दिसंबर 13, 2013

सबसे ज़रूरी है इस रंग के मिथक का टूटना

कई दिनों से राकेश की बात घूम रही है। के हम लड़कों में गोरे रंग के प्रति इतनी तरह से पूर्वाग्रह पैठ बना चुके होते हैं कि हम लड़कियों में वही ढूँढते रहते हैं। बात किनसे करनी है, कैसी करनी है, कितनी करनी है। सब सवाल इसी रंग से निर्धारित होते जाते हैं। हम उसी लड़की को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करना चाहते है जो ‘गोरी’ हो। अगर यह लड़कों के मामले में चयन की सुविधा का प्रश्न है तब साँवली लड़कियों के चुने जाने की उतनी ही कम सम्भावना रहती है। प्रेम का प्रस्थान बिन्दु त्वचा का विशेष रंग ही होता है। कि अगर कल शादी की नौबत आ भी जाये तब वह अपने घर में कह सकें। गोरी लड़की है। चेहरा मोहरा भी ‘टिंच माल’ की तरह है। पूरे मोहल्ले में ऐसी शहराती लड़की मिल जाये तो नाम बदल लेंगे। अब हम शादी करेंगे, तो इसी से।

यह अपने आप में शोध का विषय है के टीवी में विज्ञापित गोरे होने वाली ‘क्रीम’ लगाने वाली कितनी लड़कियों के प्रेम प्रसंग चल रहे हैं। कितनों के साँवले होने के कारण नहीं चल पाये। इसे शिष्ट भाषा में पूछे तब यह कि लड़के उनकी तरफ़ कब आकर्षित हुए? उस क्रीम को लगाए जाने के पहले या उक्त क्रीम के प्रयोग के बाद? इसी समानुपात में यही प्रशनावली साँवले लड़कों से भी पूछे जाने लायक है। कि वह खुद को कब जादा लड़कियों से घिरा पाने लगे। कब लड़कियाँ आस-पास भिनभिनाने लगीं।

यह ‘रंगभेद’ उन लड़कों को किन तरह के भावों से भर देता होगा जिन्होने साँवली लड़की चुनी। या वह इतना पढ़-लिखने के बाद इस सर्वमान्य सिद्धांत से खिसक उन लड़कियों की तरफ़ आकर्षित हुए। चलो कैसे भी हो गए। पर अब क्या? मौका था किसी गोरी चिट्टी के प्यार में पड़ते। वह भी हाथ से गया। मिली भी तो यह। अब वह कैसे अपने घरों में किस मुँह से शादी की बात चलाएँगे। उस लड़की की तस्वीर कैसे डाक से, फ़ैक्स से, ईमेल से भेज पाएंगे। ‘फोटोशॉप’ का उपयोग किया तब क्या गारंटी है कि उनकी प्रेमिका में ‘ऐश्वर्या राय’ की तरह अपनी त्वचा के रंग के प्रति वही विचार प्रवाहित नहीं होगा। परिवार वाले तुरंत कह देंगे ‘यही करिया रंग वाली मिली रही। जब आपन मन की किए थे, तब कउनो दूसर नाय देख सकत रहे..?’ बुआ तुरंत अम्मा की बात दोहरा भाभी की तरफ़ हो जाएंगी कि ‘सब लड़कियां मर गयी रहीं का। कउनो गोरहर लड़की नाय धुढ़ सकत रहे..?’

हो सकता है आने वाले समय में कोई इस क्षेत्र में नयी-नयी कूदी क्रीम उत्पादक कंपनी अपने सर्वेक्षण में उन बलात्कार पीड़ित स्त्रियों के रंग के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँच जाये कि उनकी क्रीम फ़ेयरनेस क्रीम नहीं ‘डार्कनेस क्रीम’ है। जिसे लगाकर आप किसी भी तरह के यौन शोषण से बच सकती हैं। जिसके साथ उसका यह दावा भी काम कर रहा होगा कि उनका यह सर्वे इसलिए भी प्रामाणिक है क्योंकि ‘अमुक टुडे’ के साथ हुए सेक्स सर्वे के आँकड़ों का प्रयोग कर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पुरुषों ने विकल्प देने के बाद गोरी महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाने को प्राथमिकता देने की बात स्वीकारी है। इसके साथ उनका तीसरा पायलट प्रोजेक्ट ‘सेक्सकर्मियों’ के बीच सफ़ल रहा है। जिनमे इनकी क्रीम लगाने के बाद उन प्रयोगकर्ताओं की आमदनी में गिरावट दर्ज़ की गयी है। पुरुष साँवली महिलाओं की तरफ़ आकर्षित ही नहीं हुए। इसलिए भी इसे खरीदा जा सकता है।

भले आज हम इसे स्त्री विरोधी वक्तव्य कहकर ख़ारिज करने पर तुल जाएँ, पर यह उतना ही सच है जितना कि उन विज्ञापनों का झूठ। यह इन प्रेम सम्बन्धों से लेकर विवाह से पहले लड़कियों की परेड से लेकर न-मालुम कहाँ तक अपनी पैठ बना चुका है। ख़ून में साँसों की तरह घुल चुका है। हमें अपनी लड़ाई लड़नी है। सबसे पहले सबसे ज़रूरी है इस रंग के मिथक का टूटना।

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