दिसंबर 26, 2013

बीती रात बकाया बातों की किश्त

रात। ऊपर आया। लेटने के साथ नींद को नहीं आना था। नहीं आई। पता नहीं बेतरह क्या-क्या सोचता रहा। सोचता रहा क्या-क्या बाकी रह गया। जिन्हे लिख लेना था। पर नहीं लिखा। पीछे एक और रात इसी इंतेज़ार में जागता रहा। फ़िर ख़्याल आया। लिख ही क्यों रहे हैं? लिखना इतना ज़रूरी काम कैसे है? इसके बिना क्या हो जाएगा? इस बात को कभी नहीं लिखा के हर सालगिरह पर इस बात पर पहुँचता के पाँच साल बाद लिखना बंद कर देंगे। सबसे जादा इसबार महसूस किया। तब भी लिखा नहीं। पाँच साल ही क्यों? पता नहीं। पर गिनती यहाँ आकर रोक देने का मन है। तीन साल हो चुके हैं। ऐसा नहीं है फ़िर मन किया तो इसे बदल नहीं सकेंगे। पर अभी इसी के पास हैं।

वहीं देखते हैं तो ‘ब्लॉगिंग’ के शुरुवाती दिन याद आते हैं। कैसे इन सालों में लगातार यहाँ रहने की ज़िद इधर रोके रही है। वरना लगता है कुछ ख़ास कहने को है नहीं। कुछ बेचैनी है। जो अभी बेचैन करे रहती है। कुछ उधेड़बुन लगातार चलती रहती है। दिमाग में। रवीश लिखते है ‘कहने का मन होता है’। जब तक मन है तब तक कहते रहेंगे। अभी ज़िद से काम चल रहा है। जैसा कहीं नहीं पढ़ते, वैसा लिखने का मन है। मौसम से बेख़बर रहने का मन नहीं है अभी। कुछ असहमतियाँ हैं, जिन्हे बहीखाते में दर्ज़ करते चल रहे हैं। जब असहमत नहीं रहेंगे, नहीं लिखेंगे। नहीं कहेंगे। एकसाथ कितनी ही बातें चल रही हैं। अस्पष्ट, व्याघातक, अंतर्विरोधी। अतार्किक वक्तव्य की तरह। पर क्या करें। यही सब तो हैं जिनसे बने हैं। इन्हे कैसे न मानें। कैसे न कहें।

जब कभी नहीं लिखता तो पोस्टों के साथ अपनी लगाई तस्वीरों को देखने का मन करता है। कितने ही फ़िल्टर लगाए हैं। अपने ऊपर। कितनी ही तहों में जाकर उन्हे ढूँढा हो जैसे। सच कहूँ, अगर तब अपन अनुराग के ‘सबद’ पर न पहुँचते, तो शायद अपने उन दिनों में उस तरह अमूर्त, अस्पष्ट, अनेकार्थी छवियों को लगाने के आग्रह से नहीं भर जाता। इसने उन बेतरह बेतरतीब फ़ोटो में से किसी एक को ढूँढने का धैर्य दिया। उस तरह भी ख़ुद को खोजता। ख़ुद को भरता। अपनी पंक्तियों की तरह एक-एक शब्द को कह लेने वाले रंगों में उन अर्थों को भर देने की कोशिश करने लगा। कोशिश होती कि जो नहीं कह सका वह छवियाँ कह दें। बिन बताए। बिन छुपाए। 

पता है मन किस तरफ़ ढकेल रहा है? एक नाम भर आजाने से सैकड़ों नाम मन नें तैर गए। प्रवीण पाण्डे ने एक पोस्ट लिखी है। कल पच्चीस दिसम्बर को ‘नौ दो ग्यारह’ को बने दस साल हो गए। मन वही दोहराने लगा है। मन कर रहा है उसी पर बात करने लगूँ। अभी नवम्बर में लिखी पोस्ट की तरफ़ जाकर ‘ब्लॉगिंग’ पर लिखने के लिए नीचे से ‘लैपटॉप’ नहीं उठा लाया। ख़ाका बन रहा है। कई सारी चीज़ें है। पर अभी नहीं। अभी मन नहीं है। थोड़ा रुक कर। सबको थोड़ा और तरतीब से लगाना बाकी है अभी। इसलिए। 

