दिसंबर 25, 2013

जो कहने को होता हूँ..

ऐसा नहीं है के इन बिन लिखे दिनों में मन नहीं किया। साल ख़त्म होते-होते कई सारी बातें हैं जिन्हे कहने का मन है। मन है उन अधूरी पोस्टों पर काम करने का। पीछे किए वादों पर लौट जाने का। कतरनों को जोड़ पूरे दिन बनाने का। इत्मीनान से रुककर सबकुछ कह लेना चाहता हूँ। जो पास हैं जो दूर हैं उन सबके कानों तक पहुँचने का कोशिश करना चाहता हूँ। कहने को हूँ..पर..

पर इन रुके दिनों में फ़िर वहीं पहुँच गया। लगा अंदर-ही-अंदर लगता कुछ छूट रहा है। उसके पास हूँ। पर पकड़ में नहीं आ रहा। ख़ुद से कहीं दूर। इधर जब भी लिखना शुरू करता, लगता अक्षर भाग रहे हैं। साथ नहीं हैं। वह थिर नहीं हैं। उन्हे पकड़ता नहीं। बस देखता रहता। कैसी-कैसी आकृतियों में बदलते जा रहे हैं। कैसे बिम्ब उभरकर रह जाते हैं। कहने को होता, पर कह नहीं पाता। लगता लिख ही नहीं पाऊँगा।

यह समझ नहीं आता कि अक्सर ऐसा क्यों होता है जब डायरी पर नहीं लिख रहा होता बिलकुल उन्ही दिनों के आसपास यहाँ से भी गायब रहने लगता हूँ। इन दस ग्यारह दिनों में उन पन्नों पर देर तक नहीं रुका। यहाँ मन भी किया। दो चार ‘ड्राफ़्ट’ अभी भी ‘डेस्कटॉप’ पर पड़े हैं। पर अधूरे हैं। कब, किन क्षणों, मानोभावों में उन्हे ख़त्म किए बगैर रहने दिया, पता नहीं। बस लगता रहता जिन पलों में लिख सकता था, बिलकुल अभी गुज़र गया। मन उचट जाता। खाली-खाली सा। अनमना नहीं। फ़िर भी नहीं लौटता।

इसके पीछे लगता है भावातिरेकों को हू-ब-हू उतार लेने की ज़िद काम करती रही। उस वक़्त जैसा लग रहा है, उसे वैसे न कह पाने की वजह से नहीं लिखता। ‘लिपि’ के शब्द थोड़े कमज़ोर लगते। लगा आवाज़ अपनी गतिकी में अलग तरह से इन्हे कह सकती है। शब्द उन भावों से कुछ दूरी पर हैं। लगता आवाज़ थोड़ा पास होगी। वहाँ होते उतार चढ़ाव उन्हे पकड़ लेंगे। कुछ दिन उन रातों को हाथ में मोबाइल लिए उसके ‘वॉइस रिकॉर्डर’ पर अपनी आवाज़ सहेजता रहा। जो जैसा महसूस हो रहा है, उसे उसी तरह कहते रहने में लिखने में लगने वाले वक़्त से जादा गति है। शब्द वैसा चित्र नहीं खींच सकते, जैसे आवाज़ ध्वनि बिम्बों को रचती है। अँधेरे से होकर गुज़रने वाली आवाज़ का जादू खींच रहा था। तब लगता ऐसा ही तो लिखना था। 

ऐसा पहली बार नहीं कि अपनी ‘भाषिक योग्यता’ को लेकर इस तरह सोच रहा हूँ। इस माध्यम में आने से पहले भी कई-कई बार लगता अपने यहाँ शब्द, वाक्य, अक्षर, उनका रूप, उनका विन्यास, अपने आप को कह नहीं पा रहा। वह जैसे आना चाहते हैं, उन्हे कोई रोक रहा है। उन्हे जैसा कहना चाहता हूँ, जिस सघनता से कहने का मन होता है, जिस तरह से चीज़ें अंदर ही अंदर उमड़ती घुमड़ती रहती हैं; उन्हे वैसे ही कह पाने में असमर्थ हूँ। यह मेरी ही कमज़ोरी है कि उनमे यह महसूस कर रहा हूँ।

फ़िर यह भी लगता है इतने दिन रुककर लय में वापस आने में थोड़ा वक़्त लगता है। भले अभी पटरी पर नहीं हैं। एक दिन आ जाएँगे। थोड़े जादा पहर लेकर बैठूँगा सब ठीक हो जाएगा। यह ठहराव ठहरेगा नहीं। ऐसा भी नहीं है के इसे ‘जॉर्ज ऑरवेल’ की तरह ‘रायटरस् ब्लॉक’ कहकर उपन्यास लिखने का मन हो रहा हो। यह इस बीतते साल में कम पढ़ने का नतीजा है। ऐसा नहीं है के दूसरों का लिखा पढ़ने के बाद उनकी तरह लिखने बैठ जाऊँगा। या येकि उनके शब्दों को उठा उठाकर अपनी जेबें भर लूँगा। यह पढ़ना उन शब्दों शैलियों विन्यासों संरचनाओं से गुज़रने की तरह है। अंदाज़ लगाना है के कोई कैसे लिखता होगा। किन किन तरहों से अपनी बात कह सकता है। उन क्षणों में वह कैसा नहीं होते जाना है। कैसे भाषा बरतकर चलने के बाद वह अभीष्ट आकार में बदलती जाएगी। पढ़ना इस तरह से भी होता है। एक लिखने वाला दूसरे लिखने वाले से ऐसे भी मिलता है। उन सारे ब्योरों से उसके साथ उसकी उंगली पकड़कर चलता है। इससे पहचान मज़बूत होती है। और मज़बूत होती है भाषा।

ऐसा सोचते-सोचते उस बंद अलमारी से कई बिन पढ़ी किताबें अभी भी बाहर आजाने का इंतज़ार कर रही हैं। देखते हैं इन ठंडी दुपहरों शामों में रज़ाई में उनके साथ बैठने का मौका कब लगता है। और यह भी के इस आख़िरी हफ़्ते में कितनी बकाया बातें कह पाता हूँ..

{थोड़ी बहुत जो कह सका..}

2 टिप्‍पणियां:

  1. कम पढने का असर तो लिखने पर पड़ता ही है लेकिन कई बार अनुभव जो हैं वो पढने की कमी को पूरा कर देते हैं ...

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  2. हाँ अनुभव हमारी भाषिक अभिव्यक्ति को कई तरह से गढ़ते हैं। पर लगातार उन अनुभवों की एकरसता, उन्ही तरहों से खुद को कहती है, तब दिक्कत होने लगती है..इधर ख़ुद में ऐसा ही लगता है। इसलिए कुछ पढ़ने की सोच रहा था। कहने को तो ख़ैर कहते ही रहते हैं ..

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आवाज़ें..

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