जनवरी 31, 2014

यहाँ कभी न लौटने से थोड़ा पहले..

बड़े दिन हुए इधर नहीं आया.. मन अचानक यहाँ से हट जाएगा, कह नहीं सकता था। पर यह ऐसा ही है। उन मौकों को एक दिन ऐसे ही कम होते जाना था। यह इसकी आख़िरी पोस्ट नहीं है। पर कुछ-कुछ उसकी शुरुवात को पहली बार इतने पास से महसूस किया, वही कहने को हो आया। अभी ‘तेरह’ को बीते एक महिना भी नहीं हुआ और अचानक इसके ऐसे होते जाने की ताकीद करने आ गया। इसबार डायरी बदस्तूर चल रही है। पर यहाँ रुक गया हूँ। लिखते हुए हाथ नहीं काँप रहे, दिल रो रहा है। इस सपने को ऐसे बीच में छोड़ जाने को हो जाऊँगा, कुछ वक़्त पहले इतनी साफ़ तौर पर नहीं दिख रहा था। पर उसकी आहट यहीं-कहीं पास ही थी। जिसे कान बड़ी आहिस्ते से सुन रहे थे। समझ आने तक इंतज़ार में था। कि कहीं अटक तो नहीं गया। यह किसी तरह से इस ‘स्पेस’ से भाग जाने की बात कहाँ से करने लगा। जिसे इतने करिने से बुनता रहा। अपने दिल की हर बात कह लेने का मन करते-करते यह मन को क्या हो गया? इतना ‘पेसिमिस्ट’ कैसे होता गया?

शायद यहाँ आना ख़ुद को टूटने बिखरने से बचाए रखने की आख़िरी कोशिश है। जिसे कह सकता हूँ, वैसे कह लेने का संतोष। अपने दिल को उघाड़ देने की हद तक कहते जाना। उन बारीक रेशों को निर्ममता से उधेड़ते जाना। अभी पीछे कह रहा था, पाँच साल लेकर आया हूँ। पर नहीं पता था यह ‘शिफ्टिंग’ इतनी जल्दी होगी। शायद उस शाम सागर सही कह रहा था। यह ‘ब्लॉग’ का वक़्त नहीं। हम यहाँ सबसे गलत वक़्त पर यहाँ पाये जाने लगे। ऐसा मान लेना सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी हार है। सच में हार रहा हूँ। ख़ुद से। इस दुनिया से। यह हमें हरा रही है। मैं बहुत दुखी होकर यह सब नहीं लिख रहा। पूरे होशोहवास में लिख रहा हूँ। यह भावातिरेक नहीं है। किसी भी तरह से भावुकता का बहाना नहीं बनाना चाहता। बस कह लेना चाहता हूँ। जो इन दिनों अपनी सघनता से मुझे घेरे हुए है। यह इतने दिनों बाद प्रथम पुरुष में ख़ुद से मुख़ातिब हूँ। यह सब किसी और के लिए नहीं, सबसे पहले ख़ुद के लिए है।

पता नहीं इन सब बातों से निकालने वाले अर्थों की ध्वनियाँ कहाँ तक कैसे जाएंगी? यह अपनी मृत्यु को इतने पास से गुज़रते देखने जैसा है। पता नहीं यहाँ लिखे हुए शब्दों को पढ़ने वाले के मन में दिल में कैसे ख़याल भर जाएँगे। पर अब यहाँ आने के दिन ऐसे ही कम होते जाएँगे। शायद अचानक एक दिन कभी न आने के लिए यहाँ से चला जाऊँ। फ़िर कभी न लौटने के लिए। कभी चाहकर भी न आने के लिए। इस टूटे दिल की मरम्मत कहाँ होती है, उसका पता भी मालुम नहीं। यह मृत्यु अचानक किसी मोड़ पर नहीं मिल गयी, साथ साथ चलती रही। बस अभी हुआ इतना भर है कि यह दिखने लगी है।

