े सलाहियत से आता है। के सूखने न पाये। कैसे बड़े-बड़े झऊओं में उन्हे तरतीब से रखे रहते हैं। फ़िर वहीं से नेपालगंज गए। वहाँ से काला राजमा लाये थे। पता नहीं उनका स्वाद कैसा था। पर खड्खड़े की आवाज़ अभी भी बुला लेती है।

आजकल वहाँ से एक नाम कईबार ‘हंस’ में दिख जाता है। आज ‘नया पथ’ में ‘हुस्न तबस्सुम निहाँ’ की एक कहानी आई है। ‘स्वप्निल कैनवास के धुंधले धुंधले रंग’। वहीं नीचे उनका नंबर भी है। पर कभी मिलाया नहीं। हिन्दी समय पर उनकी कुछ और कहानियाँ दिखी। अभी पढ़ी नहीं है। कभी मन में ख़याल आता है इन कहानियों में उनका बहराइच कैसे धड़कता होगा। एकबार स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित ‘नीले पंखों वाली लड़की’ इसलिए उठा लिया था के उसमे अपने हिस्से का बहराइच देख सकूँ। एक दो कहानियों पर कभी कुछ लिखा भी था। शायद ‘कथादेश’ में कोई कहानी थी उसपर। कभी मौका बनाऊंगा सिरे से उनसे गुज़रते जाने का मन है। वह वैसा तो बिलकुल नहीं होगा जैसे यह भगवा आँखें देखती हैं। वह इसे बाँटती नहीं होंगी।

इतना सब होने पर भी जब वहाँ यह रैली घटित हो रही थी, तब छत पर सो रहा था। खाना खाने के बाद इन ठंडे दिनों की नींद की बात ही कुछ और है। अभी लिखने से पहले ‘यू-ट्यूब’ पर इस रैली का विडियो देख रहा था कोई दो घण्टे की स्ट्रीमिंग है। सफ़ेदे के पेड़ों के बीच। सूरज वहाँ भी नहीं निकला है। औरतें पैर ऊपर कर कुर्सियों पर बैठी हैं। पुरुषों के किन्ही हाथों में फूल वाले झण्डे है। पर कौन इतना वक़्त ज़ाया करे। किसे गरज़ पड़ी है कि देखे वह मेरे बहराइच को कितना जानते हैं। जो राजा सुहेल देव के बरक्स महमूद सालार की दरगाह को रखे उसे सुनकर भी क्या हो जाने वाला है। कुछ नहीं।

बस अभी दोपहर में पढ़ी असद ज़ैदी की कविता घूम रही है। ‘आम चुनाव। उसकी अंतिम पंक्तियाँ हैं: ऐ भली औरतो ऐ सुखी औरतो/ तुम जहां भी हो/ अगर वोट/ डालने निकल ही पड़ी हो/ तो कहीं भूल के भी न लगा देना/ उस फूल पर निशान।

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