दिसंबर 02, 2013

लड़की होना पर लड़की जैसी दिखाई मत देना

इस जगह जहाँ हम हैं वह कैसी है। इसे ऐसे पूछना चाहिए के यह हमारे लिए कैसी है? जगह या तो हमें ‘स्पेस’ देती है या नहीं देती। यह देना न देना गुणात्मक रूप से कैसा है? किन भूमिकाओं को वह बल दे रहा है। जब यह संचार माध्यम में हो, तब इसका जवाब इतना एकरेखीय नहीं हो सकता। इसके आयाम और गतिकी लगातार हमें गढ़ रहे होते हैं। इस वर्तमान तंत्र में यह ‘माध्यम’ मूलतः यथा स्थितिवादी ही बने रहते हैं। जैसे अगर यह देखा-जाँचा जाये कि हमारे ‘पुरुष’ होने में इनकी क्या भूमिका है? ‘लड़का’ होना कितनी सुविधाओं से भर जाना है। यह इसी अनुपात में समाज में आरामदायक स्थिति में पाये जाना है। कितनी ही सहुलियते बिन माँगे मिलती रहती हैं। यह बड़ी बारीकी से अपना पुनरुत्पादन करता रहता है। हमारे बीच जगह बनाए रहता है। इस सामाजिक ढाँचे ने ख़ुद को बचाए रखने की यही युक्ति अपनाई है।

इसी टेलीविज़न पर इधर एक विज्ञापन तैर रहा है। उसमें रणबीर कपूर हैं और शायद ‘रॉकस्टार’ फ़ेम वही हीरोइन। नर्गिस फाखरी। लड़की खड़ी है। इंतज़ार कर रही है। लड़का देर से आता है। वह अकेली क्यों नहीं चली गयी यह अलग पूछे जाने लायक सवाल है। पर अभी नहीं। नीचे। वह पीछे बैठे-बैठे सवाल करती जा रही है। ‘लुक आय एम नॉट कमफ़र्टेबल’। लड़का कहता है, इतना आरामदायक तो है। लड़की बात दोनों के भविष्य की कर रही है पर रणबीर की हर बात उस ‘हीरो मायस्टरो’ से आगे जा ही नहीं रही। पीछे बैठी लड़की फ़िर पूछती है, ऐसा कब तक चलेगा? लड़का फ़िर कहता है, दूर तक। वह फ़ंकी टाइप कपड़ों में है। उसकी शर्ट ऐसी है जैसे किसी ज़माने में बर्फ़ी के डिब्बे पर चढ़ा कागज़ का कवर। नीचे उतर वह घुटने तक ऊपर चढ़ी जीन्स नीचे उतार रहा है। और वह कहती है, कभी तो ‘सीरिअस’ हो जाओ। लड़का चश्मा उतार एक क़दम पास आकार आँखों में आँखें डाल अचानक कहता है, ‘मैरी मी..’!! यू आर नॉट सीरिअस। लड़की कहती है और लड़का लड़की का हाथ पकड़ता है। फ़िर दोनों अंदर की तरफ़ चल पड़ते हैं।

देखने-सुनने में यह दृश्य संवाद बड़े सरल सहज लगें पर गहराई में यह उतने ही पुरुष-सत्तात्मक चरित्र लिए हुए है। जहाँ रणबीर कपूर वापस पीछे आते हैं और उनकी ही आवाज़ का वॉइस ओवर कहता है, ‘बॉय्ज़ की लाइफ और मायस्टरो की राइड ईज़ी है’। ‘सच आ बॉय थिंग’। अब यहाँ विखंडित न भी करें तो यह दिख ही रहा है के कैसे उस विज्ञापन को गढ़ा गया है। जहाँ लड़की अपने अनिश्चित भविष्य को लेकर चिंतित है। बार-बार सवालों से किसी जवाब पर पहुँचना चाहती है। एक तरह से यह पुरुष की इच्छा पर आश्रित होने की तरह लगने लगती है। स्वयं उसकी इच्छा जैसे उसके लिए कुछ मायने ही न रखती हों। यह हमारे समाज का एक ‘पाठ’ है जहाँ लड़कियों के लिए किसी बंधन की ज़रूरत उन्हे महसूस होती है और उनके समानान्तर लड़के जादा स्वतंत्र रहते हैं। स्त्री अपने लिए जगह बना ही नहीं पा रही। प्रियंका चोपड़ा की ‘स्कूटी’ इसका मुक़ाबला नहीं कर पाएगी। यह पुरुषों का पुरुषों द्वारा संचालित सामाजिक ढाँचा है। यहाँ उनकी पैकेजिंग कुछ अलग हाथों से होती है। शर्तिया यह हाथ पुरुषों के हैं। दिमाग तो हैं ही। 

