दिसंबर 07, 2013

मोहन राकेश की डायरी पढ़ते हुए

कुछ ऐसी जगहें होती हैं जहाँ हम ख़ुद होते हैं। अपने आप में बिलकुल नंगे। बिलकुल अकेले। बेपरदा। बेपरवाह। लिखने के पहले, लिखने के बाद, हम कुछ-कुछ बदल रहे होते हैं। शायद ख़ुद को। अपनी लिखी उन बातों को। जो चाहकर भी किसी से नहीं कह पाये। कहते-कहते रुक से गए। रुक गए उन्हे सबकी नज़रों में लाने से पहले। या उसे अपने लिए ही बगलों में छिपाते रहे। कि कोई देख न ले। पहचान न ले। यह जान पहचान ख़तरनाक है। इसलिए उनसे हम उन निपट खाली अकेले क्षणों में उनसे गुजरते रहते हैं। अपने सबसे करीब से देखते पूछते हैं। उन्हे ऐसे ही जीने की ज़िद के साथ। यह हलफनामे हैं। आप-कबूलियाँ हैं। यह हमारी सांसें हैं। हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा है।

डायरी के पन्ने ही हैं जो हमें झेलते हैं। हमारी हर बात अपने तक छिपाये रखते हैं। किसी से कहने नहीं जाते। चुपचाप सब सहन करते जाते हैं। इन अबोली मुलाकातों में कभी ख़ुद कुछ नहीं कहते। सिर्फ़ सुनते जाते हैं। उन कही बातों को जज़्ब करते रहते हैं। यह कहने की ज़िद है, पर सिर्फ़ ख़ुद से। इसके अलावे यह बयान कहीं और नहीं हो सकती। दिल के बाहर इनकी यही जगह है। यहाँ हमें कोई देख नहीं रहा। हमारे सिवा। यही ख़ुद से ख़ुद की ईमानदारी है। साहस है।

कई सालों बाद, पिछले हफ़्ते ‘मोहन राकेश की डायरी’ हाथ लगी। न जाने कब से इसे पढ़ने की ख़्वाहिश दिल में थी। सोचता था कहीं एकबार फ़िर दिख जाये। फ़िर जाने नहीं दूंगा। एक लेखक अपनी ज़िन्दगी लिख रहा है। जो सिर्फ़ उसने जी। बिन कहे। बिन बताए। किसी से कह सकने की हद तक। अपने अकेलेपन को भर लेने की तरह। कभी तो कोई समझ पाएगा उसे। वह था। पर कितना अकेला था। कोई पास नहीं था उसके, जिससे वह कह सके। कहना सिर्फ़ साथ होना नहीं है। एक साझेदारी है। उन्हे कोई साझेदार नहीं मिला। वह सिर्फ़ लिखते रहे। बार-बार उन्हे लगता, नहीं लिख रहा हूँ। पर एकबार वह फ़िर लौटते। यह डायरी उन्नीस सालों के दरमियान कई बार टूटती है। फ़िर जुड़ती है। न लिख पाने की टीस बार-बार मवाद की तरह यहाँ हर पन्ने पर मौजूद है। दर्द है। पीड़ा है। अकेली बीतते दिनों शामों रातों की खामोश आवाज़ें हैं। दीवारों से लौट वह बराबर वापस आती रहीं। उन्हे सुनने वाला कोई नहीं है।

आहिस्ते से पन्ने खोल कभी शाम ढले पन्ने पढ़ने लग जाता हूँ। कहीं से भी शुरू कर देने की आदत। यह बेतरतीब होना नहीं है। फ़िर भी ऐसे ही कहीं रुक जाता हूँ। ठहर सोचने लगता हूँ। वह खालीपन कितना तोड़ रहा था। कोई भी इतनी पास नहीं था। जिसे कह सकें। किसी के इंतज़ार में वह कितनी कितनी देर तक वहीं ठहरे रह सकते थे। बिन हिले। बिन कहे। कैसा होते जाना है अकेले रहना। ख़ुद अपनी तरफ़ लौटता हूँ तो लगता है यह सब लिखा ‘डायरी’ में नहीं समाता। रोजनमचा की तरह लिखना आसान नहीं। बराबर लिखते जाना। मन हो न हो। उन पन्नों पर बस दिमागी बयान हैं। उन क्षणों की झुंझलाहटें हैं जो लगातार सोखती रही हैं।

इसे ऐसे भी तो कह सकते हैं कि उस हद तक नियमित नहीं बन पाता। रोज़ कहीं आने की आदत नहीं बन पाती। जितना कि वे सब जो डायरी की छपी तारीखों में ख़ुद को लिखते रहे हैं। शायद कभी उन तारीखों वाले खाँचे में नहीं बैठा पाया इसलिए उन साल वाले पन्नों पर नहीं लिखता। ख़ुद अपनी तफ़तीश करना कष्टकर है। उन दिनों के हवालों को बयानों में तब्दील करना इतना आसान नहीं। बहुत मुश्किल होता है उन खाली छूट गए पन्नों का बोझ। दिल नहीं उठा सकता। कभी मन नहीं होता तो कई-कई दिन नहीं आता। आना पीछे छूटते रहना है। कहीं पीछे छूटना नहीं चाहता। इसलिए भी उन्हे खरीद कभी तारीख़ दर तारीख़ लिखने की पैमाइश नहीं की। यह नोटबुक ही चलती रहे। इसमे ही बराबर लिखता रहूँ, यही सोच अपने को मना लेता हूँ। कि कुछ तो लिखना चल ही रहा है।

