जनवरी 13, 2014

छूने भर की दूरी..

उधर तुम होती हो। इधर मैं होता हूँ। और दोनों तरफ़ होती हैं हमारी आवाज़ें। आवाज़ें दोनों ओर आरपार होती जाती हैं। इन गुज़रती आवाज़ों में होती है, हमारी साँसों की धड़कनें। धड़कता मन। उनमें बहता ख़ून। वह खून जो दिल में धड़कता है। धड़कता है सपनों में। यह दिन। यह शाम। यह रात। ऐसे ही कितने ख़्यालों में खोया-खोया सा रहता। जैसे अभी लिख नहीं रहा, खो रहा हूँ। खो रहा हूँ, इस दुनिया से। उस दुनिया में। खोकर देखेंगे एक नयी दुनिया। जहाँ अगल-बगल बैठे हम दोनों आने वाले दिनों में सपने बुन रहे हैं। या कि यह सपने एकबार फ़िर हमारे अंदर से बाहर की तरफ़ जाते आसमान की ऊंचाइयों पर हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। इंतज़ार कर रहें हैं, हमारे पहुँचने का। उन मुलायम से घास के मैदानों में। जहाँ कोई नहीं है। न कोई होगा। हमारे सिवा।

उस दिन तुमने कुछ नहीं कहा। फ़िर भी सब कह गयी, तुम्हारी आवाज़। बड़े चुपके से तुम उदास होती जा रही थी। बिन बताए। जबकि हमने वादा किया था, ऐसे नहीं होंगे। तब तो कम से कम नहीं, जब हम साथ हों। फ़िर भी नहीं रोक पायी ख़ुद को। यह साथ की बात मुझे भी उदास करती जाती है। उदास कर घेर लेती है परछाईं। जिसमें कुछ नहीं दिखता। मैं भी नहीं।

पर तब तब सुन लेता हूँ, तुम्हारी आवाज़। दिल के किसी हिस्से से तुम्हें ढूँढ लाता। और पास बिठा बात करने लगता। तब पता नहीं कैसे तुम कितने अंदर तक खींचे ले गयी। परत-दर-परत। बहुत अंदर तक। इतने अंदर जहाँ सिर्फ़ हम थे। कोई और नहीं। उस चुप्पी में आहिस्ते से उन आती जाती धड़कनों में एक दूसरे को छू भर लेते। फ़िर बड़ी पास से बिन बोले बैठे रहते। आँखें नाक के पास से होकर गले पर जा ठहरती। गले से फ़िर कहीं और। और तब देखा परछाईं कहीं नहीं थी। वहाँ हम दोनों हैं। 

असल में हम दोनों अभी सपने में हैं। साथ हैं। इतनी पास कि जितनी उँगलियों के पास उसके नाखून। हम बैठे नहीं हैं। लेटे गए हैं। हमारी सारी अनकही बातें सितारों में बदल गयी हैं। उनकी चमक में थोड़ी देर रहना चाहते हैं। सवेरा होने से पहले उन्हे बुन लेना चाहते हैं। और चाहते हैं हर रात ऐसे ही ख़त्म न होने वाली रात की तरह आए। हम भी रोज़ रात ऐसे ही अपनी उन सारी यादों को उनमे भरते रहें। भरते रहें इन अहसासों से। उन स्पर्शों छुअनों से जो अभी नहीं छू पाये हैं हमें। उस आसमान में एक तरफ़ हो हमारा सपनों का घर। के देर न हो, रात होते ही आने में। मेट्रो भी कहाँ चलती हैं इतनी देर रात तक। न कोई स्टेशन ही उसने यहाँ बनाया है। अच्छा ही किया। हम यहाँ अकेले हैं। एक दूसरे में आरपार होते जाने के लिए। कहीं से कोई शोर इन क्षणों को नहीं तोड़ सकता।

अगर ऐसा हो तो हम चाहेंगे के हमें अपनी आवाज़ों के सिवा दुनिया की कोई और आवाज़ न सुनाई दे। ऐसा चाहकर हम बनाए रखेंगे अपने सपनों का घर। वहाँ आवाज़ें हमारी मर्ज़ी से आएँगी हमारी मर्ज़ी से जाएँगी। वहाँ नहीं होगा पतझड़ का मौसम। पेड़ भी उदास इंतज़ार करता होगा लौट आने तक। बिलकुल वैसे ही जैसे तुम। जैसे मैं। अकेले होने की पीड़ा। उसकी चुभन। अंदर तक भेद जाती हैं। इसलिए यहाँ बना रहे हैं अपना सपनीला घर। उसे भर रहें हैं। मनमर्ज़ी। बिन दरवाजों बिन छत वाला घर।

पता नहीं, कैसे वहाँ पहुँच गए थे हम। कितने रुके रहे हैं। कितने छटपटाये हैं। इन क्षणों के लिए। इन मुलाकातों के लिए। इन मुसकुराते होंठों के लिए। जब तुम आहिस्ते से उस पन्नी को खोल रही थी। वहीं छिपा था। देख रहा था। कनअँखियों से। तुम्हें बिन बताए। बिन कहे। कैसे गुलाब के फ़ूल बने थे, उनपर। ख़ुशबू से भरे हुए। फ़िर उस पन्ने पर कुछ लिखा था। तुम्हारे लिए। ख़ुद को तुम्हारे लायक बनाते हुए। दिल अचानक थम सा गया। कुछ भी नहीं कह पाया लगता। उन शब्दों में अपनी आवाज़ भरते ख़ुद को तुम तक भेज रहा था जैसे। जैसे अपने दिल का टुकड़ा। जो बचा था, वह भी अपने पास नहीं रखा। उसी में भेज दिया तुम्हें। तुमसे ख़ुद को भरते कई बार ऐसे कर चुका हूँ। पर हर बार तुम जान जाती हो। बिन बोले। बिन बताए। 

बस अब हरबार अपने को समझता हूँ। कुछ दिन और। हम दोनों छू लेने की दूरी पर होंगे। इतनी दूर से इतनी पास तक। तब हाथों में हाथ डाल चलेंगे अपने सपनों के घर। वहीं बुनेंगे अपनी अनकही बातें। कुछ-कुछ जो अधबुने हैं, वहीं पूरे करेंगे। संभाले रखना। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...