दिसंबर 09, 2013

ढूँढे जाने लायक बनने की लड़ाई

सड़क। उसका किनारा। किसी सागर से कम उथला नहीं। बस दिखाई नहीं देता। बस कभी-कभी महसूस होता है। जैसे इन शामों को। जब ठंड थोड़ी बढ़ रही होती है। सूरज कहीं दिख नहीं रहा होता। अँधेरा उन रौशनियों के गायब हो जाने के इंतज़ार में कहीं किसी कोने में घात लगाये बैठा रहता है। दिल्ली का मौसम अभी इतना ठंडा नहीं हुआ है। यह मौसम की वर्गीय व्याख्या है। मेरे हिस्से का सच। पर चलते चलते जब कुछ दिख जाता है तब वहीं रुक उसे महसूस करने को जी चाहता है। पता नहीं इन दिनों की शामों में ऐसा क्या है जो अकेले रहने की तरफ़ ढेकेले देता है। जिसके पास होने को मन करता है वह अभी नहीं है, शायद इसलिए। पर उन बीतते क्षणों में आती जाती साँसें लगातार एकांत को रचती रहती हैं। बिलकुल अकेली। उसमे कुछ कहने का मन नहीं होता। बस चुपचाप धीरे-धीरे बढ़ते रहो। जैसे चल कर कहीं नहीं जाना। कहीं नहीं पहुँचना। बस कहीं ख़ुद को लेकर गुम हो जाना।

जो गुम हैं। कभी-कभी दिख जाते हैं। इनकी गुमशुदगी कहीं नहीं दर्ज़ है। इन्हे कोई नहीं ढूँढ रहा। कोई नहीं चाहता कि इन्हे पहचान लिया जाये। इनका चीन्हे जाना ख़तरनाक है। फ़िर भी वह ऐसे ही मिलते रहे हैं। रोज़। बेनागा। कहीं न कहीं। आसपास। हमारी आपस में कोई पहचान नहीं है। फ़िर भी जान जाता हूँ। वही हैं। वह इस बार छोटे-छोटे बच्चों हैं। लाल रंग की पोशाक में। किसी टेंट हाउस के उस रात के दिहाड़ी। वह शनिवार रात उस रेड लाइट पर, किसी अनाम शादी में लट्टुओं के गमले उठाए, अभी कुछ देर बाद, बारात के साथ अपने भारी हो गए पैरों के साथ घसिट रहे होंगे। कोई नहीं पूछेगा इन्होने आखिरी बार कब ख़ाना खाया। इन्हे ठण्ड तो नहीं लग रही। वह दूल्हा जो घोड़ी पर बैठा नज़रे नीची नहीं कर रहा। जिसकी गर्दन में अपनी होने वाली पत्नी की तरह कमर में कोई बल नहीं पड़ रहा। वह अधीर-सा घोड़ी को भगाने के मंसूबे बना रहा है। पर वह ऐसा कर नहीं पाएगा। बिलकुल ऐसी ही स्थिति तब आएगी जब रात ढले यह सब पैसा मांगने जाएंगे और उसका हाथ बटुए पर नहीं जा सकेगा। हाथ कहीं रुक जाएगा। 

कहीं न कहीं तो यह सब भी रहते ही होंगे। इनका भी कहीं घर होगा। जो अभी उन बिजली वाले गमलों के सभी बल्बों के जल जाने की ‘टेस्टिंग’ कर रहे हैं। इन्हे ठण्ड लग रही है। और अभी उस बंद पड़ी ‘एनडीएमसी’ की दुकान के आगे कहीं से ढूँढ लाये बड़े से रबड़ के टुकड़े को जला चुके हैं। उसका धुआँ इनके सपनों की तरह जादा ऊपर तक नहीं जा पा रहा। ऊपर से गिरती सीत में वह पहली मंज़िल तक पहुँच थक गया है। उसकी कालिख उन सपनों के कभी न पूरे होने की कहानी कह रही है। कहानी कभी ख़त्म नहीं होगी। कभी शुरू नहीं होगी। वह ऐसे ही रुकी रहेगी। उन गाड़ी वालों की गालियाँ सुनती रहेंगी जो इन्हे पछाड़ आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इनकी तरह रुक गए हैं। रुकना किसी को भी पसंद नहीं। पता नहीं यह सब कैसे रुकी हुई ज़िंदगी से चिपके उसे जीते रहे हैं?

कितना मुश्किल होता होगा ऐसी जगह साँस लेना। जिसे घर भी नहीं कह सकते। पर वहीं रहने को अभिशप्त हैं। इनसे मुलाक़ात आज अचानक हुई पर रोज़ उस 'सबवे' से गुज़रते हुए उस स्त्री का पति कहीं नहीं दिखता। न उसके माथे पर ही कोई ऐसा चिन्ह है जिससे उसके होने के भौतिक प्रमाण मिल सकें। शायद वह उसके दिल में ज़िंदा है। उसने तीन पहियों वाली हाथ गाड़ी अभी भी छोड़ी नहीं है। रखे हुई है। पिछली ठंड तक इसे चलाने वाला भी था। आज उसकी दो लड़कियाँ औए एक लड़का उसे घेरे रहते हैं। घेरे रहते हैं उस तीन ईंट वाले चूल्हे को भी। जिससे उठता धुआँ इनके पेट की आग को शांत करेगा। खाने में वह क्या बनती होगी इससे ज़रूरी है रोज़ सुबह उठकर अपने ज़िंदा होने का सबूत देना। एक-एक सेफ़्टी पिन उन चादरों की दीवार को बाँधे हुए है। कहीं से उघड न जाये। उघड़ना उसकी गरीबी हमारी सत्ता की एक व्याख्या भर नहीं उसकी सबसे बड़ी आलोचना है। यह प्रतीक नहीं उसका जीवित बिम्ब है। जिसे कोई समझना नहीं चाहता। कोई नहीं देखना चाहता। बड़ी होती लड़कियाँ कहाँ जाएंगी। लड़का क्या करने लग जाएगा कोई नहीं कह सकता। ख़ुद उस माँ को इन्हे बड़ा करने की क्या कीमत देनी होगी वह अभी भी क्या दे रही है पता नहीं।

कम से कम वह माँ यह तो नहीं चाहती होगी कि उसका बेटा बूढ़ा होकर किसी बड़े शहर में कहीं रेहड़ी लगाकर बेनामी सी ज़िन्दगी जी रहा हो। जिसके जीने-मरने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अगर यह सब ज़िंदा रहे तब यह बूढ़े होने की त्रासदी का निषेध नहीं कर पाएंगे। लड़के की माँ रोज़ उस बूढ़े को देखती है। वहीं उसके चादरों वाले घर के पास। जो रोज़ वहीं खड़ा रहता है। कहाँ से आता है कहाँ जाता है पता नहीं। एक दिन वह कहीं चला जाएगा। गायब हो जाएगा। उसे कोई ढूँढेगा भी नहीं। ढूँढने के औज़ार इन्हे कहीं नहीं देख पाएंगे। यह इस दुनिया में ढूँढे जाने लायक बनने की लड़ाई है। जो यह सब हार चुके हैं।

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