अभी तक कुछ जादा नहीं पढ़ पाया। यह पढ़ना नहीं उन भावों उन क्षणों से गुज़रना है। महसूस करना है उन शब्दों के पीछे का एहसास। उन घड़ियों का भारीपन। के कैसे होते गए होंगे हाथ। दिल कितना रोया होगा। कितना हल्का हुआ होगा मन। ऐसा ही क्यों लिखा उन्होने। कोई और ज़िंदगी नहीं हो सकती थी उनके हिस्से? एक रात पढ़ते-पढ़ते जहाँ पहुँचा वहाँ एक जून उन्नीस सौ सत्तावन की एक एंट्री है। वह अभी दिल्ली नहीं आए हैं। जालंधर ही हैं। कॉलेज की उबाऊ ज़िन्दगी से भाग लेने का मन है। माँ साथ ही रह रही हैं। पैरों में दर्द बना रहता है। कभी उनसे ही झगड़ लेते हैं। नौकरी छोड़ने का मन बना रहे हैं। बीयर पीकर सुबहें सरदर्द के साथ शुरू होती हैं। इन्हे फ़िर न छूने की कसमें शाम होते-होते कई बार टूटती रही हैं। ख़ूब घूमते हैं। पैदल रिक्शे पर। ऐसे ही एक शाम बक्शी से बात हो रही थी। उसने कोई किस्सा सुनाया है। जिसमे वह अपने लिए किसी ‘द वूमेन’ कह सकने वाली किसी दिल्ली की लड़की की बात कर रहा है। किस्सा मुख्तसिर यह हुआ के उसने पुरखों की परम्परा के अनुरूप आर्थिक सुरक्षा के अभाव में किसी और लड़के से शादी कर ली। पाल अक्सर इसी ‘द वुमन’ के मसले पर भाषण दिया करता था। मोहन राकेश लिखते हैं:

मैं उससे कह रहा था कि ऐसे वातावरण में मुझे किसी के अभाव का बहुत अनुभव होता है। पुरुष-पुरुष में बहुत घनिष्ठता हो जाती है लेकिन वास्तविक घनिष्ठता एक पुरुष और एक स्त्री में ही संभव है क्योंकि इमोशन की सही परिणति शारीरिक उपलब्धि में ही जाकर होती है। The climax of true intimacy is the complete merger of two bodies. Intimacy is incomplete without that merger and the merger is incomplete without that intimacy. इसलिए पुरुष को स्त्री का सहचर्य मात्र ही नहीं चाहिए- हर पुरुष को एक विशेष स्त्री का सहचर्य ही वास्तविक सुख दे सकता है। It is a question not of a woman but the woman.

यह ‘आधे अधूरे’ लिखने वाले मोहन राकेश की डायरी है। यह उनकी साँसों की कहानी है, जो यहाँ दर्ज है। अनीता राकेश बारह साल रुकी रहीं के सही वक़्त आ जाने पर इसे छपवाएंगी। दोस्त तुम्हें यह डायरी ज़रूर पढ़नी चाहिए। चाहकर भी तुम्हारा नाम नहीं दे रहा। एकबार लिख कर मिटा चुका हूँ। शायद इसके बाद ख़ुद को दोबारा जानने की शुरुवात फ़िर हो सके। तुम्हें ऐसे नहीं होना। यह उन दिनों में ताक़त देती है जहाँ हम सबसे जादा अकेले होते हैं। पता है तुम ख़ुद से बाहर आओगे एक दिन। उस दिन तुम अकेले नहीं रहोगे। और जहाँ तक पेज नंबर उनसठ पर लिखी इस बात है, आगे फ़िर कभी। अभी तो काफ़ी कुछ पढ़ने को बचा है। फ़िर अभी लिखना भी नहीं चाहता कि अपने ऊपर इस विचार का कैसा प्रभाव पड़ा। पड़ा भी या नहीं। यहाँ इसकी अपनी व्याख्या करना अभी बाकी है। और समानुपातिक रूप में वहाँ पहुँचना भी जहाँ स्त्री पुरुष के लिए ऐसा कहे तब इसके क्या मानी हो सकते हैं। अभी जा रहा हूँ। बस इतना कहते हुए के इतनी ईमानदारी से लिखने की कोशिश ख़ुद भी लगातार होती रहे। बस।



{आज देवेश ने फ़ोन कर बताया के कल हिंदुस्तान में यह पन्ना आया है। क्लिक करके वहाँ पहुँच सकते हैं। पेज नम्बर दस। साइबर संसार।  शीर्षक  ‘डायरी के पन्ने’। तारीख बारह दिसम्बर। }

2 टिप्‍पणियां:

  1. पढ़ेंगे इसे भी

    वैसे हिन्दुस्तान लिंक के लिए यह बेहतर है
    http://blogsinmedia.com/?p=26009

    हो सकता है आपने देखा ही ना हो इसे !
    http://blogsinmedia.com/tag/%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8/

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपका बहोत-बहोत शुक्रिया।

      इस पते से वहाँ दो कतरनों के लिंक दिखे, जिनके बारे में शायद ही पता चल पाता।

      हटाएं

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...