दिसंबर 28, 2013

केजरीवाल की दिल्ली 'एक' का छोटा-सा नरेटिव

अब जबकि दिल्ली को कुछ ही देर में ‘मुख्यमंत्री’ मिलने वाला है इन सब बातों का कोई अर्थ नहीं, ऐसा नहीं है। यहाँ नीचे जो कुछ भी आने वाला है, वह कम-से-कम एक ‘नरेटिव’ की तरह काम हो करेगा ही। एक उत्तर पाठ। 

बात हमारे एमए के दिनों की है। हमारी ‘फ़ैकल्टी’ हमारे ही डिपार्टमेंट के एक प्राध्यापक दिल्ली विधानसभा चुनावों में खड़े हो रहे थे। उनकी रणनीतियाँ क्या थीं? कभी उन्होने हमलोगों से साझा नहीं की। पर विचारधारात्मक रूप से उनका आग्रह वामपंथी रुझानों की तरफ़ स्पष्ट था। उनके आगे-पीछे आभामंडल बनाए छात्रों ने कैसा प्रचार किया पता नहीं। वह चुनाव हार गए। शायद ज़मानत भी ज़ब्त हो गयी थी। इन दिनों किन्ही सीमित प्रसार वाली पत्रिकाओं में लिखते-पढ़ते रहे हैं।

दूसरी तरफ़ इसी विश्वविद्यालय के हरीश खन्ना हैं। रजनी अब्बी को हराकर तीमारपुर से विधानसभा में जा रहे हैं। इनके बारे में यह भी नहीं जानता यह किस विषय से हैं। साथ में कमल की एक फोटो देखी है। पता नहीं क्या पढ़ाते होंगे उसे। शायद राजनीति विज्ञान से होंगे। वैचारिक रूप से कहाँ ‘स्थित’ हैं। पता नहीं। क्या हमारे उस हारे मास्टर ने बधाई दी होगी। यह भी पता नहीं। बहरहाल।

सच कहूँ तो चार दिसंबर के पहले वाली रात तक तय नहीं कर पाया था। कल किस बटन पर उँगली रखनी है। पता नहीं मेरे जैसे कितने होंगे जो उस रात या उससे पहले इस स्थिति से गुजरे होंगे। नेहा फ़ेसबुक पर लिखती है, वह भी नहीं सोच पा रही। हम ‘दिल्ली एक’ से थे। हमारे यहाँ शीला दीक्षित के विरुद्ध ख़ुद केजरीवाल खड़े थे। अब पिछली बार की तरह यह बहाना नहीं हो सकता था के विकल्प नहीं है। यह ख़ुद को विकल्प के रूप में स्थापित करना है। दो हज़ार आठ में भी यही स्थिति थी। तब भी वोट दोनों मुख्य प्रतिद्वंदियों को न देकर दिल्ली की पहली महिला ऑटो चालक सुनीता को दिया था। उसे जीतना नहीं था। फ़िर भी उसे ही दिया।

सोच रहा था हमारे यहाँ से अरविंद खड़े हैं। हम किसी ऐसे को तो अपनी जगह से भेज ही सकते हैं, जो उन सरकारी इमारतों में जाकर हमारे हिस्से के सवाल मजबूती से उठा सके। मतलब यह भी के अरविंद यह विश्वास करवाने में कामयाब रहे के उन्हे वोट दिया जा सकता है। वह इस लायक हैं। ‘डिज़र्व’ करते हैं। जबकि कभी इस पार्टी के बनने या उन्हे मैगसेसे पुरस्कार मिलने के बाद बात नहीं की। बस यह जानते थे कि वह ‘परिवर्तन’ का संचालन करते हैं। एक संस्था है ‘कबीर’, उससे जुड़े हैं और ‘सूचना के अधिकार’ के लिए लड़ रहे हैं। मुकेश की सूचना के अधिकार वाली बुकलेट भी कहीं पड़ी होगी। तो बस इसबार का वोट मज़बूत विपक्ष के लिए दिया। जो अब तक बाहर करते रहे थे, उसे अंदर करने के मौके जैसा। यह उस मुखर विरोध को संस्थानिक वैधता देने जैसा भी होगा। विरोध के उलट रचनात्मक कार्य जैसा। जब वह कुछ करने लायक होंगे। फ़िर कुछ जवाब ख़ुद को भी देने पड़ते हैं। यह पहला जवाब था।

