जनवरी 06, 2014

हम बस लिख रहे हैं

लिखने का मन नहीं है। फ़िर भी अगर आ गया हूँ तो कोई न कोई बात तो होगी। बात है ही कुछ ऐसी। वरना सच में टाल जाता। तो शुरू कर रहा हूँ। 

शायद तुम इस तक बहुत दिन बाद पहुँचो। पर आज सुबह जनसत्ता में तुम्हारा लिखा पढ़कर थोड़ा उदास हो गया। सोचने लगा, इसमे मैं कहाँ हूँ? फ़िर सोचा अगर मैं भी अपनी डायरियाँ व्यक्तिवादी ‘आत्मस्वीकृतियों’ से भरे दे रहा हूँ, तो यह मेरे लिए भी लिखा गया है। कहीं पढ़ा था..शायद ‘मोहन राकेश की डायरी’ में.. कि‘लेखक कभी भी किसी विचार के प्रति नहीं, उस समय के समाज के प्रति प्रतिबद्ध होता है, जिसमें वह रहता है’। तब से यह बात दिमाग में कहीं टाँक ली है। कभी-कभी उधर भी चला जाता हूँ। जैसे आज अभी। सोचे जाने की दरमियानी में। देखें कहाँ पहुँच रहे हैं। 

पता है उससे गुजरते हुए सबसे पहला ख़्याल क्या आया मन में? यही कि कभी-कभी तुम्हारे ब्लॉग को भी पढ़ लेता हूँ। पर अधिकतर वहदेर रात के रागनहीं होते। वह किन्ही दूसरों की लिखा-पढ़ी होती है। तुम भी लिखती हो। फ़िर भी ऐसा कैसे कह गयी, समझ नहीं पाया। शायद विचारों का आग्रह ऐसे ही अपना काम करता है। तब उस रचना प्रक्रिया को महसूस करना तो दूर की बात है। यहाँ मैं दूसरों की नहीं कहता। न यह समझना कि उन बाकी सबकी तरफ़ से कह रहा हूँ। वह मुझसे जादा स्थापित हैं। अपना पक्ष मुझसे बेहतर रख लेंगे। इसलिए इसे मेरे एकांत के आदिवास का वक्तव्य ही मानना। फ़िर बातें हैं, बातें तो होती रहेंगी..

हमें यह कभी समझ नहीं आता के कोई यह कैसे बता सकता है कि किस तरह लिखना चाहिए। ध्यान देने लायक है कि यह बता कौन रहा है? फ़िर अगर जैसा वह चाहते हैं, वैसा नहीं लिखा गया, तब आप ‘आत्मकेंद्रित प्रतिस्पर्धा’ के खिलाड़ी मान लिए जाएँगे। चूँकि जो कुछ भी हम लिख रहे हैं वह हमारे रचनात्मक लेखन में अपने समय समाज के जीवन वहाँ उपस्थित अंतरसंबंधों, व्यक्तित्वों की बनावट-बुनावट और उनके आत्मिक संसार का खंडित आभासी और विरूपित चित्र है। और जब हम लिख रहे होते हैं तब अपने देशकाल का चित्र इसलिए उपस्थित नहीं कर पाते क्योंकि उसकी गतिकी को समझना ज़रूरी नहीं है। उनकी यह अपेक्षा किस तरह का ख़ाका बना रही है? वह किस श्रेणी-विचार-भाव को अपनी कसौटी मानते हैं। जिनपर खरा न उतरने पर आपको ख़ारिज कर दिया जाएगा। उस लिखे गए का कोई सामाजिक मूल्य नहीं लगाया जाएगा। यह ठीक है के सब अपने आग्रहों-पूर्वाग्रहों-झुकावों को स्वतंत्र रूप से निर्मित हुआ मानते हैं। ख़ुद वह कितने हैं, यह अलग विषय है। फ़िर वे उसपर कितनी बात करते हैं, यह देखने लायक है।

हम लेखन में कितने निजी हों और कितने सामाजिक यह हमारा व्यक्तिगत चयन है। हम कहीं से भी नहीं चाहते के हमें कोई आकर प्रामाणित करे। यह संस्थागत होते जाने की सहूलियत का प्रति-विचार है। काउंटर थॉट। ‘विचारधारा’ ऐसी ही संस्था है। जिसके अपने बने बनाए खाँचे हैं। हम उनमे ढलने को तय्यार नहीं हैं। अब तो कतई नहीं। यह हमारा अस्वीकार है। यह ठीक है के अपने पहले के दिनों में अपने ‘सामाजिक मूल्य’ को ध्यान में रखकर लिखना शुरू किया। पर आज, बिलकुल अभी, अगर उसकी कसौटी पर मुझे नकार दिया जाये तो कोई क्षोभ नहीं होगा। जिस विचारधारा से संचालित होकर वे लेखन को पूँजीवाद से लड़ने का हथियार बता रही हैं। और एक एककर दूर अतीत से रूसो, फ्रांस मेहरिंग की कृतियाँ ढूँढकर ला रही हैं। वहाँ एक हम भी हैं। यह अकेले होना कमज़ोरी नहीं है। हम भी उस पूँजीवाद के साथ नहीं हैं। हमारा एकांत उससे लड़ रहा है। जहाँ इस विश्व की सारी व्यवस्थाएं समरूप होती जा रही हैं और इस एकरूपता में अपनी आर्थिक उपलब्धि देख रही हैं; वहीं हम भी कहीं छिपे दबे स्वर में अपनी बात कह रहे हैं। भले हमारा ढंग अलग हो। पर हम भी उसके लिए अपने तरीके से ‘एंटि-थीसिस’ रच रहे हैं।

यह ‘व्यक्तिवाद’ का प्रस्तावित वक्तव्य नहीं है। यह विचाधारा के स्तर पर समरूप होते जाने का नकार है। हम भी इन नयी बनती संरचनाओं संस्थाओं की गतिकी को समझने की कोशिश कर रहे हैं। पर हमारे विखंडन का तरीका वैसा नहीं है, जैसा आपका है। यह किसी भी तरह से संशोधनवाद की तरफ झुका प्रस्ताव नहीं है। यह उत्तर आधुनिकता भी नहीं है। यह किसी स्वतंत्र पाठ को पढ़ने का आग्रह भी नहीं है। बल्कि यह वैचारिक स्तर पर बहुत कमज़ोर सा वक्तव्य है। जिसे कोई सुनना नहीं चाहता। समझने को कोशिश तो बाद की बात है। शुरुवात होगी सुनने से। इतमीनान से सोचने से। यह नए तरीके से संवाद स्थापित करने की कोशिश है। हम नहीं कह रहे के इन लिखे पन्नों को ‘सबाल्टर्न’ मान लिया जाये। यह हमारे हिस्से की हिस्सेदारी है। जिसे कोई हमसे पूछ नहीं रहा। पर यह हमारी ही ज़िद है कि बोले जा रहे हैं। कभी कोई ठहरकर पूछेगा। कैसे हो? क्या करते रहे अब तक? तब उसे यही पोथी पकड़ा देंगे। फ़िर चुप हो जाएँगे। फ़िर कभी नहीं बोलेंगे। कहने पर भी नहीं। तुम कहते रहो, फ़िर भी नहीं। मैं चुप हो जाऊँगा। हमेशा के लिए।

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