यह भौतिक मृत्यु नहीं है, इसके लेखक की हारती हुई पारी है। जिसके यहाँ से चले जाने पर शायद ही किसी को कोई फ़र्क पड़ेगा। इतने यहाँ से चले गए, एक और हमारे जाने से क्या कम हो जाने वाला है। हम क्या लिख रहे थे? कैसे लिख रहे थे? किसके लिए लिख रहे थे? यह सवाल शायद ही कभी कोई पूछे। या कभी पूछ भी लिए गए, तो कौन-सा हम बताने के लिए होंगे। जब हम अपने लिए ही ज़रूरी नहीं रह गए, तो किसी और के लिए कहाँ कुछ हो सकते हैं। उनकी ज़रूरतें हमारे यहाँ न रहने पर यकबयक बदल जाएंगी। कोई हमारे लिए रुका थोड़े रहेगा। कभी कोई नाम भी नहीं लेगा। कि कोई इस नाम से, कभी था भी। यह नाम गुम जाएगा।

बात मेरे अंदर लिखने वाले के मर जाने की नहीं है। बड़ी बात है, आज मैं कहाँ खड़ा हूँ? शायद कहीं नहीं। इस वक़्त तक मुझे कहाँ हो जाना चाहिए था?  जिन सालों में हमें कुछ हो जाना था, हम कुछ नहीं हुए। फ़िर हमें जानता कौन है? कोई नहीं। हमें यहाँ से क्या मिला? कुछ नहीं। जो कुछ भी मिला वह दिख नहीं रहा। देखने लायक नज़र रह नहीं गयी। बस दिख यही रहा है के इस भीड़ में हमारी उमर के लड़के इन जैसी जगहों पर फ़िजूल बातें नहीं किया करते, कहीं अमरीका में बैठे किसी कंपनी से कमा कमाकर इस देश में रह रहे माता-पिता को पैसे भेज रहे होते हैं। हम जैसे बे-काम लड़के ऐसे ही गायब होते रहे हैं। हम भी होने जा रहे हैं लगता। ढूँढने जा रहे हैं। ख़ुद के लिए अपने लायक जगह। जहाँ से देखें, तो सब दिखे। हम भी नज़र आयें।

इन सब बातों का मतलब यह नहीं के लिखना छोड़ रहा हूँ। नहीं। बस सोच रहा हूँ, हम यहाँ कर क्या रहे हैं? हमें यहाँ होना भी चाहिए? यह ना-उम्मीदी नहीं है। बस कह इतना रहा हूँ के यहाँ ठहरे रहने का मन नहीं है। जी उचट गया है। और यह जो मृत्यु की बात है वह हमारे साथ धीरे-धीरे चल रही है। इस ब्लॉग को अचानक बंद नहीं करने जा रहा। पर यहाँ कम आने की आहट सुनायी पड़ने पाए ज़रूरी लगा, सबको बताता चलूँ। भूख नहीं है। बस छत पर जा रहा हूँ। अँधेरे में बैठकर सोचुंगा क्या सब कह गया? किस बात को कैसे कहना था। किसे कह कर भी नहीं कहने को होता गया। और दोस्तों यह कोई एक दिन में लिया गया फैसला नहीं है। धीरे-धीरे यहाँ पहुँचा हूँ। मेरे जैसा लड़का, जिसके पास नौकरी नहीं है, उसके लिए यहाँ बने रहना, बेहया होते जाना है। यह बेशर्मी जबतक कर सका, तबतक करता रहा। अब लगता नहीं, यहाँ जादा देर बैठने के बहाने बना पाऊँगा। बस अब छोड़ दिया है, ख़ुद को..

बड़ा थका-थका सा लग रहा हूँ न? हारा हुआ। हताश। निराश। पता नहीं यह जो सब कह दिया उसे कहना था भी या नहीं। या ऐसे करता एक दिन अचानक किसी को याद आता। कि कितने दिन हुए, मैं कहीं नहीं दिखा। गायब हो गया। ऐसा ही अच्छा रहता..

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