इससे अलग वास्तविक दुनिया कितनी विद्रुप है, वह यहाँ नहीं दिखती। यथार्थ जितना कठोर है उसकी सघनता हमें कभी भी महसूस नहीं होती। यहाँ लड़कियाँ सच में जैसी हैं, वैसी इन माध्यमों में कभी नहीं आ पाती। वह कैसे अपना रोज़ाना गढ़ रही हैं। कितना कुछ उन्हे अकेले करना है। कितना वह करती हैं। यह नज़र कभी इन घटनाओं को अपने ‘उत्पाद’ के रूप में नहीं देखती। देखना चाहती भी नहीं। यह उसका अभीष्ट नहीं है। उस नज़र को इस पूंजीवादी तंत्र में यथास्थिति को बनाए रखना है। और प्रकारांतर से उन्हे मज़बूत करना। यह नियंत्रण और इस आवारा पूँजी का अपना पाठ है। जिसका नियंत्रण स्त्रियों के हाथों में नहीं है।

अभी उस दोपहर लौट रहा था। मेट्रो स्टेशन से गोल मार्केट की तरफ़। सामने से दसवीं ग्यारहवीं में पढ़ने वाली एक लड़की आ रही है। उसकी पहचान उसके स्कूली कपड़े थे। जर्सी स्कर्ट पहने थके कदमों से वह चल रही है। वह अकेली है। लड़के बड़ी देर से उसके अपने पास से गुज़रने का इंतज़ार कर रहे हैं। इस दरमियान मैं भी इतनी पास आ चुका था के उनके बीच होते संवाद को सुन सकूँ। उन दो में से एक लड़का बोला। ‘इधर देखती तो जा..आई लव यू बोल दूँगा..’!! लड़की कुछ नहीं बोलती। गर्दन झुकाये उनके पास से चुपचाप गुज़र जाना चाहती है। वह गुज़र जाती है। वह मेरे पास से भी गुज़री। बिन पलटे। बिन कुछ कहे। बिन कुछ बोले। उसका सपाट चेहरा देख लगा यह पहली बार नहीं है। ऐसा कई बार हो चुका है। होता रहा है। लड़की का अकेले होना उसे छेड़े जाने लायक बनाता रहा है।

जब कुछ दूर निकाल आया तब पीछे मुड़ा। थोड़ी देर रुक गया। एक नज़र उन लड़कों को देखता रहा। अब किसी भी तरह से पिटे जाने का ख़तरा भी नहीं है। वह अभी भी वहीं खड़े हैं। किसी और के ऐसे ही इंतज़ार में। वह ऐसे ही बोलते रहेंगे। वह ऐसे ही सुनती रहेंगी। सोचने लगा के उस लड़की को रोक पूछा क्यों नहीं। कि वह इन लड़कों को जानती है या नहीं। अगर नहीं जानती तब पुलिस में रिपोर्ट कर इनकी शिकायत क्यों नहीं कर देती। इन्हे ऐसे ही समझाया जा सकता है। पर दूसरे ही क्षण लगने लगता है कितना खोखला है यह विचार। पैबंद लगता। डैमेज कंट्रोल की तरह। अपने आप को बचाता। कि सब वैसे नहीं होते। मैं वैसा नहीं हूँ। वैसे भी मैं तुमसे उमर में कितना बड़ा हूँ। तुम्हें छेड़ूँ ऐसा भी नहीं हूँ। डरो मत। अपने अंदर साहस भरो। कह दो जो नहीं कह रही हो। उसे बता दो तुम भी बोल सकती हो। गाली दे सकती हो। यह चुपचाप गुज़र जाना प्रतीकार नहीं है। उन्हे बता दो तुम अब चुप नहीं रहोगी। बिलकुल नहीं।

और बीती शाम पहाड़गंज की किसी गली से गुज़रते एक लड़की पूरे मुँह को ढके किसी अनाम से होटल से निकली। पीछे दो लड़के जो अटेंडेंट लग रहे थे, उसका ऐसे जाना विस्मित होकर देखते रहे। साथ जो दोस्त था बोला 'कॉल गर्ल' है। यहाँ तो यह सब बिलकुल आम है। पर दिल में उसकी नीची निगाहें धँस गईं कि उस छिपा लिए गए चेहरे के बाद भी वह किसी से आँख नहीं मिला रही है। उसे अभी भी डर है। डर है कोई देख लेगा। और सबसे ख़तरनाक है इस बात का आम होना। वह जो इसके साथ कमरे में था थोड़ी देर बाद बिन मुँह ढके वहाँ से निकलेगा। उसे कुछ भी छिपाने की ज़रूरत महसूस नहीं होगी। तब भी यह आँखें उसे ऐसे देखेंगी। नहीं। उसे डर क्यों नहीं है। वह उस चली गयी देह का खरीदार है। फिर भी नहीं। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा। यही जवाब है। इन सब सवालों का।

अभी कहीं से कभी ऋतुराज की पढ़ी कविता की पंक्तियाँ याद आ रही हैं: ‘माँ ने कहा लड़की होना / पर लड़की जैसी दिखाई मत देना’। यही पंक्ति लिख क्यों ख़त्म कर रहा हूँ, पता नहीं..

{इस पोस्ट का एक छोटा हिस्सा 'हिंदुस्तान'के ब्लॉग कोने 'साइबर संसार' में छह दिसम्बर को 'साहस बटोरकर देखिये' शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ। वहाँ पढ़ने के लिए इसपर चटकाएँ। }

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