जनवरी 14, 2014

गोरख पांडे की डायरी

ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर,
इस दुनिया को /जितनी जल्दी हो /बदल देना चाहिए

राकेश न मालुम कितनी दफ़े इन पंक्तियों को दोहराता रहा है। उसके दिमाग में लगे संगमरमर के पत्थर पर खुदी हुई हो जैसे। एक वक्तव्य की तरह। पर कभी उनकी कविताएँ नहीं पढ़ीं। कभी मन नहीं किया। फ़िर उसी ज़माने में हमारे एक सर भी हुआ करते थे। अभी भी हैं। पर बात अब नहीं होती। रुक रुककर कभी-कभी हो जाती है। वह भी इनका नाम लेते, पर जादा कहने से बचते। वह हमेशा ऐसा करते। कभी नहीं बताते कि वह इनके प्रति ऐसे क्यों हैं?

पर अभी उस शाम अचानक सागर  ने कहा,‘कमोबेश हर आदमी में हम हैं। और हममें वे हैं। गोरख पाण्डेय की डायरी में भी’। तब लगा इसे ढूँढना चाहिए। ढूँढा। अब इसे गोपाल प्रधान केब्लॉग’ पर धीरे-धीरे पढ़ रहा हूँ। इतनी बिखरी शुरुवात के बाद लगने लगा है, इतनी ही बिखरी यह डायरी है। यह डायरी गोरख को बिखरने से नहीं बचा पायी। ख़ुद बची रहकर उन क्षणों की तरफ़ जाते व्यक्ति की पीड़ा के दस्तावेज़ की तरह माजूद है। उसमे दर्ज़ है तारीख़-दर-तारीख़ वह दर्द, उलझने, विचार, भाव, भावुकता, कविता।

वह डायरी में एक जगह लिखते हैं, ‘हम विचारों के स्तर पर जिससे घृणा करते हैं, भावनाओं के स्तर पर उसी से प्यार करते हैं’। उन्हे बार-बार लगता रहता है कि कहीं उनकी देखने, सुनने, सोचने, समझने की शक्ति गायब तो नहीं होती जा रही। बड़ी देर से यही सोच रहा हूँ कि इस पंक्ति को लिख लेने के बाद, वह क्या सोच रहे होंगे? उन्होने यह बात क्यों कही होगी? अपनी किस बात के लिए वह आधार ढूँढते-ढूँढते यहाँ पहुँचे? क्या सच में वह उन्ही भावनाओं, जो उनके अस्तित्व की ‘निकटतम अभिव्यक्ति’ थी, के लिए कोई ‘वैचारिक प्रस्थान’ बिन्दु तलाश रहे थे? यह तलाश क्या हम सब भी अपने भीतर करते हैं? इसमें हम कहाँ स्थित होते हैं?

यह क्या एक सर्वहारा वर्ग से आए युवक के ‘पूँजीवादी सौंदर्य’ में फँस जाने की छटपटाहट है? क्यों वह इस तरह ‘वैचारिक प्रेम’ कर रहे हैं? ख़ुद इसे इतना ‘रेशनलाइज़’ करने की क्या ज़रूरत है? यह प्यार करने से पहले नहीं, उसके हो जाने के बाद की वर्गीय व्याख्या है। यह एक ‘बौद्धिक’ का प्रेम है। वह विचार से विचलित नहीं होना चाहते। पर हो जाते हैं। कभी ख़ुद को भी इसी तरह ‘विखंडन’ करते देखता, तो ऊब होती। ऊब गोरख को भी हो रही है। वह इससे बचना नहीं चाहते। इससे जूझकर कहीं पहुँचना चाहते हैं। कहते हैं, उदय प्रकाश की कहानी ‘राम सजीवन की प्रेमकथा’ इन्ही की ज़िंदगी पर आधारित है। इसे आधार बनाकर कई नाटक भी हुए हैं। पता नहीं वहाँ जो राम सजीवन है, वह ऐसे द्वंद्व से गुज़रता है या नहीं? वह भी क्या उसी नतीजे पर पहुँचता है?

आगे वह कहते हैं, हमारे पास सौंदर्य की कोई बनी बनाई परिभाषा नहीं होती। हम उसे ही ‘सौंदर्य’ मान लेते हैं, जो तत्कालीन समय में प्रचलित होती है। प्रचलित कौन है? वही जो संचार माध्यमों में बार-बार दोहरायी जा रही है। जो लड़की उन नक़लों के जितना करीब होती है, हम भी उसके उतना पास हो जाना चाहते हैं। हमारे पास इस सौंदर्य का ‘एंटी-थीसिस’ नहीं होता। हम अपनी तरफ़ से उसे गढ़ने की कोशिश कभी नहीं करते। उसी को मानते चलते हैं। फ़िर क्या होता है? हम ऐसे ही मानदंडों पर खरी उतरती लड़कियों की तरफ़ आकर्षित होने से ख़ुद को नहीं रोक पाते। शायद यह न रोक पाना और ‘बुर्जुआ सौंदर्य’ की तरफ़ खिंचे चले जाना गोरख को सबसे जादा साल रहा था। जिन विचारों के सहारे हम दुनिया बदलने निकले, वही समानुपात में हमें नहीं बदल पाये।

