दिसंबर 14, 2013

अच्छा तो तुम्हारे बारे में कह रहा हूँ

जैसे अभी लिखने वाला हूँ कि मुझे नहीं पता के ‘रक़ीब’ का मतलब क्या है। पहली बार सुना। इतनी पास से। सोच रहा था इसके बाद रुक क्यों गया। लाया तो था के बहुत कुछ है, जो कह दूंगा। पर ठहर क्यों गया? कभी-कभी कुछ देर पहले तक मन होता है। फ़िर अचानक वहाँ से हट कहीं और चल जाता है। जैसे अभी। मन बिलकुल भी नहीं है के यहाँ फ़ालतू में बैठे वक़्त बर्बाद करता रहूँ। कितने और भी काम हैं, जो किए जा सकते हैं। जैसे अभी अपनी ही पोस्ट पढ़ने की कोशिश कर रहा था। लगा किसी भी तरह के विराम-चिन्हों को न लगाने के कारण कितनी दिक्कत होती है। पढ़ना कितना मुश्किल हो जाता है। कहाँ कितना कहना है। कहाँ बोलते बोलते रुक जाना है। पता ही नहीं चलता। वह अगले साल के लिए ड्राफ़्ट की है। लगता है कुछ और मरम्मत की ज़रुरत है।

तुमने कह तो दिया। पर इसके पीछे क्या सोच रहे होगे। नहीं पूछा। पूछने का मन नहीं था। एक तो बार-बार उन्ही नामों के हवाले अब कहीं से भी अंदर तक महसूस नहीं होते। उतनी तरहों से उन सबसे गुज़रने का एहसास अब छू भी नहीं पाता। यह कोई ‘स्थितिप्रज्ञ’ होते जाने की तरह नहीं है। पर सच, यह अब कहीं नहीं है। यह वहाँ ठहरने से इंकार कर देना है। इंकार इस अर्थ में कि वहाँ रुके रहने के लिए अब सोचने का वक़्त नहीं है। जब था, तब भी नहीं रुक सके। वह वहाँ से भाग लेने की तरह सामने आया।

यह जितना अमूर्त लग रहा है, उतना ‘एबसर्ड’ है नहीं। क्योंकि उसे तब जीते रहने को अभिशप्त हमारे पास सिर्फ़ अकेले हम थे। इन विस्तारों में जाने को अब दिल नहीं करता। और जब कोई कुरेदने की हद तक वहाँ घुसने लगता है तब टीस नहीं उठती। लगता है वह इतनी पास नहीं रहा। वह समझ नहीं रहा। बस कहे जा रहा है। बिन यह जाने कि उसके बोले जाने से कई साल पहले, वह व्यक्ति, उन जगहों से अपने ठीहे उठा चुका था। वह वहाँ अब नहीं पाया जाता। अगर वह उसे आज भी वहीं दिख पड़ता है, तब यह, उनके बीच, किसी टूटे तार की तरह है। उसकी मरम्मत करना बाकी है। आपस की समझदारी में वह पीछे छूटता गया है।

यहाँ किसी के नाम देने की ज़रूरत नहीं है। जिससे बात कर रहा हूँ, उसे पता है। इस अर्ध-विराम की तरह वह भी जानता है कि वह रुक तो गया, पर उस अंतराल के बाद, वहाँ से चला नहीं। चलने की तय्यारी में वह कभी नहीं चलना चाहता। रुके रहना चाहता है। वह तब तक रुके रहना चाहता है जबतक कि वह चाहे। वह अपने पूर्वाग्रहों में इतना जटिल होता गया है के किसी तरफ़ वह नहीं खिसकता। खिसकना विचलन है। उनके संवाद की सम्भावना में लगते पैबंद की तरह। उसे पैबंद पसंद नहीं। 

क्या लिखे जा रहा हूँ, नहीं समझना चाहता। बस लिखे दे रहा हूँ। कि इन हिज्जों को कभी मौका लगे देख लेंगे। अभी बस कह लेते हैं। कह लेना ज़रूरी है। ऐसे दिमाग को खाली कर पलटुंगा, तो सब करिने से लगा होगा। कहीं कोई अव्यवस्था नहीं होगी। वह जान चुका होगा के वह कहाँ छूटा रह गया। उसे अभी कितनी दूर और चलकर आना है। यह उसकी ज़िद है। नहीं चलने की। नहीं जानने की। जबकि कहता रहा हूँ तुम्हें वहाँ से हटना होगा। फ़िर भी वह वहाँ से हिलने को तय्यार नहीं है। उसे लगता है मुझे समझने के सारे औज़ार उसके पास पहले से हैं। यही उसका ‘राईटरस् ब्लॉक’ है। मुझे ‘प्लॉट’ तो समझा, पर कभी अपने मुताबिक़ ‘स्क्रिप्ट’ नहीं लिख सका। उसने कभी कोशिश ही नहीं की। सिर्फ़ नेताओं की तरह दावे किए। उन्हे कभी पूरा नहीं किया।

यही तो है जो हमें रोके रहता है। मैं उसे इसी तरह लेता हूँ। के इस तरह से वह कभी आगे नहीं बढ़ना चाहता। न मैं कहीं से टरने वाला हूँ। उसे लेकर जो आग्रह हैं, वह भले पूर्वाग्रह बन गए हों। पर उनसे अब पलट नहीं सकता। वहाँ से कहीं जा नहीं सकता। तभी तो लगता है वह मूलतः ‘पुरुष’ ही है। किसी विचार ने उसपर कोई काम नहीं किया है। वह अपने निर्णय ले चुका है। उन्हे भी कभी नहीं कहता। पर पता है, उसको लेकर वह क्या सोचता होगा। उसका ऐसे सोचना ही उसे ऐसा बनाता है। आवारा सोच का। ख़ालिस। बारह आने का। किसी को लगे कि यह सब उसके लिए कह गया हूँ तो मुझे भी बता देना। मुझे भी पता चल जाएगा वह कौन है जिससे इन बीतते सालों में इतनी सारी बातें ‘रिलेट’ होती गयी हैं। बताना ज़रूर। क्योंकि लिखते वक़्त वह कौन है नहीं जानता..

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