फ़िर जिस दिन दिल्ली में मतदान था लगने लगा अरविंद जीत रहे हैं। हमारा ‘एस्टिमेट’ पाँच-सात हज़ार वोटों के मार्जिन का था। स्कूल में जब छोटे-छोटे बच्चे कहते फ़िर रहे थे, ‘इस बार झाड़ू चलेगी’ तब भी मन नहीं मानता था। तब अपने आप को समझा लेता कि इसबार विधानसभा त्रिशंकु होने जा रही है। उसमें ‘आप’ के हिस्से जादा से जादा पंद्रह-सोलह सीटें आ जाएंगी। पर सरकार नहीं बन पाएगी। पता नहीं उस दिन बड़ी क्लासों के लड़कों का काँग्रेस पार्टी वालों की पदयात्रा में मचाये शोर को अनसुना कर दिया। वहाँ चारदीवारी के पास खड़े बच्चे ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे, ‘झाड़ू झाड़ू झाड़ू..!!’

इस बीच एक कमज़ोर-सा स्टिंग ऑपरेशन भी बरसाती मेंढक की तरह टर्राता फुदक रहा था। पर वे लोग नहीं समझ सके जिन्होने ठान ली है वह अब उन्हे छोड़ेंगे नहीं। शाज़िया तीन सौ छब्बीस वोटों से हारी हैं। आरके पुरम वाले मतदाता पर ही इसका असर पड़ा अभी शोध से इसे साबित करना बाकी है। जिन्होने वोट दिया तो क्यों और जिन्होने नहीं दिया तो क्यों नहीं?

दोनों बड़ी पार्टियाँ जिस हक़ीक़त को जानबूझकर स्वीकार नहीं कर रही थी, वही इनके चुनाव जीतने पर बधाई दे रही थीं। आज केजरीवाल अपने कौशांबी वाले घर से वैशाली मेट्रो स्टेशन आएंगे। वहाँ से मेट्रो पकड़ बाराखम्बा उतरेंगे। कभी कोई सोच भी नहीं सकता था। उनका मुख्यमंत्री उन्ही की तरह सफ़र करते हुए अपने शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने जा रहा है। यह कोई छोटा-मोटा परिवर्तन नहीं है। बस उसकी शुरुवात है। यह दिल्ली जितनी उम्मीदों से तुम्हारी तरफ़ देख रही है उस पर ऐसे ही खरे उतरते रहना। भले अभी तक उन पचास पन्नों से नहीं गुज़रा जिसे तुमने मेनेफ़ेस्टो कह कर छपवाया है। दिल्ली को समझने के लिए वह एक और दस्तावेज़ है। योगेन्द्र यादव की मेहनत दिखती है। कहने को तो और भी बातें हैं। होती रहेंगी।

अभी बस अब इंतज़ार कर रह हूँ कब सत्ताधारी ‘आप’ पार्टी जंतरमंतर पर दिल्ली में बिजली देने वाली इजारेदार कंपनियों की बढ़ी हुई दरों को कम करने के लिए अनशन शुरू करेगी। पर यह भी कहता चलूँ के भले हम मंदिर मार्ग पर रहते हों पर आज रामलीला मैदान पर मुझे न ढूँढना। न जंतर मंतर पर कभी आने वाला हूँ। मुझे यहीं रहने तो। तब मन किया तो देखेंगे। अभी नहीं। और रवीश मान क्यों नहीं लेते कि हमारे हिस्से की कुछ उम्मीदें तो आप भी कर रहे हैं।

{अभी दुबई से ख़बर आ रही है फ़ारुख़ शेख़ नहीं रहे। बीती रात ह्रदयगति रुक जाने के कारण उनका निधन हो गया। दीप्ति नवल का जोड़ीदार चला गया। चश्मे बद्दूर की दिल्ली। अब कौन तालकटोरा गार्डन में दिखेगा। }

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (28 दिसंबर, 2013) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

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    1. ये मान-वान बढ़ाने के बोझ से कंधे न झुकाया करो, इतना आभार, सादर लिखकर परेशान किए देते हो। इतना औपचारिक होने का कभी मन नहीं होता।

      तुम्हारी वजह से एक दो लोग इधर आजाएं, यही बड़ी बात है। इसलिए तुम्हारा शुक्रिया। आभार।

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