दिसंबर 27, 2013

बीना की कहानी: मैं ज़िंदा हूँ

साल के आखिरी दिन। कितनी ही तरहों से अपनी तरफ़ खींचते हैं। समेटने जैसे भाव से भरे हुए। पैर में मोजें हैं, फिर भी पैर ठंडे हैं। रात रज़ाई लगता है भीगी हुई है। पैर सिकोड़े वहीं नींद का इंतज़ार करते करते लुढ़क जाते हैं। कल सुबह ही निकालना है इसलिए मेज़ पर हूँ। के कुछ-कुछ लिखता चलूँ। वरना ये दिल्ली की ठंड तो किसी लायक नहीं छोड़ेगी। अभी सोलह दिसंबर मिहिर ने ‘फ़ेसबुक’ पर बताया के रात ग्यारह बजे परेश कामदार की फ़िल्म ‘खरगोश’ आने वाली है। प्रियंवद की कहानी पर आधारित। मन में बिठा लिया था इसे बिन देखे तो सोएँगे नहीं। पर शायद जादा थका हुआ था। मोबाइल पर ‘रिमाइन्डर’ भी लगा लिया था। फ़िर भी सो गया। बात दिमाग से उतर गयी लगता।

पर नहीं उतरी इन ठंडीयों की शुरुवाती रात जब ऐसे ही अचानक डीडी भारती पर दीप्ति नवल की एक फ़िल्म आ रही थी। ‘दीक्षा’ पर बात करते हुए यहीं तो ख़त्म किया था कि जल्द इसपर बात करेंगे। पर दिन बीतते गए बात रह गयी। फ़िर तब से यह बात भी दिमाग में घूमती रही कि पता नहीं क्यों शबाना आज़मी, स्मिता पाटील की तरह दीप्ति नवल को वैसी सशक्त अभिनेत्री नहीं माना जाता। अभी भी इसका कोई जवाब मेरे पास नहीं है। फ़िलहाल अभी कोई बहाना नहीं। बात सीधे ‘कथ्य’ पर।

फ़िल्म में आलोक नाथ ऐसे युवक की भूमिका में हैं जो अभी शादी करने को तय्यार नहीं है। उम्र के लिहाज से परिवार वाले जिस लड़की को चुनते हैं, वह कैसी है, यह भी कुछ ख़ास नहीं जानते। लड़की को जानने के कितने अवसर मिले यह प्रश्न ही नहीं उठता। लड़के के विरोध के बावजूद शादी करा दी जाती है। दोनों अब पति पत्नी हैं। लड़की की तरफ़ से भी ऐसी कोई असहमति हो दिखाई नहीं देती। दिखाई देना उसके चरित्र पर संदेह की तरह है। इसलिए भी इसके लिए कोई जगह नहीं है। पर उसे लग जाता है जिसके साथ उसका विवाह हुआ है, वह उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा। वह कहता है कि वह उसे प्रेम नहीं कर सकता। पत्नी नहीं मान सकता। उसके कुछ सपने हैं। जो अभी पूरे नहीं हुए हैं। उन्ही के लिए उसे जीना है। 

स्थितियाँ तब और जटिल हो जाती हैं जब घर को चलाने वाला एकमात्र ‘जीविकोपार्जक’ लड़का एक रात बिन बताए घर से चला जाता है। यह किस श्रेणी का ‘पलायन’ है इसपर कुछ नहीं कहा जा सकता। किन्ही भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों में उसकी संलिप्तता प्रकट नहीं होती। इसलिए इस तरह उसका जाना शादी के निर्णय की एक प्रतिक्रिया के रूप में ही स्पष्ट होता है। अब उन सदस्यों के सम्मुख घर गृहस्थी चलाने का आर्थिक संकट है। ‘अर्थ’ के बिना कुछ संभव नहीं। इस आपातकाल में बूढ़े सास-ससुर बीना को किसी तरह नौकरी करने के लिए राज़ी कर लेते हैं। इस तरह वह किसी दफ़्तर में मुलाज़िम हो जाती है।

नौकरी का मतलब सिर्फ़ महीने की तयशुदा तनख़्वाह ही नहीं है। यह एक स्त्री को कई सारी स्वतन्त्रताओं के पास लाने, उन्हे उपभोग करने का एक अवसर है। उसे बाहर निकलकर सारे निर्णय ख़ुद लेने हैं। जो निर्णय, जो क्रियाकलाप पुरुषों के संदर्भ में स्वाभाविक व नैसर्गिक प्रतीत होते हैं, वही स्त्री के संदर्भ में, कितना असहज करते हैं; इस फ़िल्म में कई-बार सतह पर दिखाई देता है। पुरुषों के अपने कार्यक्षेत्र में काम करने वाली महिला सहकर्मियों से मित्रता को कोई भी किसी भी तरह से आपत्तिजनक नहीं मानता। लेकिन समानांतर चलने वाली धारा लड़कियों के लिए किसी ऐसे प्रसंग में किसी भी तरह सम्मिलित होना शोभनीय नहीं। ऐसा दीप्ति के साथ भी हो सकता था। अगर उसका पति इस कथानक में उपस्थित होता। क्योंकि वह वहाँ इन क्षणों में माजूद नहीं है इसलिए पैसा कमाकर घर चलाने वाली बहू पर बूढ़े दंपत्ति कोई पाबंदी नहीं लगाते। न कभी कोई सवाल ही पूछते हैं। सवाल पूछना उन नियमित पैसों का निषेध है। उस स्त्री का चारित्रिक हनन है। वह तो अब इसे ही अपना कमाने वाला बेटा मान चुके थे।