रात मन में कई बार पापा की बात घूमती रही। पापा पूछते हैं, अब जनसत्ता में क्यों नहीं आते? उन्हे कुछ नहीं कह पाता। कोई जवाब नहीं है। वहाँ क्यों आता था? यह भी समझ नहीं पाता। अभी आख़िरी बार जून में तो आया था। पर आज से तीन साल पहले इस अख़बार में छप जाना किसी भी तरह से कम बात नहीं थी। हमें जानता कौन था? पर हम भी वहाँ हो सकते हैं। यही उस जगह की ताक़त थी, जिसने हमें बनाए रखा। एक अर्थ में सबसे बड़ी बात थी, बिन लाग-लपेट उन पन्नों पर होना। यह उस मिथक को भी तोड़ने जैसा था कि अख़बारों में छपने के लिए ‘किन्ही’ ‘और तरहों’ के ‘कौशलों’ की ज़रूरत होती है।

इसी महीने की छह और बारह दिसम्बर ‘हिंदुस्तान’ में था। वहाँ के ‘साइबर संसार’ में। ऐसे ही अगर ‘मोहन राकेश की डायरी’ वाली पोस्ट पर बी.एस.पाबला न बताते, तो कभी पता ही नहीं चलता के राजस्थान जयपुर से कोई ‘लोकदशा’ नाम का कोई अख़बार भी निकलता है। कैसा अख़बार है। पता नहीं। पर अगस्त में दोबार वहाँ के पन्नों पर दो पोस्ट। न जाने कैसे ‘शाजहानाबाद’ वहाँ ‘जहानाबाद’ छापकर आया। ऐसे में अगर कोई जहानाबाद में ‘कमला मार्किट’ ढूँढता रहे और वह न मिले तब? फ़िर यह पता न चल पाना थोड़ा खलता है। इन चारों बार सीधे पता नहीं चला। इसलिए भी दायीं तरफ़ लिख भी दिया है कि लेटर बॉक्स में ख़त तो डाल ही सकते हैं के पता चलता रहे, कि कहाँ-कहाँ हम पहुँच रहे हैं। दिल्ली में रहते हैं तो क्या? ‘कॉपी-लेफ़्ट’ नहीं है।

{पिछली रात का पन्ना, जो कहने को होता हूँ..}

6 टिप्‍पणियां:

  1. http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=473&pageno=1

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    1. रात थोड़ा अरबरी में था। स्क्रिप्ट पर काम कैसा चल रहा है। बड़े दिन हो गए तुम्हें पढ़े हुए। कब वापस आ रहे हो..

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  2. धन्यवाद मित्र।

    मोहन राकेश की डायरी का एक-एक पन्ना कभी कभी अपनी कही लगने लगता है। बड़ी मुश्किल से लाइब्ररी में दिखी थी। तभी से पढ़ रहा हूँ। उस बार से आगे अभी और बहुत कुछ इकट्ठा कर लिया है।

    देखते हैं कब मौका लगता है..

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    1. कमोबेश हर आदमी में हम हैं. और हममें वे हैं.

      गोरख पाण्डेय कि डायरी में भी.

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    2. हमारा यही कुछ-कुछ होना हमें बनाता-बिगाड़ता रहता है। फ़िर हम अपने जैसों की पहचान कर उन्हे पहचान जाते हैं।

      इस डायरी का कुछ हिस्सा गोपाल प्रधान के ब्लॉग पर है..http://gopalpradhan.blogspot.in/2011/04/blog-post_8011.html

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  3. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (26 दिसंबर, 2013) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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