कहते हैं वे ‘स्किजोफ़्रेनिया’ से पीड़ित थे। पता नहीं लेखकीय दृष्टि से यह बहुत मानीखेज लग रहा है कि इस व्याधि में व्यक्ति अपने लिए ख़ुद ही ‘काल्पनिक संसार’ रच लेता है। जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। वह उसी में जीने लगता है। और दिन पर दिन उसके लिए कल्पना और वास्तविकता में अंतर कर पाना कठिन होता जाता है। पर इस कल्पना का उपयोग करने के लिए जो मानसिक संतुलन चाहिए वह लगातार कम होता जाता है। वह कौन से क्षण होंगे, जब उन्होने वास्तविकता को नकारना शुरू कर दिया होगा। कब उन्होने इस ‘पलायन’ को अंगीकार कर लिया। यह एकतरफ़ा प्यार नहीं। उसमे डूब जाना है। जिसके साथ अपनी सारी ज़िन्दगी गुज़ारने के सपने देखना चाहते हैं, उसका शाम उस सूरज के ढलते हुए उस लोहे के बेंच पर न आना अंदर से तोड़ देता है। वह कितने निश्छल भाव रहे होंगे जब उन्होने अपने को मिटाकर, उसका नाम लिखा होगा। उन सारे वैचारिक प्रस्थान बिन्दुओं को सिरे से नकार अपनी संगिनी चुनी होगी। पर अंत तक आते आते वह अकेले हैं। जहाँ से पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं है।

दुर्खाइम ‘आत्महत्या’ पर क्या कहते हैं, पता नहीं। पर गोरख पाण्डेय की आत्महत्या इस सामाजिक ढाँचे की एक और व्याख्या की तरह हमारे सामने है। यह उनके साथ न रहने पर ‘वैचारिक स्खलन’ नहीं है, पर उस समाज के और मज़बूत होने का प्रमाण है। उसने अपनी किसी भी चीज़ को हिलने नहीं दिया। उसका ढाँचा आजतक वैसा का वैसा बना हुआ है। वह सौंदर्य ऐसे ही हमें अपनी ओर खींचता रहा है। हम उसे जताना नहीं चाहते। फ़िर भी वह ऐसा ही है। यह ‘समरूपीकरण’ हम लड़कों को उन्ही लड़कियों की तरफ़ ढकेल रहा है जो असल में किन्ही इज़ारेदार उपक्रमों द्वारा पोषित सौंदर्यशास्त्र की नकल करती हैं। हमारे पास कोई ‘जातीय व्याख्या’ मौजूद नहीं है। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता के आगे कोई और गोरख पांडे की नियति को प्राप्त नहीं होगा। या क्रमिक रूप से वह इस आत्महंता न बनकर वह कुछ और हो जाना चाहता है। ऐसा कोई नक्शा कभी बना है या किसी ने कोशिश की है? पता नहीं।

अभी इसे ख़त्म नहीं कर पाया हूँ। पर रह रह कर उन बिन्दुओं पर रुककर सोचने लगता हूँ। उस अनुभव को कह नहीं पा रहा। उसे शायद कभी कहने लायक बना भी न पाऊँ। बस उस तनहाई में यह पंक्तियाँ बार बार घूम रही हैं। जो इन ऊपर की पंक्तियों की तरह अपनी सहूलियत के हिसाब से चुन ली हैं। वह कहते हैं, ‘हमें कैसी औरत चाहिए? निश्चय ही उसे मित्र होना चाहिए। हमें गुलाम औरत नहीं चाहिए। वह देखने में व्यक्ति होनी चाहिए, स्टाइल नहीं। वह दृढ़ होनी चाहिए। चतुर और कुशाग्र होना जरूरी है। वह सहयोगिनी हो हर काम में। देखने लायक भी होनी चाहिए। ऐसी औरत इस व्यवस्था में बनी बनायी नहीं मिलेगी। उसे विकसित करना होगा। उसे व्यवस्था को खतम करने में साथ लेना होगा। हमें औरतों की जरूरत है। हमें उनसे अलग नहीं रहना चाहिए’।

पता नहीं इसका विकास करने वाली व्यवस्था हम कब बना पाएंगे। इसमें ख़ुद उनकी क्या भूमिका होगी? क्या इतनी सहजता से वह उसे स्वीकार कर लेंगी? इन सवालों की तह में यह जैविक न लगकर, कहीं से थोपी हुई लगने लगे, इससे पहले उनकी कविता दोहराने का मन कर रहा है। मुझे मेरे प्यार ने खुद-ब-खुद सौंप दिया/ हत्यारों के हाथ में /एक लम्बे अर्से तक उसका इन्तजार किया/ चुपचाप समूचे अस्तित्व से मैंने/ इन्तजार किया/ वह झटके में दिखाई पड़ी/ आवाज दी, उसने मेरी आवाज दोहरायी/ ठहरो आ रही हूं/ फिर अंधेरे में गायब हो गयी/ मैंने खुद को एक नदी की तरह/ उसकी ओर बहते हुए पाया/ उसने मुझे मुस्करा कर देखा।

{यहाँ लगाने के लिए उनकी कोई तस्वीर तो मिली नहीं मिली, उनके नाम की एक प्रस्तुति की एक फ़ोटो दिखी, वही लगा दी है। }

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