ध्यान देने लायक शब्द है ‘बेटा’। बेटा मतलब नौकरी करके पैसा कमाने वाला। और पैसा मतलब निर्णय लेने की स्वतन्त्रता। अब चूँकि बीना इस भूमिका में हैं इसलिए कथानक उन्हे थोड़ी आज़ादी भी देता है। वह उसी दफ़्तर में काम करने वाले एक पुरुष की तरफ़ आकर्षित होती जाती हैं। उससे प्रेम करने लगती हैं। यह अपने अधूरेपन को भर लेने का निर्णय भी है। 

कहानी अब जटिल और असहज होना शुरू होती है। इसके दो क्लाइमैक्स हैं। उनमे से पहला यह कि उसके सास ससुर के कथनानुसार ही वह पंकज कपूर की तरफ़ जाती हैं। और वही शादी करने के लिए दबाव भी बनाते हैं। सिर्फ़ इतना ही नहीं वह यह भी कहते हैं के शादी के बाद दोनों उन्ही के घर में रहें। उनकी बहू के इस नए पति के रूप में उन्हे अपना लौट आया बेटा ही लगता है। और इसी तरह बहू के साथ उसके पति की आमदनी भी पुराने दिनों की तरह बे-नागा बनी रहेगी। उनके लिए अपनी बहू की शादी करवाने का निर्णय आर्थिक निर्णय है। वह किसी भी कीमत पर नहीं चाहते थे कि शादी के बाद उनके घर की इज्ज़त किसी दूसरे घर चली जाये। उसे उन्ही के घर पर बने रहना होगा। सब कितना क्रांतिकारी फ़ील दे रहा है न! हम उस यथा-स्थितिवादी ढाँचे कितनी तरहों से तोड़ रहे हैं। किस तरह से यह उत्तर आधुनिक हो जाने की हद तक अपने को मोड़ते रहे हैं। कि अचानक दूसरा क्लाइमैक्स घटित होता है।

जिस रात के बाद आने वाली सुबह दोनों की शादी होने वाली है, अचानक उसी रात बीना का ‘विधिसम्मत’ पति वापस लौट आता है। यह लौटना, उन्ही बने बनाए साँचों में वापस जाना है। बीना के लिए यह कैसी स्थिति है? इसे ‘त्रिशंकु’ कहना उस औरत की मनः स्थिति को कम करके आँकना है। जिन तरहों से वह अपने नए कल के सपनों को बुन रही थी, अचानक वहाँ, उसका बीता कल उपस्थित होकर, उन संभावनाओं को तत्काल स्थगित कर देने के आग्रह के साथ सामने आता है। जिस पति ने उसे अपनी पत्नी नहीं माना, उसके लिए उसे अपने निर्णय से पीछे हटने के लिए कहा जाने लगता है। सास-ससुर के उनके बेटे के वापस आ जाने के बाद का व्यवहार उन्ही खोहों में लौटा ले जाता है। जहाँ अब उनकी बहू उनके बेटे के लिए ही है। उसकी कोई इच्छा अब स्वीकार्य नहीं। वह अपने उस रात ख़ुद को कमरे में बंद इस सारे सवालों के जवाब माँगती है। बंद दरवाजे के पीछे से आते जवाब उसे इस चारदीवारी में कैद रखना चाहते हैं। पर ऐसा करके वह अपने पति को अपनी देह छूने के नैसर्गिक अधिकार को न देकर उसके अहं को चोट पहुँचाती है। यह मर्मांतक प्रहार पुरुष सहन नहीं कर पाता। पति तो बिलकुल नहीं। यह उसे रौंदने से मना कर देना है।

अब इस जगह पहुँचकर उसे क्या करना चाहिए, से जादा महत्वपूर्ण पुरुष की भूमिका है, जो उसके पति के रूप में यह जान लेना चाहता है, के उसके अपने पुरुष सहकर्मी के साथ किस सीमा तक सम्बन्ध थे? वह सीधे-सीधे यह जानना चाहता है कि दोनों के बीच दैहिक सम्बन्ध तो नहीं हैं। यह उस योनि की शास्त्रीय घेराबंदी का एक और अध्याय था। जहाँ उसके पति के आते ही घर से बाहर आने के सारे मौके ‘पदस्खलित स्त्री’ के लिए बंद कर दिये जाते हैं। उन बंद कमरों से आती चीख़ों में उसके पति के बलात शारीरिक सम्बन्ध बनाने की पीड़ा चित्कार कर रही थी। एक स्त्री अपनी इच्छा के विरुद्ध अपनी देह के लिए लड़ रही है। यह उसकी इच्छाओं का निषेध है। यह किस भी स्वतंत्र कल्पना की मनाही है। उसे अब सोचना भी बंद कर देना होगा। समाज उससे यही चाहता है।

{जो पिछली कड़ी तक नहीं पहुँच पाये, उनके लिए, दीक्षा : दैहिक शुचिता का स्त्री पाठ }

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-12-2013) "जिन पे असर नहीं होता" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1475 पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. नैतिकता का तो पता नहीं, बस इस 'वर्चुअल स्पेस' में थोड़ा अपने लिखे को पकड़ना ज़रा मुश्किल है, इसलिए वो चिट लगाई थी। अब तो उसे हटा भी दिया।

      बस कभी लिंक लगाएँ, तो बता दिया करें।

      हटाएं

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